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राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल को श्रीनगर से वापस भेज दिया गया है।

SYED ASIFIMAM KAKVI

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राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल को श्रीनगर से वापस भेज दिया गया है। विपक्षी नेताओं के श्रीनगर हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद वहां हंगामा शुरू हो गया था। प्रशासन ने उन्हें हवाई अड्डे से बाहर जाने की इजाजत नहीं दी थी। जिसके कारण सभी नेता सुरक्षा बलों की मौजूदगी में वीआईपी लाउंज में बैठे हुए थे। राहुल गांधी के साथ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, एनसीपी नेता माजिद मेमन, सीपीआई लीडर डी. राजा के अलावा शरद यादव सहित कई दिग्गज नेता जम्मू-कश्मीर के हालात का जायजा लेने के लिए घाटी पहुंचे थे। प्रशासन ने उन्हें पहले ही उनसे अपने दौरे को टालने की अपील की थी। विपक्ष के नेताओं को श्रीनगर के एयर पोर्ट के लाउंज में बन्दी बना लिया। साथ गए मीडिया को अलग कर धक्के दिए, पीटा गया। आजतक की महिला पत्रकार को जम कर पीटा। कैमरे फैंके गए। राहुल गांधी, शरद यादव, डी राजा, गुलाम नबी आजाद, मेमन आदि को एक कमरे नें बन्द कर दिया गया। नेताओं को वापिस दिल्ली भेजा जा रहा है। यही है श्रीनगर में अमन शांति की हकीकत। राहुल के अलावा विपक्ष के प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, केसी वेणुगोपाल, सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, जदयू नेता शरद यादव, द्रमुक नेता तिरुची शिवा, राकांपा नेता माजिद मेमन, सीपीआई नेता डी राजा, तृणमूल नेता दिनेश त्रिवेदी और राजद के मनोज झा हैं। राहुल गांधी विपक्षी नेताओं के साथ श्रीनगर हवाई अड्डे पहुंच गए हैं लेकिन उन्हें किसी नेता से मिलने या फिर हवाई अड्डे से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता माजिद मेमन ने कहा कि हमारा मकसद कहीं जाने और गड़बड़ी पैदा करना नहीं है, हम सरकार के विरोध में नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम सरकार के समर्थन में जा रहे हैं ताकि हम भी सुझाव दे सकें कि क्या किया जाना चाहिए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने कहा कि एक तरफ सरकार का कहना है कि स्थिति सामान्य है, दूसरी तरफ वे किसी को भी जाने की अनुमति नहीं देते हैं। आजाद ने सवाल उठाया कि अगर चीजें सामान्य हैं तो राजनीतिक नेताओं को नजरबंद क्यों है? अनुच्छेद-370 खत्म होने के बाद सरकार ने किसी नेता को कश्मीर घाटी में आने की अनुमति नहीं दी है।

पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत क्षेत्रीय दलों के नेता भी नजरबंद हैं। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद को दो बार श्रीनगर और जम्मू एयरपोर्ट से वापस लौटाया गया है। डी राजा को भी श्रीनगर एयरपोर्ट से वापस भेज दिया गया था। इस समय हर चेनल पर अरुण जेटली हैं। अब यह शक़ मजबूत होता है कि श्रीनगर की रिपोर्टिंग पर पर्दा डालने के लिए अरुण जेटली के देहावसान की आधिकारिक घोषणा के लिए आज का दिन चुना गया। राजनीति के दिग्गजों के बीच अरुण जेटली हमेशा ‘स्कॉलर मिनिस्टर’ के तौर पर जाने जाते थे। हर किसी के लिए वह समस्याओं का हल थे और उनका यह रवैया दलीय सीमा से परे था। स्वभाव से विनम्र, बुद्धि से तीक्ष्ण अरुण जेटली रणनीति के माहिर थे और उनकी तर्क और विश्लेषण क्षमता ऐसी थी कि हर मुश्किल का वे जवाब थे और उनका हर जवाब समस्याओं का हल था। खासतौर पर पीएम नरेंद्र मोदी के लिए वे बेहद अहम मौकों पर संकटमोचक बनकर उभरे। शायद यही वजह थी कि एक बार उन्होंने अरुण जेटली को ‘अनमोल हीरा’ करार दिया था। पीएम नरेंद्र मोदी के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले अरुण जेटली 2002 से ही उनके संकटमोचक की भूमिका रहे। यह वह दौर था, जब गुजरात के दंगे सीएम के तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी के लिए परेशानी का सबब बन चुके थे।

नरेंद्र मोदी ही नहीं बल्कि आज के गृह मंत्री अमित शाह के लिए भी जेटली एक दौर में संकटमोचक साबित हुए। तत्कालीन यूपीए सरकार के दौर में अमित शाह को गुजरात से बाहर कर दिया गया था, कानूनी पेचिदगियों में उलझे शाह को तब जेटली ने ही मदद की थी। उस दौर में अकसर अमित शाह जेटली के कैलाश कॉलोनी स्थित ऑफिस में ही दिखते थे और हफ्ते में कई दिन साथ में ही भोजन करते थे। यही नहीं नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए जब पीएम कैंडिजेट घोषित किया गया था तो पार्टी के भीतर असहमतियों को थामने के लिए जेटली कई महीने तक पर्दे के पीछे ऐक्टिव रहे। कहा जाता है कि राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान और नितिन गडकरी जैसे बड़े नेताओं को उन्होंने ही मोदी के नाम पर राजी करने का काम किया। पेशे से वकील अरुण जेटली अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भी मंत्री रहे थे, लेकिन मोदी सरकार में उन्हें वित्त और रक्षा मंत्रालय कई महीनों तक एक साथ संभालने पड़े। शायद इसकी वजह पीएम मोदी का उन पर अटूट भरोसा था। मनोहर पर पर्रिकर की सेहत बिगड़ी तो अरुण जेटली को रक्षा मंत्रालय भी दिया गया। दिल्ली की सत्ता के गलियारे में लंबे समय से पैठ रखने वाले अरुण जेटली 1990 के दशक से ही पीएम नरेंद्र मोदी के करीब थे। दिल्ली में पीएम मोदी के करीबी लोगों में से जेटली ही थे। फिर यह साथ ऐसा बढ़ा कि 2002 के दंगों के बाद कानूनी मदद हो या फिर संसद में हर विपक्षा सवाल का जवाब जेटली हमेशा मोदी और सरकार के लिए कवच की तरह रहे। इशरत जहां से लेकर कौसर बी तक के एनकाउंटर में मीडिया के ज़रिए इनका रुख मोड़ने का असल काम जेटली के था, शाह के वकील वही थे ,बाद में कहते है उन्हीं के पैर के चलते चुनाव हारने के बाद मंत्री बने उसके बाद जो 5 साल उन्होंने किया वो किसी से छुपा नही है लाखो लोगो का रोज़गार छीन लिया गुजरात दंगे याद है और उनके मुजरिमों को बचाने वाला भी याद है।

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