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ट्रेन का सफर और अमर गीत !!

tarkeshkumarojha
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रेल शहर का निवासी हूं इसलिए अक्सर ट्रेनों से कहीं न कहीं आना-जाना लगा रहता है, लेकिन इस यात्रा में मैं एक नए अनुभव से गुजरता हूं, जो देश की अर्थव्यवस्था व सरकार की ओर से चलाई जा रही तमाम कल्याणकारी योजनाओं पर सवालिया निशान लगाता है। कहीं जाने के लिए घर से निकला हूं।

ट्रेन पकड़ने व अपना शहर छोड़ने से पहले स्टेशन के नजदीक किसी होटल के सामने खड़े होकर चाय पीना मेरी आदत में शामिल है। चाय का कुल्हड़ हाथ में लेते ही हर ओर से मांगने वालों की याचिका हृदय को छलनी कर देती है। टिकट लेने के लिए काउंटर के सामने पहुंचा तो जेब से पैसे निकालते ही दर्जनों हाथ पैसों की ओर इस अपील के साथ बढ़ते हैं कि ‘कुछ दे दो बाबू’।

कुछ मासूम बच्चे तो पैरों में लेट जाने से भी नहीं चूकते और फटकार लगाने पर आक्रामकता के साथ भड़क भी उठते हैैं। लगता है कि उन्हें मांगने के पेशे से जोड़ने के लिए खास तौर से प्रशिक्षित किया गया है। प्लेटफार्म पर खड़े रह ट्रेन की प्रतीक्षा करने के क्रम में भी एक से एक बढ़कर एक दयनीय काया आंखों की सामने से गुजरती है। उनकी हालत देखकर दिल कुछ देने को चाहता भी है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर कितनों को दें।

ट्रेन आई और डिब्बे में प्रवेश किया, तो गाड़ी के रफ्तार पकड़ने के साथ ही एक के बाद एक भिखारी अपनी-अपनी करुण दशा और दलीलों के साथ मांगने के लिए हाथ बढ़ाते हैं। मांगने वालों में मासूम व विकलांग हैं तो बेहद बूढ़े लोग भी। कोई हाथ में सांपों की पोटली लिए घूम रहा है, तो कोई अपनी विकलांगता के नाम पर कुछ मांग रहा है। देश की दुरावस्था पर माथा धुनते हुए ट्रेन कुछ स्टेशनों को पार करती है और इस बीच लोकप्रिय फिल्मी गीतों की धुन मानो कानों में अमृत घोल देती है।

‘बड़ी दूर से आए हैं’ से शुरू होने वाला गीतों का यह सफर ‘चलते – चलते मेरे ये गीत याद रखना ‘ पर खत्म होता है। लेकिन इसके साथ हाथों में छोटा सा माइक्रोफोन पकड़े गायकों की टोली खुद को बेरोजगार बताते हुए यात्रियों से कुछ सहायता की अपील करते हैं। यात्रा के बीच किन्नरों की टोली का अलग आतंक है। इसका वर्णन वही कर सकता है, जो इस आतंक का अनुभव कर चुका है।

ट्रेन स्टेशन पर रुकी और मैं भीड़ को ठेलते हुए किसी तरह प्लेटफार्म पर उतरता हूं और एक साथ दर्जनों हाथ मेरी ओर इस
तरह से बढ़ते हैं मानो मैं कोई सेलिब्रिटी हूं और वे मेरा आटोग्राफ मांग रहे हो, लेकिन कुछ देर बाद ही गलतफहमी का अहसास होता है। मांगने वालों में हर किस्म के जीव शामिल हैं। एक महिला झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की तरह एक अबोध बच्चे को अपनी कमर से बांधे है जबकि तीन बच्चे उसके अगल – बगल चल रहे हैैं।

यात्रियों से मांगने के बीच वह महिला उन बच्चों को अपनी आंचलिक भाषा में कुछ दिशा – निर्देश भी देती जाती है। ऐसे दृश्य देख कर मनरेगा से लेकर मध्यान्ह भोजन और विधवा से वृद्धावस्था पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए उदास मन से मैं फिर उसी यात्रा में शामिल हो जाता हूं।

लेखक- तारकेश कुमार ओझा

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