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मोदी कहते हैं ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज हैं’

SYED ASIFIMAM KAKVI

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मोदी कहते हैं ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज हैं’ लेकिन सच ये है कि सारे बेईमान उनके साथ आ रहे हैं, समझौता हो गया है पैराडाइज़ पेपर्स में नाम आने पर बीजेपी सांसद आरके सिन्हा के ‘मौनव्रत’ रके सिन्हा का नहीं बल्कि ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मौनव्रत है।बहुत हुआ भ्रष्टाचार का वार, अबकी बार मोदी सरकार।” लेकिन पीएम के तमाम वादे धीरे-धीरे जुमले साबित होते चले गए हैं । प्रधानमंत्री के कश्मीर में दिए उस बयान को याद दिलाया जिसमें उन्होंने कहा था ‘ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’।हिमाचल प्रदेश में एक रैली के दौरा पीएम ने भ्रष्टाचार को लेकर एक और बात कही है कि ‘बेईमान लोग मुझसे नाराज़ हैं वो मुझसे बदला लेना चाहते हैं।’ गंगा नहाने से पाप धुलते हैं लेकिन आजकल BJP में आने से भ्रष्टाचार धुल रहे हैं,आलम यह है कि पीएम मोदी बेईमान लोगों से इतना तन्हा महसूस कर रहे हैं कि सुखराम, नारायण राणे और मुकुल रॉय जैसे भ्रष्टाचारियों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। बीजेपी ने मुकुल रॉय को शामिल करके शारदा चिटफण्ड के 17 लाख पीड़ित लोगों के साथ दगाबाजी की है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी के लेकर बीजेपी के नजरिए को भी साफ करता है. भ्रष्टाचार का मामला अगर पुराना हो. मौसम अगर चुनावी हो. नेता अगर वोटजुटाऊ हो तो जो बीत गई सो बात गई कहकर उसे अपने घाट का पानी पीने के लिए बुलाया जा सकता है. भ्रष्टाचारी अगर वोटवैंक वाला हो तो उसके अतीत पर गंगाजल से पोछा मारकर अपने पाले मे लिया जा सकता है। जो बीत गई सो बात गई वाले तर्क के साथ. कविता की ही अगली लाइन जोड़ दें तो कह सकते है ‘जो बीत गई सो बात गई, माना वो बेहद भ्रष्टाचारी था दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी दरिया बन चुकी है तो दरियादिली दिखाने का अधिकार तो है ही. जो भी इस दरिया में आएगा, अपने आप पाक साफ हो जाएगा. गंगा नहाने से पाप धुलते हैं न. तो बीजेपी में आने से भी धुल सकते हैं।भ्रष्टाचार पर ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’ कहने वाले पीएम मोदी जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। उन्हें ऐसे नारे देने का क्या अधिकार है? क्या पीएम के जुमले पर जनता उन्हे कठघरे में खड़ी नहीं कर सकती? प्रधानमंत्री और बीजेपी ने अपने सिद्धांतों से कैसे समझौता कर लिया?जनता से है कि उनके सामने देश में यह सब चीज़े हो रही है लेकिन जनता को कोई हैरत नहीं हो रही है ! 2014 की एक रैली में नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि “क्या ईमानदारी से राजनीति नहीं हो सकती है क्या’? लेकिन सुखराम, नारायण राणे और मुकुल रॉय को बीजेपी में शामिल करके पीएम ने खुद ही अपनी बात को जुमला साबित किया है। 2004 में डीपी यादव के बीजेपी में शामिल होने पर कैसे पार्टी को अाडवाणी और सुषमा स्वराज की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी और डीपी यादव को बीजेपी में शामिल नहीं किया गया और 2012 में बीएसपी नेता बाबू सिंह कुशवाहा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।उन्होंने कहा कि सवाल उस शोर के ना उठने का है जो ऐसे मौकों पर उठा करते थे पार्टी के भीतर से मीडिया से और समाज से। मेरा देश वाकई बदल रहा है जहाँ आक्रोश असल मुद्दों पर नहीं है ।

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