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ट्रांसजेंडर समुदाय

sochvichaar

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हिजड़ा या किन्नर हमारे समाज का एक ऐसा समुदाय जिन्हें आज भी अनिश्चित रूप से देखा जाता है। भारत में 15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ‘तीसरे लिंग’ को मान्यता दी, जो न तो पुरुष है और न ही महिला यह कहते हुए की “तीसरे लिंग के रूप में ट्रांसजेंडर्स की मान्यता एक सामाजिक या चिकित्सक मुद्दा नहीं है बल्कि एक मानवाधिकार मुद्दा है”।

भारत एक ऐसा देश है जो संस्कृति और पारंपरिक रूढ़ियों में समृद्ध है। हमारा सामाजिक निर्माण ऐसे रूढ़िबद्ध धरना से बना हुआ है की अगर हम इन जाति की तरफ देखते हैं तो वह हमारी नजर में “गलत” ही माने जाते हैं। और कही न कही आज भी यह बात सच है की “तीसरे लिंग” के विशेषाधिकार के बाद भी इन् पर अत्याचार कम नहीं हुए है।

कुछ युवाओं से पूछे गए सवालों से मुझे यह पता चला की उनका अनुमान है कि तक़रीबन 2-3 प्रतिशत ही ‘तीसरे लिंग’ की उन्‍नति हुइ है। मगर जैसा विवेचन उन्हें मिलना चाहिए था वैसा अभी तक नहीं मिला है। हलाकि हाल ही में नोएडा सेक्टर- 50 मेट्रो स्टेशन, ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित किया जा रहा है । आकलन की माने तो उनके समुदाय में वृद्धि तो हुई है मगर बहुत धीमी गति से, उनके विकास के लिए अभी थोड़ा समय और लगेगा।

ज्यादातर ट्रांसजेंडर पढ़े लिखे नहीं है, क्यूंकि जब उनके परिवार वालों को उनकी लैंगिकता के बारे में पता चलता है तो वह उन्हें बेघर कर देते हैं जिसकी वजह से उनका अनुकूलन सही ढंग से नहीं हो पता, और और वह भीख, मांगना लोगों के घरों में जब शादी हो या बच्चा हो तब वहां नाचना और यहाँ तक की सेक्स वर्क जैसे काम करना उनकी रोज़ी रोटी बन जाता है।

इसके अलावा जब लोगों से पूछा जाता है कि वह उनके बारे में क्या सोचते हैं तो अक्सर जवाब यह मिलता है कि उन्हें उनसे कोई गैर वाली अनुभूति तो नहीं होती, मगर एक डर रहता है उनके मन में। क्यूंकि भारत में यह मान्यता सदियों से चलती आ रही है कि किन्नरों की जुबान से निकली गयी बातें उनके लिए अभिशाप और आशीष दोनों हैं।

कुछ घटनाएं ऐसी भी है जिसे नकारा नहीं जा सकता, जिसमें किन्नर समाज अपने इसी भगवान के उपहार का फायदा उठाते हैं और मुंह मांगी रकम ले जाते है; जैसे की जब किसी के ब्याह शादी हो, भले ही वह इतनी रकम न जुटा पाये तब भी उन्हें मुंह  मांगी राशि देनी पड़ती है क्यूंकि अगर मांगी राशि देनी पड़ती है क्यूंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह लोग नग्न होकर लोगों के सामने उन्हें बद्दुआ देंगे और तमाशा करेंगे करेंगे।

इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि किन्नर समाज के समुदाय को अनुकूलन की बहुत जरुरत है। उन्हें पढ़ाना और कौशल बनाना सबसे पहले अनुकूलन होना चाहिए। और साथ अपने समाज में उनकी स्वीकृति बढ़ाने होगी और उनसे किया गया दुर्व्यवहार रोकना होगा तभी यह हमारे समाज का पूरा हिस्सा बन पाएंगे।

 

डिस्क्लेमर- उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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