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‘सिम्पटम’ नहीं ‘सिस्टम’ ठीक करें

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जन्म से लेकर मृत्यु तक, सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक जीवन में चुनौतियों के साथ समस्यायें आती रहती हैं पर याद रखने वाली बात यह है कि जहाँ समस्या है समाधान भी वहीँ है. प्रयास बस यह करना है कि समस्या जितनी बड़ी हो, समाधान भी उसी अनुपात में ढूंढते रहना होगा जिससे उसका पूर्ण निदान हो सके.


आज शरीर से लेकर समाज तक में अनेकों प्रकार की बीमारियाँ मौजूद हैं. बुद्धिजीवी वर्ग इन बिमारियों के निदान के लिए रात-दिन एक किये हुए हैं पर जैसे ही किसी एक बीमारी का उपचार मिलता है दूसरी मुंह बाए खड़ी रहती है. कारण यही है कि हम शारीरिक और सामाजिक बीमारी के लक्षणों अर्थात सिम्पटम को ही आधार मानकर उस पर केन्द्रित हो जाते हैं जबकि ऐसे किसी भी सिम्पटम का उत्पन्न होना यह दर्शाता है कि हमारे सिस्टम में कहीं ना कहीं खराबी की शुरुआत हो चुकी है जिसे समय रहते ठीक नहीं किया गया तो वह कभी भी पूरा का पूरा सिस्टम ही बर्बाद कर देगा. राष्ट्र यदि एक सिस्टम है तो जाति, मजहब, भाषा, क्षेत्र आदि इसके सिम्पटम हैं. राष्ट्रवाद को भूलकर जातिवाद, मजहबवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद अपनाना क्या है? यह भी तो यही दर्शाता है कि कहीं ना कहीं ऐसे सिम्पटम हमारे सिस्टम को नुक्सान पहुंचा रहे हैं.


योग गुरु स्वामी रामदेव भी तो यही कहते हैं कि समाज में जितनी भी बुराइयाँ हैं उन सभी का समाधान योग में है पर कुछ लोग योग को लेकर भ्रान्ति फैलाते रहते हैं. वास्तविकता तो यही है कि योग ना सिर्फ बिमारियों के सिम्पटम को ही दूर करता है अपितु यह पूरे के पूरे सिस्टम को ही ठीक कर देता है. यहाँ योग का मतलब सिर्फ आसन या प्राणायाम से नहीं है बल्कि योग का मतलब अष्टांग योग से है जिसमें सामाजिक और व्यक्तिगत आचरण के नियमों का पालन भी शामिल है.


ज्यादातर लोग योगाभ्यास को शारीरिक बिमारियों को दूर करने से जोड़कर ही देखते हैं और कुछ विशेष आसनों और प्राणायामों को ही योग समझते हैं पर आसन और प्राणायाम तो योग के दो मुख्य अंग मात्र हैं जो शरीर के आतंरिक और वाह्य सिस्टम में आ रही कमियों को दूर करने में सहायक हैं.


Wrikshasanयोग की पौराणिक मान्यता है कि इससे अष्ट चक्र अर्थात मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, ह्रदय, अनाहत, आज्ञा एवं सहस्त्रार जागृत हो जाते हैं और चिकित्सा विज्ञान में इन आठ चक्रों को ही रिप्रोडक्टरी, एक्स्क्रेटरी, डाइजेस्टिव, स्केलेटन, सर्कुलेटरी, रेस्पिरेटरी, नर्वस एवं एन्डोक्राइन सिस्टम कहा जाता है. यदि हमारे ये आठों सिस्टम संतुलित हैं और ठीक से कार्य कर रहे हैं तो शरीर में बीमारी का कोई भी सिम्पटम नहीं आ सकता और यदि आएगा भी तो स्वतः नष्ट हो जायेगा. इन आठ सिस्टम को संतुलित बनाने के लिए ही योग ऋषि स्वामी रामदेव ने आठ प्राणायामों का एक पूर्ण पॅकेज दिया है जिसमें भस्त्रिका, कपालभाती, वाह्य एवं इसकी सहायक क्रिया अग्निसार, उज्जायी, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, उदगीथ एवं प्रणव का ध्यान हैं. इन आठ प्राणायामों का नियमित अभ्यास हमारे आठों सिस्टम को संतुलन बनाकर हमें पूर्ण आरोग्य प्रदान करने में सक्षम है. भस्त्रिका, कपालभाती व बाह्य प्राणायाम  की प्रक्रियांयें जहाँ हमारे रिप्रोडक्टरी, एक्स्क्रेटरी, डाइजेस्टिव व स्केलेटन सिस्टम को समग्र रूप से संतुलित व स्वस्थ बनाती हैं वहीँ अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, उदगीथ व प्रणव प्राणायाम सर्कुलेटरी, रेस्पिरेटरी, नर्वस एवं एन्डोक्राइन सिस्टम को पूर्णतः संतुलित कर हमें सम्पूर्ण आरोग्य देती हैं.


हमारे शरीर के भीतर लगातार परिवर्तन घटित होता रहता है यदि यह परिवर्तन सही दिशा में नहीं हुआ तो आतंरिक हारमोन, रसायन, साल्ट, अन्तःस्रावी ग्रंथियां असंतुलित होती हैं जोकि बीमारी की कारक बनती हैं. यह परिवर्तन सही दिशा में हो इसके लिए जरुरी है प्राणायाम का नियमित अभ्यास. आधुनिक चिकित्सा पद्धति में सिम्पटम बदलने के साथ ही दवा बदल जाती है पर प्राणायाम पूरे सिस्टम पर एक साथ कार्य करता है. अतः नियमित योग करें और ‘सिम्पटम’ नहीं अपने पूरे ‘सिस्टम’ को ठीक करें.

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