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वसंत का सन्देश वाहक होली

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भारत को उत्सवों की भूमि के रूप में जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में लोग विभिन्न तीज-त्योहारों के बहाने एक दूसरे से मिलते जुलते रहते हैं और इन त्योहारों को खुशियों के साथ मनाते हैं. इन त्योहारों का जितना धार्मिक महत्व है उससे कहीं ज्यादा इसका प्रभाव हमारे पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर देखा जा सकता है. इसीलिए इनके बिना हम सब अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते. इन त्योहारों के बहाने होने वाले उत्सवों से हम सभी के जीवन में परिवर्तन, उमंग, उल्लास एवं खुशियों का संचार होता रहता है. क्योंकि हर वर्ष कुछ दिनों में पड़ने वाले इन त्योहारों में रिश्तों को और समाज को जोड़े रखने की अद्भुत क्षमता होती है. इस अद्भुत क्षमता के कारण ही भारतीय त्योहारों का महत्व पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ करने की दृष्टि से और भी बढ़ जाता है. अलग-अलग तिथियों पर अलग-अलग विशेषताओं को समेटे हुए ये त्योहार प्रकृति, पूर्वजों के प्रेरणादायक अतीत, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं आदि के आधार पर बनाए गए हैं, जिसमें समुदाय विशेष का ही नहीं बल्कि प्रकृति का भी भरपूर ख्याल रखा गया है. इन सब कारणों से भारतीय संस्कृति को त्योहारों की संस्कृति के तौर पर भी जाना जाता है. ये त्योहार, इनसे जुड़ी अनेकों परंपराएं, उनके रीति-रिवाज एवं अनुष्ठान हमारी आस्थाओं और विश्वासों के अपरिहार्य संरक्षक तो हैं ही. साथ ही ये हमें भारत के अतीत की दुर्लभ पौराणिक और ऐतिहासिक जानकारियां प्रदान करते हुए प्रकृति से भी जोड़कर रखते हैं.

त्योहार यानी जीवन का जश्न

भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता है कि हम सभी रिश्तों की सुनहरी डोर में बंधे होने के साथ ही इससे जुड़े पारिवारिक और सामाजिक बंधनों को भी पूरा मान और सम्मान देते हैं. बंधन में बंधे हुए जीवन में उतार-चढ़ाव का आना भी स्वाभाविक होते हैं. त्योहारों का आगमन जीवन में आने वाले उतर-चढ़ाव से ना केवल राहत प्रदान करता है बल्कि इसी बहाने कुछ समय हर्षोल्लास के साथ, बिना किसी तनाव के जीवन को व्यतीत करने का मौका भी मिलता है, जो संबंधों के लिए किसी औषधि से कम नहीं. एक ऐसी औषधि जिसके प्रयोग से मानव-विकास, परिवार-विकास और समाज-विकास की सारी प्रक्रिया में सकारात्मक प्रभाव को देखा जा सकता है. शायद इसीलिए भारतीय जन जीवन में त्योहारों और उत्सवों का आदिकाल से ही काफी महत्व रहा है. यहां मनाए जाने वाले सभी त्योहार मानवीय गुणों को स्थापित कर लोगों में प्रेम, एकता व सद्भावना को बढ़ाने का संदेश देते हैं. वर्ष के आरम्भ से लेकर वर्ष के अंत तक हर कुछ दिनों में कोई ना कोई त्योहार मनाये जाने की परंपराओं के बहाने हम एक-दूसरे से मिलते हैं, शुभकामनाओं और बधाइयों का आदान-प्रदान करते हैं. हर त्योहार अपनी विशिष्टताओं के कारण अपने आदर्श की छाप हमारे जीवन पर छोड़ता जाता है, जिससे मानव-जीवन और इसके मूल्य भी समृद्ध होते हैं. अपनी इन्हीं विशिष्ट विशेषताओं के कारण ही भारत में मनाये जाने वाले लगभग सभी त्योहारों का बोलबाला आज पूरे विश्व में है, जो हमारे जीवन में उमंग और उत्साह की नई लहरों को जन्म देते हुए उसको जश्न से भर देते हैं.

परंपराओं की अविरल धारा

भारत ऐसा देश है जहां फसलों की कटाई को लेकर भी उत्सव मनाया जाता है और वर्षा ऋतु अथवा पूर्णिमा का स्वागत करने के लिए भी यहां पर अलग-अलग त्योहार मनाए जाते हैं. ये सभी त्योहार भारत के राष्‍ट्रीय कैलेंडर शक संवत पर आधारित होते हैं और चैत्र इसका पहला महीना होता है जबकि ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक प्रथम महीना जनवरी होता है. वर्ष के खास त्यौहार निर्धारित तो हिंदी माह के अनुसार ही होते हैं परन्तु छुट्टियों से लेकर जन्मदिन और जयंती से लेकर पुण्यतिथि आदि के लिए हर कोई ग्रेगोरियन कैलेंडर का ही उपयोग करता हैं. ग्रेगरियन कैलेंडर के मुताबिक त्योहारों की श्रृंखला की शुरुआत जनवरी माह से ही हो जाती है, जो वर्ष भर चलती रहती है. जनवरी में लोहड़ी, पोंगल, मकर संक्रांति तो फरवरी में वसंत पंचमी. मार्च में महाशिवरात्रि, होलिका दहन और होली तो अप्रैल में चैत्र नवरात्र, राम नवमी और हनुमान जयंती. मई माह में अक्षय तृतीया तो जुलाई में गुरु पूर्णिमा और हरियाली तीज, अगस्त में नाग पंचमी, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, हरतालिका तीज आदि तो सितंबर-अक्तूबर-नवम्बर में शारदीय नवरात्र, दशहरा, करवा चौथ, दीपावली, भाई दूज, छठ जैसे प्रमुख त्योहार है. यानी पूरे वर्ष विभिन्न पर्व एवं त्योहारों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपरा की अविरल धारा निर्बाध गति से सदैव प्रवाहित होती रहती है. ठंड की आहट मिलते ही दीवाली का त्योहार अंधकार को दूर कर के जीवन में रोशनी भरने का सन्देश देते हुए आता है तो अब ठंड की विदाई के समय होली का त्योहार जो मस्ती और मौज के साथ अपनों के रंग में रंग जाने का संदेश देता है.

होली की पौराणिक कथा

होली देश के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है. राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है, जो वसंत और फसल कटाई का जश्न मनाता है. राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, लेकिन इनको उत्कर्ष तक पहुंचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है. होली एक बहुत ही प्राचीन उत्सव है और इसका आरम्भिक शब्द रूप होलाका था. पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर राजा था. उसने घमंड में चूर होकर खुद के ईश्वर होने का दावा किया था. इतना ही नहीं, हिरण्यकश्यप ने राज्य में ईश्वर के नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी. लेकिन हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद ईश्वर भक्त था. वहीं, हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग में भस्म न होने का वरदान मिला हुआ था. उसके पास एक ऐसी चुनरी थी, जिसे पहनने पर वो आग के बीच बैठ सकती थी. जिसको ओढ़कर आग का कोई असर नहीं पड़ता था. एक बार हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए. लेकिन आग में बैठने पर होलिका जल गई और प्रहलाद बच गया. और तब से ही ईश्वर भक्त प्रहलाद की याद में होलिका दहन किया जाने लगा. मान्यता है कि होलिका की आग में अपने अहंकार और बुराई को भी भस्म किया जाता है.

होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है, उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है और फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं. होली का आगमन इस बात का सूचक है कि अब चारों तरफ वसंत ऋतु का सुवास फैलने वाला है. वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवान्नेष्टि’ कहा गया है. इस दिन खेत के अधपके अन्न का हवन प्रसाद बांटने का विधान है. इस अन्न को होला भी कहा जाता है इसलिए इसे होलिकोत्सव के रूप में मनाया जाता था. इस पर्व को नव संवत्सर का आगमन तथा वसंतागमन के उपलक्ष्य में किया हुआ यज्ञ भी माना जाता है. कुछ लोग इस पर्व को अग्निदेव का पूजन भी मानते हैं. मनु का जन्म भी इसी दिन माना जाता है अतः इसे मन्वादि तिथि भी कहते हैं. कर्मकांड में इसे ‘यवग्रयण’ यज्ञ का नाम दिया गया है. वसंत में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाता है इसलिए होली के पर्व को ‘गवंतरांभ’ भी कहा गया है.

होलिकोत्सव का वैज्ञानिक महत्व  

भारतीय संस्कृति में जीवन शैली को भी उच्चतम जीवन शैली बनाने हेतु एवं स्वस्थ जीवन के निर्वाह हेतु त्योहारों को भी वैज्ञानिक रूप से संजोया गया है. हमारे द्वारा मनाए जाने वाले सभी धार्मिक त्योहारों के पीछे पूर्ण वैज्ञानिक कारण होते हैं. होली का समय दो ऋतुओं के संक्रमण काल का समय होता है, जिससे मानव शरीर रोग और बीमारियों से ग्रसित हो जाता है. होली वसंत ऋतु में खेली जाती है जो सर्दियों के अंत और गर्मियों के आगमन के बीच की अवधि है. ऋतु परिवर्तन की इस बेला में प्रकृति में होने वाले परिवर्तन, वातावरण और साथ ही शरीर में बैक्टीरिया के विकास को प्रेरित करती है, जिससे अक्सर संक्रमण का प्रकोप बढ़ जाता है. इस प्रकार इस समय पर होलिका दहन और होली पर रंगोत्सव भी चिकित्सा और वैज्ञानिक महत्व लिए हुए होते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब होलिका जलाई जाती है तो आस-पास के क्षेत्र का तापमान बढ़ जाता है. ऐसे में जब लोग जलती हुई होलिका की परिक्रमा करते हैं तो अलाव से निकलने वाली गर्मी शरीर में बैक्टीरिया को मार देती है. अग्नि का ताप जहां रोगाणुओं को नष्ट करता है, वहीं खेलकूद की अन्य क्रियाएं शरीर में जड़ता नहीं आने देती और कफ दोष दूर हो जाता है. शरीर की ऊर्जा और स्फूर्ति कायम रहती है, शरीर स्वस्थ रहता है और स्वस्थ शरीर होने पर मन के भाव भी बदलते हैं. मन उमंग से भर जाता है और नई कामनाएं पैदा करता है.

रंगोत्सव का चिकित्सीय महत्व

होली की बात हो और रंगों का जिक्र नहीं हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता. रंगों से ही तो यह दुनिया खूबसूरत है और इनके होने से हमारे जीवन में एक विशेष ऊर्जा का संचार होता है. एक वैज्ञानिक थ्योरी कहती है कि हमारा शरीर अलग-अलग रंगों से बना हुआ है और इस थ्योरी के मुताबिक आधुनिक जीवन शैली के कारण शरीर से कई तरह के रंगों की कमी हो जाती है. इस कमी को पूरा करने के लिए रोगी को उस रंग तत्व को आहार या दवा के रूप में पूर्ति की जाती है. वैज्ञानिकों का कहना है होली में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग रंग एक थेरेपी की तरह भी काम करते हैं. कई तरह के रंग शरीर और दिमाग को संतुलित रखने के साथ ही दिमाग को भी बूस्ट करते हैं जिसे देखने पर शरीर में अच्छे हार्मोन और रसायन रिलीज होते हैं, जो रोगों से राहत दिलाते हैं. वर्तमान में रोगों को खत्म करने वाली कलर थैरेपी भी इसी खूबी का ही हिस्सा है. सामान्यतया होली पर लाल रंग का प्रयोग सबसे ज्यादा किया जाता है और साथ ही नारंगी, गुलाबी, हरे और पीले रंगों का इस्तेमाल का भी प्रचलन है. लाल रंग को अच्छी ऊर्जा और जोश का भी रंग कहा जाता  तो वहीं हरा रंग शीतलता, सुकून और सकारात्मकता का रंग है. इसी प्रकार नारंगी रंग की ऊर्जा बहुत अधिक होती है और इसे खुशियों और मिलनसारिता का प्रतीक भी माना जाता है. इसी प्रकार पीला रंग सुंदरता और आकर्षण का रंग माना जाता है. लाल रंग के अलावा देवताओं को लगाने के लिए भी इस रंग का इस्तेमाल होता है क्योंकि इसे सुख, सम्पदा, आध्यात्म से भी जोड़कर देखा जाता है. प्राचीन समय में जब लोग होली खेलना शुरू करते थे तो उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले रंगों को प्राकृतिक स्रोतों जैसे हल्दी, चुकंदर, नीम, टेसू के फूल आदि से बनाए जाते थे. इन प्राकृतिक स्रोतों से बने रंगों से होली खेलने पर ये शरीर की त्वचा को और निखार देते थे.

गीत-संगीत व खान-पान का भी महत्व  

भारतीय त्योहार की बात हो और उसमें गीत-संगीत एवं खानपान की बात ना की जाये तो त्योहार अधूरा लगता है. वैसे तो ज्यादातर त्योहारों में गायन में भक्ति गीत और खाने में फलाहार का बोलबाला होता है पर होली के त्योहार में इस मामले में भी कई रंग भरे हुए हैं. जहाँ एक तरफ भारतीय शास्त्रीय संगीत तथा लोक संगीत की परंपरा में होली का विशेष महत्व है तो वहीं हिंदी फ़िल्मों के गीत भी होली के रंग में कई रंग भर देते हैं. आज विश्व भर के वैज्ञानिक संगीत का उपयोग विभिन्न प्रकार की शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार के लिए एक थेरेपी के रूप में करने लगे हैं जबकि भारत में होली के साथ ही विभिन्न त्योहारों में गाने-बजाने का प्रचलन हमेशा से है, जो शरीर में नयी ऊर्जा का संचार करते हैं. होली में रंग संग सुरों का अनोखा संगम तो देखने को मिलता ही है साथ ही इसमें पकवानों का अपना अलग ही आनंद है. वैसे तो भारत के सभी तीज-त्योहारों में खानपान का सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व व इतिहास बेहद रोचक है पर जब बात होली की हो तो व्यंजनों की बौछार हो जाती है. इसमें रंगों की मस्ती तो चढ़ती ही है साथ ही मुंह में पानी ला देने वाले व्यंजन भी खूब बनते हैं. ऐसे में जब परिवार के सभी सदस्य मिल बैठकर इन पकवानों को बनाते हैं तो परिवार में संबंधों के समीकरण और मजबूत होते हैं. गुजिया, चिप्स, पापड, मालपुआ, दहीबड़े, शक्करपारे केवल जुबान को ही नहीं बल्कि आपसी रिश्तों को भी स्वाद से भर देते हैं. होली में कुछ जगहों पर भांग के सेवन का चलन भी है. सीखने और याद करने की क्षमता को बढ़ावा देने के साथ ही एकाग्रता की कमी को दूर करने के साथ ही कुछ अन्य बिमारियों में भांग का प्रयोग प्रभावी औषधि के रूप में भी किया जाता है.

होली के विशिष्ट सन्देश को समझें

भारत में मनाये जाने वाले सभी त्योहार अपने आप में विविधता और विशिष्ट सन्देश को समेटे हुए होते हैं. ऐसे में होली इससे कैसे अछूती रह सकती है. होली, जिसको सम्पूर्ण भारत के मंगल उत्सव के रूप में ख्याति प्राप्त है और जो कि भारतीय पर्व एवं परम्पराओं के आनंदोत्सव में सर्वोपरि स्थान रखता है, इसका संदेश भी विशेष ही है. अंग्रेजी भाषा में होली शब्द का अर्थ होता है पवित्रता. जहां एक ओर इसके प्रारम्भ में होलिका दहन यानी नवसस्येष्टी यज्ञ के द्वारा अग्नि को सभी कुछ समर्पण कर अन्याय व अधर्म पर भक्ति व सत्य की जीत के संदेश के साथ ही साथ “इदन्नमम” यानी “यह मेरा नहीं है” का भाव भी जाग्रत होता है तो वहीं इस त्योहार के समापन में दुश्मन को भी गले लगा लेने का भाव स्पष्ट दिखाई देता है. जिस प्रकार अग्नि अपने भीतर सबको समाहित करने के पश्चात स्वाह कर वातावरण में ऊष्मा व ताजगी भर देती है, उसी प्रकार होली का त्योहार भी आपसी मनमुटाव व राग-द्वेष भुलाकर एक रंग में रंगने का सन्देश प्रदान करता है. मनमुटाव छोड़ इस दिन शत्रु भी गले लग कर ‘बुरा न मानो होली है’ का घोष करने लगते हैं और बड़ी से बड़ी शत्रुता भी होली के रंगों में घुल-मिल कर दोस्ती के रंग में रंग जाती है.

हम सभी भाग्यशाली हैं कि हमारे पूर्वज ऐसे ऋषि-मुनि थे जिन्होंने अपनी दूर-दृष्टि से हम सभी के जीवन के संतुलित विकास हेतु तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाने के लिए सृष्टि रचना में हमारी भागीदारी बराबर हो, इस हेतु व्रतों, पर्वों, यज्ञों का ज्ञान-विज्ञान रचा. सामान्य जन को इन त्योहारों में केवल उल्लास, उमंग, अस्थाई आनंद जैसी ही बात समझ आती है तो कोई बात नहीं. उन्हें लगता है कि सिर्फ बाहरी रंग-रोगन करवाकर, नए कपड़े पहनकर, स्वादिष्ट पकवान बनाकर, घूम-फिर कर, या फिर मंदिर में घंटी बजाकर, त्योहार से सम्बंधित प्रक्रिया पूरी हो गयी तब भी कोई बात नहीं. क्योंकि भारतीय समाज की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ हमेशा से कुछ विचारशील व्यक्ति समय काल एवं परिस्थिति के अनुसार परम्पराओं को विवेकयुक्त एवं कालजयी बनाये रखते हैं. आइये हम सब भी इस दिशा में कुछ सकारात्मक प्रयास करें और साथ ही होली जैसे त्योहार से मिलने वाली महत्वपूर्ण सीख के सौन्दर्य को समझें. होली जीवन को खुशहाल व रिश्तों को मजबूत बनाने में अटूट कड़ी की भूमिका निभाती हुई उमंग और उत्साह की नई लहरों को जन्म देती है. उत्साह और उमंग की इस नयी लहर को सकारात्मक दिशा देते हुए सभी संकल्प लें कि इस बार होली के रंग संग सभी राग-द्वेष भुलाकर हमें अपनों के रंग में रंग जाना है.

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