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नवसंवत्सर – संदेश नव सृजन का

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संवत्सर अर्थात समय को काल खंड में विभाजित करने की विश्व की प्राचीनतम पद्धति. एक ऐसी पद्धति जिसकी खोज तत्कालीन भारतीय वैज्ञानिकों यानि हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा की गयी और जो आज भी वैज्ञानिकता की हर कसौटी पर खरी उतरती है. संवत्सर से ही मिलता जुलता शब्द संवत्सरी भी है, जो कि संस्कृत भाषा से निकला हुआ शब्द है और इसका शाब्दिक अर्थ है – एक दिन, एक ऐसा दिन जो हर वर्ष आता है. विज्ञान को जानने समझने वाले यह जानते हैं कि धर्म के बगैर विज्ञान अधूरा है और इसके लिए नव संवत्सर से बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है. स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि जहां विज्ञान खत्म होता है, वहां से अध्यात्म आरंभ होता है और अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी माना कि धर्म के बगैर विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बगैर धर्म अंधा है. तो आइए सनातन धर्म द्वारा आधुनिक विज्ञान को नव संवत्सर के नाम से प्रदत्त इस अभूतपूर्व पूंजी को हम भी एक बार पुनः स्मरण करें और भारत की ऋषि संस्कृति से जुड़े होने पर गौरवान्वित महसूस करें.

अद्भुत और अकल्पनीय-
ब्रह्माण्ड में सभी ग्रहों उपग्रहों की अपनी-अपनी गति होती है जैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम भी रही है तो साथ ही सूर्य की परिक्रमा भी कर रही है और चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर काट रहा है. सृष्टि की रचना के साथ ही ये सभी गतिविधियां बड़े ही नियमपूर्वक होती चली आ रही हैं. ग्रहों और उपग्रहों की इन्हीं गतिविधियों के कारण ही प्रकृति, जलवायु और ऋतुओं में परिवर्तन होते रहते हैं और इस परिवर्तन का प्रभाव पृथ्वी पर हम महसूस करते रहते हैं. लेकिन जरा सोचिए कि आज से हजारों साल पहले जब ना तो कोई संसाधन था और ना ही कोई संचार का माध्यम और ना ही इतनी उन्नत तकनीक पर बावजूद इन सबके हमारे पूर्वजों द्वारा इन जटिल गतिविधियों का अध्ययन और विश्लेषण कैसे किया गया होगा. उनके अध्ययन और विश्लेषण का दायरा भी सीमित नहीं था बल्कि उसके आधार पर गणना करते हुए जीव-जंतुओं एवं प्रकृति पर इसके प्रभावों का अध्ययन भी करना, निःसंदेह आज की उन्नत तकनीक की तुलना के लिहाज से सचमुच बेहद अद्भुत, अकल्पनीय और अभूतपूर्व ही कहे जा सकते हैं. जिन लोगों का जुड़ाव कभी गांव से रहा होगा उनको कभी न कभी ऐसी तकनीक का अनुभव जरूर हुआ होगा जब गांव के किसी बड़े-बुजुर्ग ने प्रकृति के मूड को भांपकर भविष्यवाणी की होगी और अगले दिन वो सच भी साबित हुआ होगा. ऐसे में मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर वो कौन सी कला और कैसा ज्ञान होगा जिससे हवा का रुख, बादलों की आवाज ही, उनका रंग, पक्षियों का फुदकना, चिड़ियों की चहचहाहट, चींटियों का रेला आदि को देखकर ऐसी भविष्यवाणी कर दी जाती थी, जो आज के मौसम वैज्ञानिकों को भी चौंका दे. निश्चित रूप से जिन ऋषि मुनियों ने इस अध्ययन को किया होगा, उनकी दिव्य शक्तियों और उनके ज्ञान के अद्भुत और अथाह भण्डार के बारे में सोचकर किसी का भी मन रोमांचित हो उठे.

शोध का विषय-
आज जब हमारे पास तमाम उपकरण आसानी से उपलब्ध हैं तो ऐसे में हमें दिन और समय का लेखा-जोखा रखना बड़ा आसान सा कार्य लगता है. ज्यादा समय नहीं बीता जब दीवार पर टंगा हुआ कैलेंडर दिन और तारीख बता देता था, कलाई से लिपटी हुई घड़ी समय की सूचना दे देती थी और कैलकुलेटर जरूरी गुणा-भाग और जोड़-घटाव का काम निपटा देता था. पर अब ये सब बीते दिनों की बात हो गयीं. समय तेजी से बदला और अब हर हाथ में दिनों दिन ज्यादा स्मार्ट होता जा रहा मोबाईल फोन और उसमें मौजूद एप्लीकेशंस आपको मौसम के साथ ही आपकी भी गतिविधि के लिए भी सचेत करते रहते हैं. कलाई पर सजी स्मार्ट वाच, बगल में टेबलेट या लैपटॉप और इन सबको विभिन्न सूचनाओं से अपडेट रखने के लिए तेज गति का इंटरनेट हर जगह मौजूद है. कैलेंडर और कलाई पर बंधी या दीवार पर टंगी टिक-टिक करती घड़ी तो हम सब बचपन से देखते आ रहे थे, लेकिन मोबाइल, कंप्यूटर और इंटरनेट के चलन को तो बमुश्किल तीन-चार दशक ही हुए हैं. तो फिर आखिर ऐसी कौन सी तकनीक थी जिसकी बदौलत हमारे पूर्वज ग्रहों नक्षत्रों की चाल को पढ़ लिया करते थे. निश्चित रूप से आज की पीढ़ी के लिए यह शोध का विषय होना चाहिए कि जब इनमें से कुछ भी नहीं था तब इतने सारे अध्ययन के लिए किस तकनीक का सहारा लिया गया होगा.

धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक आयोजन-
दरअसल वर्षों तक ब्रह्माण्ड में सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की आपसी चाल और संबंधों के कारण घटित होने वाली घटनाओं और फिर इनके कारण ऋतुओं में होने वाले परिवर्तन को हमारे ऋषि–मुनियों ने अपनी विशेष दृष्टि से परखा. उनकी यही विशेष दृष्टि, उनकी यही कला, विरासत में हमारे बुजुर्गों को मिली. संवत्सर की यह गणना निश्चित रूप से असाधारण और अद्वितीय थी क्योंकि तमाम खोजों के बाद भी इसकी वैज्ञानिकता में कोई कमी नहीं आई. जानकारी के अभाव में कोई नव संवत्सर को हिन्दुओं का धार्मिक पर्व या आयोजन कह सकता है परन्तु वास्तविकता तो ये है कि यह पर्व जितना धार्मिक है उतना ही या शायद उससे भी कहीं ज्यादा वैज्ञानिक भी है. इसलिए यह कहना सर्वथा उचित होगा कि हमारे ऋषि मुनि उस समय के श्रेष्ठतम वैज्ञानिक थे, जिन्होंने पूरी दुनिया को संवत्सर नाम का एक अचूक उपकरण प्रदान किया. तब से लेकर आज तक संवत्सर नाम का यह उपकरण बिना किसी प्रकार की त्रुटि के पूरी दुनिया को समय-काल की गणना में मददगार साबित हो रहा है. हमारे पूर्वजों ने विश्व को यह अद्भुत उपकरण दिया इसलिए हम सभी को नव संवत्सर के दिन सिर्फ धार्मिक आयोजन ना करके गौरवान्वित भी होना चाहिए. सचमुच आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व एक वर्ष के समय चक्र को बारह महीने का एक पूरा काल-चक्र अर्थात संवत्सर घोषित कर देना अचंभित कर देने वाला ही है.

तार्किक और अर्थपूर्ण यात्रा-
एक समय था जब पूरा विश्व इसी संवत्सर आधारित कैलेंडर पर निर्भर था पर इसे हमारे आत्म-पराक्रम के क्षीण हो जाने और आत्म-विस्मृति का नतीजा ही कहा जायेगा कि आज यह कैलेंडर सिर्फ तीज-त्योहारों के दिन जानने के लिए सीमित हो गया है. बदलती तारीखें और दिन देखने एवं तदनुसार कार्य के निष्पादन के लिए अंग्रेजी कैलेंडर की निर्भरता तो समझ में आती है परन्तु ऐसी भी क्या आत्म-विस्मृति कि हमारे बच्चों ने हिंदी में महीनों के नाम को ही विस्मृत कर दिया. ऐसी विस्मृति आत्म-बल की क्षीणता को जन्म देती है. आज बच्चों को हम ये क्यों नहीं बताते कि प्रतिपदा पर सिर्फ नवरात्र की शुरुआत नहीं होती बल्कि प्रतिपदा पर वर्ष का प्रारंभ होना पूरे विश्व में पूर्णतया वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित था. ऐसी विस्मृतियों के लिए हम अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को भी कोस सकते हैं और अजीबो गरीब तर्क भी दे सकते हैं पर हमें इतना तो जरूर करना चाहिए कि कम से कम हम अपनी अगली पीढ़ियों को यह जरुर बताते रहें कि वर्ष के बारह महीनों के जिन नामों का चलन आज है उनका वास्तविक स्रोत भारतीय ज्ञान की दिव्य परंपरा है. हमें अपने बच्चों को यह जरुर बताते रहना होगा कि वर्ष के बारह महीनों का नाम सिर्फ जनवरी, फरवरी से शुरू होकर दिसंबर तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह चैत्र, वैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ से होते हुए अगहन, पौष, माघ, फाल्गुन तक की तार्किक और अर्थपूर्ण यात्रा है. यदि हमने ये सब उन को याद नहीं दिलाया तो वे कैसे यह स्मरण रख पाएंगे कि भारतीय ज्योतिष विद नक्षत्र विद्या में कितने प्रवीण थे.

भारत की ऋषि संस्कृति-
इंटरनेट के ज़माने में जन्में नयी पीढ़ी और फिर अंग्रेजी माध्यम  से शिक्षित हो रहे बच्चे संवत्सर के  बारे में बहुत कम जानते हैं. बच्चे ही क्या अब तो आम लोगों के जीवन में भी धीरे-धीरे नव संत्वसर का अर्थ बस पूजा पाठ तक ही सिमट चुका है और कुछ लोग तो इस पूजा पाठ से भी विमुख होते जा रहे हैं. एक तरफ परिवारों का संयुक्त परिवार से एकल परिवार में सिकुड़ते जाना और दूसरी तरफ शुरुआत से बच्चों की पढ़ाई में अंग्रेजी माध्यम का वर्चस्व, ये दोनों ही मिलकर भारत की ऋषि संस्कृति के लिए चुनौती बन रहे हैं. यह किसी भी प्रकार से हममें से किसी के लिए भी सकारात्मक नहीं है.संभवतः हमसे पहले की पीढ़ियों को इस बात का अंदेशा रहा होगा और इसीलिए उन्होंने इन वैज्ञानिक परंपराओं को सहेजने के लिए तर्क को धर्म से जोड़ा होगा पर अब बच्चे धर्म पर ही तर्क करने लग गए. आधुनिक विज्ञान उन को भाता है पर उन्हें यह नहीं पता कि जिस धरातल पर यह खड़ा है उसकी नींव में भारत की ऋषि संस्कृति ही है. संत्वसर भी अनेकों ऋषियों के हजारों वर्षों के वैज्ञानिक अनुसंधान का ही परिणाम है. आज हम सबको किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए गूगल करना आसान लगता है पर निश्चित रूप से हमारी भावी पीढ़ी को यह याद रखना होगा कि समय काल को मापने का ज्ञान यूनान या फिर बेबी लोन से भारत नहीं आया था बल्कि भारत से वहां ले जाया गया था और फिर उस ज्ञान को आधार बना कर या दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी नक़ल कर उसे नए नामों से पूरी दुनिया में प्रचलित कर दिया गया. यदि हम अपने बच्चों को ऐसी जानकारी देते रहें तो निश्चित रूप से उनको आत्म गौरव का अनुभव होगा अन्यथा किसी भी अविष्कार के पीछे के नाम को ढूंढने पर हमेशा की तरह उनके सामने कोई ना कोई विदेशी नाम ही उभर कर आएगा.

भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता

भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सदियों से इस में एक पल का भी अंतर कभी नहीं पड़ा जबकि पश्चिमी कालगणना में वर्ष के 365 दिनों को व्यवस्थित करने के लिए किसी महीने में 30 दिन तो किसी में 31 दिन रखे जाते हैं और प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित किया जाता है. इसके बावजूद भी लगभग 9 मिनट और11 सेकेंड का समय बच ही जाता है जिसके कारण प्रत्येक चार सौ वर्षों में फिर एक दिन बढ़ाना पड़ता है. करीब दशक भर पहले भी सबसे सटीक मानी जाने वाली पेरिस की अंतर्राष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड धीमा किया गया था. रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 महीने ही होते थे और एक वर्ष में मात्र 355 दिन. बाद में जुलियस सीजर द्वारा इसे 365 दिन का घोषित किया गया. जुलाई माह का नाम भी जुलियस पर पड़ गया. इसी तरह इसके करीब सौ वर्ष बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्त पड़ा. उस समय भी भारतीय कालगणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और भाषा विज्ञानियों के अनुसार सितंबर का अर्थ सप्ताम्बर था यानि आकाश का सातवां भाग, अक्टूबर अष्टाम्बर, नवंबर नवमअम्बर और दिसंबर दशाम्बर. एक तरफ अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितंबर है, दसवां महीना अक्टूबर, ग्यारहवां महीना नवंबर और बारहवां महीना दिसंबर हैं तोदूसरी तरफ इन के शब्दों के अर्थ लैटिन भाषा में 7, 8, 9 और 10 है जो स्वतः व्याख्यात्मक है.

संस्कृति संग विज्ञान के आधार स्तंभ-
भारतीय समय मापन के ज्ञान का यह विकास कभी भी रुका नहीं और वैदिक काल के बाद आर्यभट, वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त जैसी महान विभूतियों ने इसके विकास में अद्वितीय योगदान दिया. आर्यभट खगोलशास्त्री होने के साथ साथ गणित के क्षेत्र में भी अद्वितीय थे. शून्य की खोज, पाई की वैल्यू, साइन के कोष्टक के बगैर गणित और किसी भी तरह की गणना संभव नहीं थी और इन सबका श्रेय जाता है आर्यभट को. इसी तरह विज्ञान के इतिहास में वराहमिहिर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया कि सभी वस्तुओं का पृथ्वी की ओर आकर्षित होना किसी अज्ञात बल का आभारी है. वर्षों बार इस अज्ञात बल को न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण बल का नाम दे दिया. इसी तरह पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है जिसके कारण रात और दिन होते हैं, इस सिद्धांत को निकोलस कॉपरनिकस के बहुत पहले ही आर्यभट ने बता दिया था. इनके आधार पर ही संवत्सर की गणना हुई जिसमें यह निष्कर्ष निकला कि संवत्सर वह समय है जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है. इसलिए संवत्सर की यह काल गणना यूँ ही नहीं की गयी है बल्कि इसके लिए वर्षों तक हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्र तीनों की समन्वित स्थिति को खंगाला और तब जाकर इसका फायदा पूरे विश्व को मिला. यही नहीं भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ बने हमारे समस्त त्योहारों के साथ ही शुभ कार्यों के लिए लग्न और महूर्त की विज्ञान आधारित धार्मिक परंपरा के शुरुआत की नींव भी यहीं से पड़ी. यद्यपि शुभ कार्यों की शुरुआत करने और उसके मुहुर्त को मानने के लिए कभी किसी ने पंचांग को हमारे ऊपर थोपा नहीं और ना ही बाध्य किया बावजूद इसके पंचांग में दर्शाई गयी तिथियों के बंधन में रहकर हमने स्वयं को सुरक्षित महसूस किया और कार्य की सफलता और सुचारू रूप से सम्पन्नता में स्वयं ही आत्मविश्वासी बने.  इन्हीं कारणों से नवसंवत्सर वर्षों से चली आ रही हम भारतीयों की सनातन साधना का विश्वास भी है.

प्रत्येक संवत्सर का होता है विशेष नाम-
भारत में वैसे तो स्वयं की सांस्कृतिक विविधता के कारण वर्षों से कई काल गणनाएं प्रचलित हैं पर इनमें मुख्य रूप से विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी सन, ईसवी सन, वीर निर्वाण संवत, बंग संवत आदि प्रचलित हैं. इन सबमें सर्वाधिक महत्व विक्रम संवत पंचांग को ही दिया जाता है. माना जाता है इसी दिन सृष्टि का आरम्भ भी हुआ था. भारतीय पंचांग में कुल 60 संवत्सरों का उल्लेख किया गया है और ये सभी संवत्सर क्रमवार चलते हैं तथा हर नवीन संवत्सर को एक विशेष नाम से जाना जाता है. इन 60 संवत्सरों को 3 भागों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक भाग 20 संवत्सर के 3 समूहों में विभाजित हैं जो कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव को समर्पित हैं. इन संवत्सरों के नाम इस प्रकार हैं – प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, विषु, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस,  नलिनी, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुंदुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन और अक्षय. अंग्रेजी तिथि के अनुसार इस बार यह नव वर्ष अर्थात 2079 नवसंवत्सर 02 अप्रैल, 2022 से शुरू हो रहा है और ज्योतिर्विदों के अनुसार इसका नाम नलिनी होगा.

भारत की बात निराली है-
निःसंदेह, जब भारतीय नव वर्ष का प्रारंभ होता है, तो चहुं ओर प्रकृति चहक उठती है और फिर भारत की तो बात ही निराली है.  चूँकि धार्मिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि का निर्माण किया था इसीलिए इस दिन विशेष रूप से ब्रह्मा जी, उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवता, यक्ष-राक्षस, गन्धर्व, ऋषि-मुनि, नदी-पर्वत, पशु-पक्षियों, मनुष्यों, कीटाणुओं और उनके उपचारों का भी पूजन किया जाता है. ऋषि याज्ञवल्क्य वाजसनेय द्वारा रचित ग्रन्थ शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रजापति ने अपने शरीर से जो प्रतिमा उत्पन्न की उसको संवत्सर कहा गया है. वेदों में भी नव-संवत्सर का वर्णन है. यजुर्वेद के 27 वें और 30 वें अध्याय में क्रमशः 45 वें और 16 वें मंत्र में इसे विस्तार से बताया गया है. इसकी पुष्टि ऋग्वेद के ऋतसूक्त से भी होती है जिसमें कहा गया है-

समुदादर्णवादाधि संवत्सरो अजायत।

अहोरात्रीणि विद्यत विश्वस्य मिषतो वशी।।

अर्थात प्रजापति ने सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष को रचा और तभी से नव-संवत्सर का आरंभ हुआ.  सृष्टि संवत के प्रारंभ का भी यही समय माना जाता है. इससे सृष्टि की आयु का भी आकलन किया जाता है.  ब्रह्म पुराण में भी कहा गया है कि –

चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि।

शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।

अर्थात चैत्र मास के प्रथम सूर्योदय पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और इसी दिन से विक्रमी संवत की शुरुआत होती है.

नव सृजन का संदेश

याद रहे कि संवत्सर समय नापने की इकाई होने के साथ ही हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन को स्पंदित करने वाला एक महत्वपूर्ण घटक भी है. इसलिए आइये हम सब इस नव वर्ष पर यह प्रण करें कि हम अपने जीवन की नीरसता  को समाप्त कर हर दिन को नए रूप में देखने का प्रयास करते हुए भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए नयी उर्जा और नए उत्साह के साथ मिलजुलकर प्रयास करेंगे क्योंकि भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जिसकी संस्कृति और ज्ञान की अद्भुत विरासत की परंपरा विश्व की समस्त चुनौतियों का समुचित समाधान दे सकता है. इन्हीं शब्दों के साथ एक बार सभी सुधि पाठकों को भारतीय नव वर्ष विक्रमी सम्वत 2079 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. सभी के लिए यह नव वर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी होने के साथ ही सबके यश को नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो. हम सब संवत्सर के नव सृजन के सन्देश से परिचित होते हुए अपनी सभ्यता और संस्कृति को लेकर आत्म गौरव का बोध बनाये रखें और पूरे वर्ष नवसंवत्सर हम सभी के लिए नव सृजन का संदेश देता रहे.

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