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बॉलीवुड की “मिस्ट्री गर्ल”

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60 का दशक हिंदी सिनेमा जगत का सुनहरा दौर माना जाता है। इसके पीछे का कारण है इस दौर के सदाबहार गानें। फिल्में; जिन्हें कभी नही भुलाया जा सकता। संगीत; जो जन्म जन्मांतर के लिए अमर बन गया। इसी दौर की देन है सिनेमा जगत की एक खूबसूरत नायिका जो उस दौर की जवां लड़कियों की फैशन आइकॉन बन गई। एक ऐसी अभिनेत्री जिसका हेयर स्टाइल पूरे भारत में उसी के नाम से मशहूर हो गया। और इस मशहूर अदाकारा का नाम है- साधना।

2 सितम्बर 1941 को कराची (पाकिस्तान) में जन्म लेने वाली साधना जी का नामकरण उनके पिता ने अपनी मनपसंद अभिनेत्री व डांसर साधना बोस के नाम पर किया था। साधना शिवदासानी सिंधी परिवार से थीं। उनके चाचा हरि शिवदासानी उस समय के जाने माने अभिनेता थे। उन्होंने श्री 420, संगम, सत्यम-शिवम-सुंदरम आदि 70 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। हरि शिवदासानी की पुत्री और साधना की चेचेरी बहन हैं – बबिता। जी हाँ, करिश्मा कपूर और करीना कपूर की माँ, बबिता जी।

साधना जी का परिवार 1950 में विभाजन के समय कराची से मुम्बई आ गया। विभाजन की त्रासदी के चलते साधना जी वर्षों तक स्कूल नही जा सकीं। साधना जी की माँ एक अध्यापिका थीं। अतः उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर उनकी माँ द्वारा ही हुई। मुम्बई में बस जाने के बाद साधना जी का दाखिला ऑग्ज़ीलियम कान्वेंट स्कूल, वडाला में चौथी कक्षा में कराया गया। किन्तु साधना जी की बुद्धिमत्ता एवं ज्ञान को देखते हुए उन्हें सीधे पांचवी कक्षा में बिठा दिया गया। स्कूल की प्रिंसिपल ने साधना जी की प्रारंभिक शिक्षा को उत्कृष्ट बताते हुए उनकी माँ की तारीफ की और बधाई भी दी। वे बहुत मेधावी छात्रा थीं। स्कूली शिक्षा खत्म होने के बाद उन्होंने जय हिंद कॉलेज, मुम्बई में प्रवेश लिया।

कॉलेज में अकादमिक विषयों में वे पारांगत थीं। सांस्कृतिक गतिविधियों में भी वे बढ़चढ़कर हिस्सा लेतीं। यहीं से लोगों को साधना जी के भीतर का कलाकार नज़र आने लगा। साधना बचपन से ही अभिनेत्री बनना चाहती थीं जिसमें उनके पिता ने उनका भरपूर सहयोग दिया। 1955 में आई राजकपूर जी की फ़िल्म श्री 420 के गाने में साधना जी ने कोरस गर्ल का रोल किया था। वह प्रसिद्ध गाना है- “मुड़-मुड़ के ना देख, मुड़-मुड़ के।”

1957-58 के दौरान कॉलेज में प्रोड्यूसर टी०एन०बिहारी की सिंधी फ़िल्म के लिए ऑडिशन्स हो रहे थे। साधना जी ने भी ऑडिशन दिया। ऑडिशन लेने वाले ने साधना जी के दमदार अभिनय की एक झलक सिंधी नाटक के दौरान देख रखी थी। इसलिए साधना जी को इस फ़िल्म में ले लिया गया। इतना ही नही साधना जी को उस समय की प्रसिद्ध सिंधी अदाकारा शीला रमानी की छोटी बहन का महत्वपूर्ण किरदार दिया गया। इसी सिंधी फ़िल्म से इनका सिनेमा का सफर शुरू हुआ। यह फ़िल्म 1958 में आई जिसका नाम था- “अबाना” (पैतृक घर)। यह फ़िल्म विभाजन की घटना पर आधारित थी। साधना जी को इस फ़िल्म में काम करने के लिए ₹1 मेहनताने के रूप में दिया गया।

इस फ़िल्म में साधना जी के काम को खूब सराहा गया। फ़िल्म सुपरहिट रही। फिल्म की रिलीज पर “The Indian Express” की साप्ताहिक फिल्मी पत्रिका “स्क्रीन” ने साधना जी की फोटो को मुख पृष्ठ (आवरण) पर जगह दी। हिंदी सिनेमा जगत के उस समय के प्रसिद्ध और अग्रणी निर्माता-निर्देशक साशाधर मुखर्जी ने साधना जी की फोटो को देखा। फोटो देखते ही उन्होंने साधना जी को अपनी अगली फिल्म लव इन शिमला के लिए साइन कर लिया। वे उस समय 15 साल की थीं। उनमें परम्परागत अभिनेत्रियों की भांति मैच्योरिटी नही थी लेकिन शरारती, चुलबुली, मासूमियत इस किरदार की माँग थी जो निर्माता-निर्देशक को साधना जी में दिखाई दी।

निर्माता-निर्देशक साशाधर मुखर्जी ने उसी समय अपना नया प्रोडक्शन हाउस शुरू किया था। जिसका नाम था-“फिल्मालय।” मुखर्जी के सुपुत्र राम कृष्ण नैय्यर (R. K. नैय्यर) और फ़िल्म के अभिनेता जय ओम यादव मुखर्जी (Joy Mukherjee) की भी यह पहली फ़िल्म थी। सबकुछ नया होने के कारण मुखर्जी साहब को सब कुछ ध्यानपूर्वक करने की आवश्यकता थी। सब नया होने के कारण वे घबरा भी रहे थे। जब भी मुखर्जी साहब किसी नए व्यक्ति को कैमरा टैस्ट, स्क्रीन टैस्ट आदि के लिए बुलाते तो साधना जी को मेकअप करा सामने खड़ा कर देते। उससे कुछ डायलाग बुलवाते, एक्ट करवाते, टैस्ट शूट करते।

 

 

इन सबसे साधना जी मॉडल बन गईं। धीरे-धीरे वो कैमरा फ्रेंडली ही गईं। कहते हैं- “Practice make man perfect” इस अभ्यास से उनमें गज़ब का आत्मविश्वास आ गया। मुखर्जी साहब ने फ़िल्म की शूटिंग से पहले ही साधना जी और जॉय मुखर्जी को अपने एक्टिंग स्कूल में ट्रेनिंग दिलवाई। इस तरह फिल्मालय प्रोडक्शन के बैनर तले, आर०के०नैय्यर के निर्देशन में, साधना जी और जॉय मुखर्जी की पहली हिंदी फिल्म एक साल में बनकर रिलीज हो गई। फ़िल्म बॉक्स ऑफिस में हिट रही साथ ही 1960 के दशक की टॉप 10 फिल्मों में शुमार हो गई।

 

 

फ़िल्म लव इन शिमला के दौरान साधना जी के बड़े माथे को बालों से ढकने के लिए पैच या विग लगाने की बात चली। लेकिन डायरेक्टर आर०के०नैय्यर साहब ने पैच या विग के इस्तेमाल से मना कर दिया। वे साधना जी को कैम्पस कॉर्नर के पार्लर में लेकर गए और वहाँ के हेयर स्टाइलिस्ट से कहा कि वे साधना जी के बड़े माथे को उन्हीं के बालों से कवर कर दे। नैय्यर साहब ने हेयर स्टाइलिस्ट को सलाह दी कि वे साधना जी के बालों का लुक हॉलीवुड की अभिनेत्री “ऑड्री हेप्बर्न” (Audrey Hepburn) की तरह फ्रिंज कर दे। उस समय नैय्यर साहब या साधना जी ने सोचा भी नही होगा कि उनले बालों का यह फ्रिंज स्टाइल पूरे हिंदुस्तान में इतना मशहूर हो जाएगा। एक इंटरव्यू के दौरान साधना जी ने बताया कि जब उनसे शुरू-शुरू में उनके हेयर स्टाइल के बारे में पूछा जाता तो वे ऑड्री हेप्बर्न का नाम याद ना आने के कारण बोल देतीं यह साधना कट है। इस तरह यह कट पूरे देश मे “साधना कट” के नाम से ख्याति पा गया।

 

 

साधना जी की पहली हिंदी फ़िल्म लव इन शिमला के दौरान साधना जी और डायरेक्टर नैय्यर साहब दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे। साधना जी उस समय 16 साल की थीं। दोनों का ही प्रोफेशनल करियर शुरुआती दौर में था।। दोनों को अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित होना था। साधना जी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ आदि और अनेक कारणों से दोनों को लगा इस तरह के फैसले लेने का समय अभी नही आया है। दोनों अपने-अपने कामों में मशगूल हो गए।

 

इन्हीं शुरुआती दिनों में साधना जी को डायरेक्टर महेश कोल से मिलने का मौका मिला। उस समय कोल साहब मशहूर अभिनेता राजेन्द्र कुमार और कामिनी कदम को लेकर फ़िल्म बना रहे थे। कोल साहब ने साधना जी को शूटिंग पर बुलाया। फ़िल्म की शूटिंग महाबलेश्वर में हो रही थी। साधना जी वहाँ पहुँची और उनकी पहली मुलाकात हुई हमारे सिनेमा इंडस्ट्री के “जुबली कुमार” यानि राजेन्द्र कुमार जी से। शूटिंग होने के बाद रोजाना पूरी टीम एक साथ बैठती और खूब हँसी ठिठोली करती। साधना जी का स्वभाव बहुत ही शर्मीला था इसलिए वे उस महफ़िल का हिस्सा न बनकर अपने कमरे में अकेले बैठी रहतीं।

 

 

 

एक दिन राजेन्द्र कुमार साधना जी के कमरे में गए और जबरन उनका हाथ पकड़कर बाहर ले आए। राजेन्द्र जी ने सही मायने में साधना जी को लोगों से घुलने मिलने का पाठ पढ़ाया। उन्होंने धीरे-धीरे प्रोत्साहन देकर उनके अंदर की झिझक को बाहर निकाल फेंका। इसी बीच महेश कोल साहब ने साधना जी को अपनी एक फ़िल्म में काम करने का ऑफर दिया। साधना जी ने कोल साहब के ऑफर को ठुकरा दिया क्योंकि उनका रोल सेकिण्ड लीड में था। जबकि लव इन शिमला में वे मुख्य भूमिका में थीं। साधना जी महाबलेश्वर से मुम्बई वापिस आ गईं। राजेन्द्र कुमार जी की अमिट छवि उन्हें बहुत पसंद आई फिर वे दोबारा काफी समय बाद मिले मेरे महबूब के सेट पर। दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। दोनों ने एक साथ कई फिल्मों में काम किया जैसे- “मेरे महबूब”, “आरज़ू”, “आप आए बहार आई”।

 

 

 

लव इन शिमला के दौरान उस समय के सुप्रसिद्ध निर्देशक विमल रॉय की फ़िल्म परख साधना जी को मिल गई। इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि भारतीय लोकतंत्र पर आधारित थी। इस फ़िल्म में साधना जी ने एक गांव की लड़की की भूमिका निभाई। इस फ़िल्म ने ढेरों पुरस्कार प्राप्त किए। 1961 में आई साधना और देव आनंद जी की फ़िल्म हम दोनों। यह फ़िल्म सुपरहिट रही। इस ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म को रंगीन बनाकर एक बार फिर 2011 में रिलीज़ किया गया। इस फ़िल्म का एक गाना “अभी ना जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नही”। उस समय के जवां दिलों का गान बन गया। हिंदी सिनेमा जगत के बादशाह शाहरुख खान और बेजोड़ निर्देशक संजय लीला भंसाली ने इस गाने को सर्वाधिक रोमांटिक गाने की उपाधि दी। 2011 में शाहिद कपूर और सोनम कपूर अभिनीत फिल्म मौसम में भी इस गाने को स्थान दिया गया।

 

 

 

1962 में, देव आनंद और साधना जी की जोड़ी ने एक बार दोबारा ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्म असली नकली में दर्शकों का मन को मोह लिया। उसी वर्ष जॉय मुखर्जी और साधना जी की जोड़ी एक बार फिर राज खोसला निर्देशित फिल्म एक मुसाफिर एक हसीना में दिखाई दी। 1963 में, साधना जी ने अपनी पहली टेक्नीकलर फ़िल्म मेरे  महबूब में काम किया। इस फ़िल्म का निर्देशन हरनाम सिंह रावेल जी ने किया था। इस फ़िल्म में साधना जी के मित्र राजेन्द्र कुमार मुख्य भूमिका में थे। साधना जी की माताजी राजेन्द्र कुमार की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। शूटिंग के दौरान वे रोजाना राजेन्द्र साहब से पूछतीं- “बेटा कल क्या खाओगे?” कुमार साहब का जवाब होता- “आप सिंधी खाना तो खिलाती ही नहीं।” इस तरह रोजाना खाना कुमार साहब की फ़रमाईश का होता जिसे साधना जी की माताजी बनाकर लाती थीं।

 

 

 

इस फ़िल्म की शूटिंग के दिनों में बढ़ोतरी होती जा रही थी। रावेल जी को समय सीमा ऊपर होने का डर सताने लगा। उन्होंने साधना जी से रविवार को भी शूटिंग करने को कहा लेकिन साधना जी ने रविवार को काम करने से साफ इंकार कर दिया। रावेल साहब ने बहुत कोशिश की लेकिन वे अपने निर्णय से टस से मस नही हुईं। अंत मे मजबूर होकर रावेल जी कुमार साहब के पास गए और उनसे साधना जी को मनाने का आग्रह किया। राजेन्द्र कुमार प्यार से साधना जी को पापा कहकर बुलाते थे। कुमार साहब ने साधना जी से कहा- “क्या पापा, क्या कर रहे हो? इस बार शूटिंग संडे को करते हैं।” उनके इस तरह से आग्रह करने के बाद पापा यानि साधना जी रविवार को काम करने के लिए तैयार हो गईं। मेरे महबूब फ़िल्म 1963 की ब्लॉक बस्टर फ़िल्म रही। इस फ़िल्म ने 1960 के दशक की टॉप 5 फिल्मों में अपनी जगह बनाई।

 

 

अब साधना जी की गिनती 60 के दशक की उत्कृष्ट अभिनेत्रियों में की जाने लगी। साधना जी अपने समय की सबसे अधिक मेहनताना (Highest Paid) लेने वाली अभिनेत्री बन गईं। साधना जी ने उस समय के सभी बड़े-बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया। उन्होंने शम्मी कपूर, देव आनंद, सुनील दत्त, मनोज कुमार, जॉय मुखर्जी, राजेन्द्र कुमार के साथ काम किया। दर्शकों ने राजेन्द्र कुमार और साधना जी की जोड़ी को सबसे ज्यादा पसंद किया। जबकि साधना जी को लगता था कि उनकी जोड़ी शम्मी कपूर और सुनील दत्त के साथ ज्यादा अच्छी लगती है।

 

1964 में, राज खोसला साहब अपनी एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट लेकर साधना जी को सुनाने पहुँचे। साधना जी को कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने क्लाइमेक्स (कहानी का अंत) जाने बिना ही फ़िल्म साइन कर दी। फ़िल्म का नाम था- “वो कौन थी”। इस फ़िल्म में सफेद साड़ी में अपनी सुंदरता बिखेरती साधना, मनोज कुमार के साथ नजर आईं। इस भूमिका द्वारा वे लता मंगेशकर और मदन मोहन के सदाबहार गानों “नैना बरसे रिमझिम-रिमझिम” और “लग जा गले के फिर हसीं रात हो न हो” का अभिन्न हिस्सा बन गई। फ़िल्म बॉक्स आफिस में हिट रही। ये फ़िल्म उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था। पहली बार साधना जी को फ़िल्म फेयर अवार्ड में उत्कृष्ट अभिनेत्री के लिए नामांकित किया गया। जहाँ एक ओर वे आसमान की बुलंदियों को छू रही थीं वहीं दूसरी ओर उनके दिल के कोने में खालीपन दस्तक दे रहा था। साधना जी का पहला प्यार जिससे वे दूर तो अवश्य हो गईं लेकिन दिल से कभी भुला नही सकीं, वह बार-बार उन्हें अपनी ओर खींच रहा था।

 

 

 

उधर नैय्यर साहब का भी यही हाल था। एक दिन उन्होंने साधना जी को फोन किया। पुराने दिनों की यादों मे दोनों खोए हुए थे कि अचानक से नैय्यर साहब ने शादी का प्रस्ताव रख दिया। पहले दोनों ने ही अलग होने का निर्णय लिया था क्योंकि मजबूर हालात इधर भी थे और उधर भी। प्रेम की मजबूत डोर ने दोनो के अलग रहने के निर्णय को शादी के सात फेरों के बंधन में बदल दिया। साधना जी के माता-पिता को यह रिश्ता मंजूर नही था। वे इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे। लेकिन किसी ने सच ही कहा है “जब मियाँ बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी।” माता-पिता को दोनों के प्यार को समझना पड़ा। सगाई का कार्यक्रम नैय्यर साहब के पाली हिल वाले बँगले पर रख गया। फ़िल्म इंडस्ट्री की उस समय तक की यह पहली सगाई थी जिसमें हजारों लोगों को आमंत्रित किया गया था। 7 मार्च 1966 को साधना और नैय्यर साहब विवाह के पवित्र बंधन में हमेशा के लिए बंध गए।

 

 

1966 में ही साधना जी ने राज खोसला निर्देशित फिल्म “मेरा साया” में डबल रोल किया। मेरा साया फ़िल्म तमिल फिल्म “इधाया कमालम” का रीमेक थी। इस फ़िल्म को बनाने में मराठी फिल्म “पाथलाग” से प्रेरणा ली गई थी। फ़िल्म सुपर डूपर हिट रही। सुनील दत्त इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका में थे। इस फ़िल्म का गाना “झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में” बहुत चला। इस गाने को आशा भोसलें जी ने अपनी सुरीली आवाज से सजाया और मदन मोहन जी द्वारा कम्पोजड किया गया। गाने में साधना जी की कोरियोग्राफी सरोज खान ने की जो उस समय सोहनलाल जी की असिस्टेंट थीं। जब यह गाना पर्दे पर चलता तो दर्शक उत्तेजित होकर सिक्के पर्दे की ओर फेंकने लगते। रेडियो पर भी इस गाने की फरमाईश सबसे ज्यादा की जाती थी। “वो कौन थी”, “मेरा साया”, “अनीता” (1967) जैसी सनसनीखेज घटनाओं से लबालब भरी फ़िल्में करने के कारण साधना जी को “मिस्ट्री गर्ल”(Mystry Girl) की उपाधि दे दी गई।

 

 

 

1965 में, यश चोपड़ा साहब द्वारा निर्देशित फ़िल्म वक़्त में मीना की भूमिका में साधना जी ने धमाल मचा दिया। 1965 कि सुपर हिट फिल्मों में वक़्त का नाम भी जुड़ गया। इस फ़िल्म में साधना जी ने चूड़ीदार कुर्ता पहना जो उस समय का फैशन बन गया। साधना जी को एक बार दोबारा से फ़िल्म फेयर अवार्ड में वक़्त की मीना के लिए उत्कृष्ट अभिनेत्री के लिए नामांकित किया गया।

 

 

इसके अलावा साधना जी ने कई सफल किरदारों को निभाया। उन्होंने “राजकुमार” (1964), “दूल्हा-दुल्हन” (1964), “गबन”(1966), “बदतमीज़” (1966), “इंतकाम” (1969), “एक फूल दो माली” (1969), “आप आए बहार आई” (1971), “दिल दौलत दुनिया” (1972), “गीता मेरा नाम” (1974), “सच्चाई”, “इश्क़ पर जोर नही” आदि फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाई। गीता मेरा नाम फ़िल्म में सुनील दत्त और फ़िरोज़ खान साहब थे। इस फ़िल्म के द्वारा पहली बार सरोज खान ने स्वतंत्र रूप से डांस डायरेक्टर का काम किया।

 

 

लव इन शिमला से हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने से लेकर गीता मेरा नाम तक का लगभग 30 फिल्मों से ज्यादा का उनका सफर सुपर डूपर हिट रहा। कहते हैं इंसान जब बुलंदियों को छूता है तब उसे गिरने का डर भी सबसे ज्यादा होता है। साधना जी इस बात से भली भांति परिचित थीं अतः उन्होंने जल्द ही फ़िल्म इंडस्ट्री से स्वयं को अलग कर दिया। 1970 के दशक के मध्य में उन्होंने एक्टिंग को अलविदा कह दिया। एक्टिंग छोड़ने के बाद उन्होंने अपने पति नैय्यर साहब के साथ एक प्रोडक्शन कम्पनी शुरू कर दी। दोनों ने मिलकर डिंपल कपाड़िया अभिनीत “पति परमेश्वर”, “क़त्ल” और “ये जिंदगी कितनी हसीन है” फ़िल्म बनाईं। तीनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही और चल न सकीं।

 

 

इस कारण से दोनों पर वित्तीय अभाव की समस्या आ गई और वे कर्ज़े में डूब गए। इसी चिंता में अस्थमा के कारण आर०के०नैय्यर साहब का 1955 में स्वर्गवास हो गया। अब साधना जी अकेले ही चारों तरफ से कर्जे में घिरी चिंताग्रस्त रहने लगीं। उनके कोई संतान भी नही थी। ऐसे हालातों का सामना करते हुए साधना जी का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरने लगा। उन्हें थॉयराइड रोग हो गया, आंखों से भी कम दिखने लगा था। इलाज़ कराने के लिए वे बॉस्टन भी अकेले ही गईं। कोई भी अपना साथ नही थ। अतः इस कठिन समय का सामना उन्हें अकेले ही करना पड़ा।

 

 

कर्ज़े में जीवन की सारी जमा पूंजी भी चली गई। मुम्बई में आशा भोंसले जी के बंगले में उन्हें किराये पर रहना पड़ा। हायपरथायरोडिस्म नामक रोग से ग्रस्त होने के कारण आंखों से कम दिखने लगा। इसलिए वे मीडिया से भी कटने लगीं। उन्होंने वीडियो या फ़ोटो खिंचवाने से बिल्कुल मना कर दिया। वे अब किसी अवार्ड फंक्शन, पार्टी या समारोह भी नही जाती थीं।  2014 में, कई वर्षों बाद वे गुलाबी साड़ी में रणबीर कपूर के साथ रैम्प पर चलती नज़र आईं। मौका था एक फैशन शो का जिसे कैंसर एवं एड्स पीड़ित मरीजों की सहायता के लिए आयोजित किया गया था।

 

 

साधना जी ने 30 से अधिक फिल्मों में यादगार भूमिका निभाई। उनकी फिल्में भी सुपरहिट रहीं। इन सबके बावजूद उन्हें जीवन मे केवल दो बार उत्कृष्ट अभिनेत्री के लिए नामांकित किया गया किन्तु पुरस्कार नही मिला। वो दो फिल्में थीं- “वक़्त” और “वो कौन थी”। जीवन मे उन्हें सिर्फ एक अवार्ड मिला। 2002 में उन्हें “International Indian Film Academy” द्वारा “Lifetime Achievement Award” से सम्मानित किया गया।

 

 

25 दिसम्बर 2015 को 74 वर्ष की उम्र में मुम्बई के उसी किराये के घर में उनका देहांत हो गया। भले ही साधना जी आज हमारे बीच नही हैं लेकिन उनके यादगार किरदार आज भी हमारे दिलों पर राज करते हैं। उनका वो फ़ैशन आइकॉन रूप में भी हमें हिंदी सिनेमा में आज भी नज़र आता है। चाहे वो साधना कट में ओम शांति ओम की दीपिका पादुकोण हो या फिर फिर चांदनी चौक टू चाइना में उनका किरदार। चूड़ीदार कुर्ता और साधना कट में जब बिपाशा बसु रब ने बना दी जोड़ी के एक गाने में दिखती हैं तो 60 की दशक की साधना जी सहसा आंखों के सामने आ जाती हैं। मैं भी उनके गीत के माध्यम से दिए गए क्षणभंगुर जीवन के सार को कभी नही भूल सकता-

“लग जा गले के फिर हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो न हो।”

 

 

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण जंक्शन किसी दावे या आंकड़ों की पुष्टि नहीं करता है।

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