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उर्जावान युवा भारत

WHO WE ARE

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कानून व्यवस्था को लेकर बारबार कठघरे में खड़े होने वाले उत्तम प्रदेश अर्थात उत्तर प्रदेश जिसे यहाँ के नीति निर्धारक उम्मीदों का प्रदेश भी कहते हैं एक बार फिर से सुर्ख़ियों में है पर इस बार यह सुर्खी यहाँ की कानून व्यवस्था को लेकर नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था और रोजगार को लेकर है.

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जहाँ एक तरफ प्रदेश के शिक्षा मित्रों ने अपनी मांगों को लेकर मोर्चा खोल रखा है वहीँ दूसरी तरफ शिक्षित लोगों की वेदना भी प्रकट हो रही है. यानि पढ़ाने वाला भी परेशान है और जो पढ़-लिख कर डिग्री हासिल चुका है वह भी परेशान है. यदि शिक्षा मित्रों की बात की जाए तो शिक्षा को अपना रोजगार बनाकर जो लोग अपनी जीविका चलाने के लिए संघर्षरत हैं वे लोग अपनी भूमिका से कितना न्याय कर पाएंगे और शिक्षा के कितने अच्छे मित्र साबित होंगे मुझे इसकी चिंता नहीं है क्योंकि जिन विद्यालयों में उन्हें पढ़ाना है उनके बारे में सब जानते हैं. मेरी चिंता है उच्च शिक्षा प्राप्त उन पढ़े-लिखे बेरोजगारों को लेकर जिनके माता-पिता ने ना जाने किस प्रकार से व्यवस्था करके अपने बच्चे को इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट आदि की पढाई कराई होगी. क्या रहे होंगे उनके सपने यही ना कि बड़ा होकर उनका बेटा या बेटी इंजिनियर, डॉक्टर या मैनेजमेंट गुरु बनेगे? शायद ही किसी माता-पिता ने यह सोचा होगा कि इतना सब कुछ करने के बाद उसे चपरासी बनने की कतार में खडा होना होगा.

उत्तर प्रदेश विधान सभा सचिवालय में 368 चपरासी पद के लिए मात्र 33 दिनों में करीब 23 लाख आवेदन आये जिसके लिए पढाई की योग्यता थी पांचवीं पास. तक़रीबन दस वर्षों बाद चपरासी पद के लिए जारी हुए इस विज्ञापन में ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी रही. आवेदनों की संख्या का पता लगने पर ख़ुशी हुयी कि चलो साक्षरता अभियान सफल हो रहा है. लोग पढ़-लिखकर कम से कम इतने तो होशियार हो ही चुके हैं कि नौकरी के लिए आवेदन भेज सकें. पर झटका तब लगा जब पता लगा कि आवेदकों में पांचवीं पास तो केद्वल 53,000 ही हैं और बाकी के आवेदकों में तो स्नातक, परास्नातक, इंजीनियरिंग, एमबीए के साथ ही पीएचडी डिग्री धारक भी शामिल हैं.

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आंकड़े चौंकाने वाले तो थे ही पर उससे भी कहीं ज्यादा हतप्रभ कर देने वाले थे. अचानक मुझे टीवी पर चलने वाल वह स्लोगन याद आ गया “पढ़-लिख लिख-पढ़ बन होशियार”. मैं सकते में थी कि पढने-लिखने के बाद से चपरासी बन कर कैसे हो सकेगी होशियारी? वैसे होशियारी सरकारी नौकरी में ही संभव है, प्राइवेट नौकरी में होशियारी नहीं चलती.

उत्तर प्रदेश की कुल जनसँख्या करीब 21.5 करोड़ है और आंकलन के मुताबिक यहाँ की साक्षरता दर करीब 67.7 प्रतिशत है. यानि लगभग 14.5 करोड़ लोग साक्षर हैं जिसमें हर उम्र और हर तबके के लोग हैं, रोजगार वाले भी हैं और बेरोजगार भी, बच्चे, युवा, बुजुर्ग भी हैं, नौकरी पेशा वाले भी हैं और सेवानिवृत भी. ऐसे में चपरासी पद के लिए आवेदन आये करीब 23 लाख जो एक अति खतरनाक आंकड़े की ओर इशारा करता है.

देखा जाए तो मिलती-जुलती तस्वीर इसी प्रकार की कई रिक्तियों के लिए और कई प्रदेशों में दिख जाएगी और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में सांख्यिकीय में दिलचस्पी लेने वाले लोग और या सरकार स्वयं ऐसे मामलों के कुछ आंकड़े जारी करेगी पर उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं द्वारा भारी संख्या में चपरासी पद के लिए आवेदन किया जाना निश्चित रूप से युवा भारत के नाम पर इठला रहे भारत जैसे देश  के लिए अत्यंत चिंतनीय है बल्कि चिंतनीय से भी कहीं ज्यादा यह हमारे नीति-निर्धारकों के लिए चुनौती भी है कि – शिक्षा प्राप्ति के बाद क्या?

बढ़ती आबादी के साथ ही बढ़ती बेरोजगारी और फिर सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण जैसे कारण इस समस्या के मूल में गिनाये जा सकते हैं पर समस्याओं को गिना देने भर से समस्या का समस्या का समाधान नहीं हो सकता. अब मैं यहाँ पर यह नहीं कहना चाहती कि यदि आप कसी समस्या का समाधान नहीं हैं तो फिर आप स्वयं में एक समस्या हैं. पर हाँ जब हम निदान की बात करेंगे तो हमें इन कारणों के साथ ही वर्षों से चली आ रही दिशाहीन शिक्षा व्यवस्था पर भी एक नजर डालनी होगी जोकि इस स्थिति के लिए एक और महत्वपूर्ण कारक है  जहाँ शिक्षित होने का अर्थ  है किसी प्रकार डिग्री हासिल कर लेना.

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उम्मीद है दो महीने पूर्व किसी साहसिक पत्रकार द्वारा बिहार में परीक्षाओं के दौरान चल रही ताबड़तोड़ नक़ल की घटना अभी विस्मृत नहीं हुयी होगी और उस घटना पर बिहार सरकार की प्रतिक्रिया भी याद होगी. क्या आपको लगता है कि उत्तर प्रदेश ऐसी बिमारियों से मुक्ति पा चुका है? नक़ल माफियाओं के किस्से और जलवे और चर्चे यहाँ भी कुछ कम नहीं थे. नक़ल करके परीक्षा पास कर डिग्री हासिल कर लेने की प्रथा उपरोक्त वर्णित समस्याओं की कहीं एक कड़ी तो नहीं है जो ना सिर्फ डिग्री की गुणवत्ता खराब कर रही है बल्कि एक अलग प्रकार की चुनौती भी पेश कर रही है.

चुनौतियों की इस कड़ी में अगली चुनौती और समस्या है वर्षों से चली आ रही घिसी-पिटी सिलेबस भी. चूँकि मैं स्वयं कला के साथ ही विज्ञान और कंप्यूटर की भी छात्रा रही हूँ और मेरे बच्चे भी अध्ययनरत हैं इसलिए मुझे लगता है कि समय के साथ-साथ शिक्षाविदों को सिलेबस डिज़ाइन पर भी ध्यान देते रहना चाहिए. वर्षों तक कोई विषय  क्यों पढ़ते रहे और उसका क्या और कैसे उपयोग करना है, बच्चे को पता ही नहीं रहता. जबकि होना यह चाहिए कि कक्षा आठ के बाद से ही बच्चे को उसके रूचि के अनुरूप प्रोफेशनल शिक्षा देने की व्यवस्था हो जानी चाहिए. इसलिए बेहतर है कि कक्षा आठ के बाद से ही बच्चों के लिए प्रोफेशनल और कैरियर ओरिएंटेड प्रोग्राम चलाये जाएँ जिससे उनके अंदर की उद्यमिता और प्रतिभा जाग सके और वे मन माफिक अपने हुनर के मुताबिक काम कर सकें.

चुनौतियों कि अगली कड़ी में प्रश्न उठता है तेजी से खुल रहे कॉलेजों पर. अचानक से कुकुरमुत्ते की तरह अनेकों शिक्षण संस्थान उग आये हैं और देखते-देखते आज प्राइवेट इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट जैसे व्यावसायिक कॉलेजों की भरमार हो चुकी है. इन संस्थाओं की गुणवत्ता भी सदेहास्पद है जो आकार में वृहद् और व्यापार में तो निपुण हैं पर अन्दर से खोखले हैं. कुछ कॉलेज को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे मात्र पैसे के इन्वेस्टमेंट के उद्देश्य से ही उसे खोला गया हो. चूँकि इनका स्वामित्व और प्रबंधन बड़ी-बड़ी हस्तियों के हाथ में होता है अतः ज्यादा कुछ कहने और लिखने का फायदा नहीं है. पर इतना अवश्य है कि ये कॉलेज शिक्षा तो पता नहीं क्या देते हैं अलबत्ता स्वयं का व्यवसाय बखूबी कर ले जाते हैं.  ऐसे संस्थानों से प्राप्त डिग्री किसी फॉर्म के डिग्री वाले स्तम्भ को पूर्ण करने तक ही उद्देश्यपरक हैं उससे आगे कुछ भी नहीं.

इसी प्रकार प्रश्न तो अनेकों हैं और उनके उत्तर भी कम नहीं पर क्या उसे हल करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति है हमारे नीति-निर्धारकों में?

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युवा भारत बहुत कुछ करना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है, वह उर्जावान है और उसमें सामर्थ्य भी कम नहीं. बस उसे दिशा चाहिए और थोड़ी सी अनुकूल परिस्थतियाँ चाहिए.

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