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‘रमजान दूसरो के गम बाटने का महीना है

SYED ASIFIMAM KAKVI

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रमज़ान के मुबारक महीने की, जो आज हमारी दहलीज़ पर क़दम रख चूका है , रमजानुल मुबारक का महीना जुमा से शुरू हो गया. गुरुवार की रात सहरी खाकर रोजे की शुरुआत की गयी. इसके पहले विभिन्न मसजिदों में नमाज-ए-तरावीह अदा की गयी. 18 जून को रमजान के पहले जुमे की नमाज अदा की जायेगी. गुरुवार की शाम से ही यहां चहल-पहल शुरू हो गयी.रमजान इबादत का महीना है. इसे नेकियों का महीना भी कहा जाता है. सुबह से लेकर देर रात तक अल्लाह की इबादत में मशरूफ रहते हैं.
बंदे को हर बुराई से दूर रखकर अल्लाह के नजदीक लाने का मौका देने वाले पाक महीने रमजान की रूहानी चमक से दुनिया एक बार फिर रोशन हो चुकी है और फिजा में घुलती अजान और दुआओं में उठते लाखों हाथ खुदा से मुहब्बत के जज्बे को शिद्दत दे रहे हैं।
दौड़-भाग और खुदगर्जी भरी जिंदगी के बीच इंसान को अपने अंदर झांकने और खुद को अल्लाह की राह पर ले जाने की प्रेरणा देने वाले रमजान माह में भूख-प्यास समेत तमाम शारीरिक इच्छाओं तथा झूठ बोलने, चुगली करने, खुदगर्जी, बुरी नजर डालने जैसी सभी बुराइयों पर लगाम लगाने की मुश्किल कवायद रोजेदार को अल्लाह के बेहद करीब पहुंचा देती है। इस बार अल्लाह के साथ-साथ गर्मी भी रोज़दारों का इम्तिहान लेगी। इस साल 36 साल बाद सबसे लंबा रोज़ा पड़ेगा। इस साल सबसे लंबा रोज़ा 15 घंटे 42 मिनट का होगा, जबकि सबसे छोटा रोज़ा 15 घंटे 30 मिनट का होगा। इस लिहाज से इस बार का रमज़ान रोज़दारों के लिए आसान नहीं होगा। इस माह में रोजेदार अल्लाह के नजदीक आने की कोशिश के लिए भूख-प्यास समेत तमाम इच्छाओं को रोकता है। बदले में अल्लाह अपने उस इबादत गुजार रोजेदार बंदे के बेहद करीब आकर उसे अपनी रहमतों और बरकतों से नवाजता है।
इस्लाम की पांच बुनियादों में रोजा भी शामिल है और इस पर अमल के लिए ही अल्लाह ने रमजान का महीना मुकर्रर किया है। खुद अल्लाह ने कुरान शरीफ में इस महीने का जिक्र किया है।इंसान के अंदर जिस्म और रूह है। आम दिनों में उसका पूरा ध्यान खाना-पीना और दीगर जिस्मानी जरूरतों पर रहता है लेकिन असल चीज उसकी रूह है। इसी की तरबीयत और पाकीजगी के लिए अल्लाह ने रमजान बनाया है। रमजान को सबसे पवित्र महीना माना गया है। यही वह महीना है, जिसके बारे में माना जाता है कि इस्लाम की सबसे पवित्र किताब ‘कुरान’ नाजिल हुई है। इतना ही नहीं मान्यता है कि अल्लाह पाक ने सारी पवित्र किताबें रमजान के महीने में ही उतारी। पैगम्बर हजरत इब्राहिम असैहिस्सलाम का ‘सहीफा’ इसी महीने की तीन तारीख को उतारा गया. हजरत दाउद के ‘जुबुर’ (कुरान जैसी किताब) 18 या 21 को मिली और हजरत मूसा को ‘तौरेत’ 6 तारीख को प्राप्त हुई और हजरत ईसा अलैहिस्लाम को ‘इंजील’ रमजान की 12 से 14 तारीख को प्राप्त हुई. सबसे बड़ी बात यह है कि इस महीने में सत्कर्म नेकी और भलाई की महत्ता को हम शिद्दत से महसूस करते हैं. मान्यता है कि नेक कार्य रोकने से और बुराइयों की तरफ उकसाने वाले शैतान को पकड़ लिया जाता है. पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्लललाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया है. ‘रमजान दूसरो के गम बाटने का महीना है.

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