Menu
blogid : 8865 postid : 1173175

बिहार सरकार से इंसाफ की गुजारिश

SYED ASIFIMAM KAKVI

  • 104 Posts
  • 44 Comments

शराबबंदी तोड़ने वाले साधारण से ऊंची पहुंच वाले लोगों को भी जेल का रास्ता दिखाने के लिए कृत संकल्पित बिहार सरकार उस न्यायिक दण्डाधिकारी के खिलाफ क्या कार्यवाई का आदेश जारी करेगी जिनकी नीली बत्ती लगी कार ने सोमवार को दोपहर बाद जहानाबाद के काको के रहने वाले इंजीनियरिंग के दो होनहार छात्रों का कुचल कर मार डाला। न्यायिक पदाधिकारी संजीव के राय की थी गाड़ी बीआर 01पीबी-5569 नंबर की उजले रंग की नीली बत्ती लगी यह कार न्यायिक पदाधिकारी संजीव कुमार राय के नाम से निबंधित है जो भारतीय स्टेट बैंक से निर्गत कार लोन पर लिया गया है। जिस वक्त यह हादसा हुआ उस वक्त इस गाड़ी की पिछली सीट मयखाना में तब्दील थी। अ्रंग्रेजी शराब रॉयल स्टेग का एक खाली अद्धा जिसमें से निकाली गई शराब को मिनरल वाटर के बोतल में डाल कर रखा गया था और पानी की एक अन्य खाली बोतल गाड़ी की पिछले सीट पर पड़ी मिली। इस गाड़ी ने जिन दो छात्रों तौसीफ आलम व अल्तमश आलम को अपना शिकार बनाया वे दोनों पटना स्थित आरपीएस इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र थे और पटना से अपनी बाईक से काको (जहानाबाद) लौट रहे थे।
तभी जहानाबाद की ओर से आ रही जज की कार ने दोनों को कुचल डाला जिसे दोनों की मौत हो गई। गौरतलब है कि नदवां से नीमा गांव के कुछ आगे तक सिंगल रोड है जहां गाड़ियां धीरे ही चलती हैं।दुर्घटना की भयावता से यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि कार चाहे जो चला रहा हो वह नशे में था और कार से अपना नियंत्रण खो चुका था। चर्चा है कि इस गाड़ी पर गया में एसीजेएम पद पर पदस्थापित संजीव कुमार राय और उनका अंगरक्षक भी था जो मौका देखकर या नीमा गांव के ग्रामीणों के सहयोग से किसी दूसरी गाड़ी या चंद कदम पर दूर नीमा हॉल्ट रेलवे स्टेशन से कोई ट्रेन पकड़ फरार हो गए।हालांकि यह पुलिसिया जांच का विषय है कि एसीजेएम खुद गाड़ी में थे या नहीं। गाड़ी में संजीव कुमार राय के नाम से एसबीआइ्र का एक पासबुक भी मिला है जिसपर संजीव राय की फोटो भी लगी है। हालांकि घटना के बाद कुछ दूर आगे एक पेड़ से टकराकर रुकी इस गाड़ी में जख्मी हालत में चालक मिला पर किसी चालक में इतनी हिम्मत नहीं कि वो नीली बत्ती लगी अपने न्यायिक पदाधिकारी की गाड़ी में खुलेआम शराब का सेवन करे। सुप्रीम कोअ्र के एक आदेश के बाद सभी राज्यों के परिवहन विभाग ने एक सर्कुलर जारी कर लाल, पीली और नीली बत्ती के प्रयोग के लिए नियम जारी किया था ऐसी बत्तियां वैसी ही गाड़ियों में लगेंगी जो सरकार द्वारा उपयोग के लिए दी गई हो न कि अपनी गाड़ी में। अगर कोई न्यायिक पदाधिकारी अपनी प्राइवेट गाड़ी में नीली बत्ती का उपयोग करते भी हैं तो वैसे समय तक ही कि जब वो खुद गाड़ी में मौजूद हो अन्यथा इस बत्ती को ढककर रखनी है। कल की घटना के वक्त गाड़ी की बत्ती ढकी नहीं थी जो यह इंगित करता है कि घटना के वक्त एसीजेएम खुद गाड़ी में मौजूद थे। बहरहाल पूरे बिहार में शराबबंदी के बाद किसी न्यायिक पदाधिकारी की गाड़ी में मिली शराब की बोतल पर होने वाली कार्यवाई की ओर अब पूरे बिहार की जनता की नजरें गड़ी हैं.जैसा के आप सभी को पता है के बिहार में पिछले महीने से शराबबंदी से लेकर ताड़ीबंदी तक का कानून लागू हो चूका है इस कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए कड़े जुर्माने के साथ 5 सालों से लेकर 10 सालों तक की सज़ा भी मुकर्रर की जा चुकी है। स्थानीय प्रशासन भी आये दिन छापेमारी और कानून तोड़ने वालों की गिरफ़्तारी करके इसे सख्ती से लागू कराने में जुटी है। मुख्यमंत्री नितीश कुमार जी जो घूम घूम कर इस कानून को बनाने का क्रेडिट ले रहे हैं और बिहार के बाद पूरे देश में इस कानून को लागू करने का शिगुफा छोड़ के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश करने लगे हैं उनके ही अपने राज्य की राजधानी जहाँ वो बैठते हैं वहाँ से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर दो होनहार नौजवान बच्चों को मयखाने में तब्दील न्यायिक दंडाधिकारी संजीव कुमार राय की नीली बत्ती लगी गाड़ी से धक्का मार कर हत्या (हत्या इस लिए कह रहा हूँ के जहाँ शराब पीना ही कानून का उल्लंघन होता हो वहां शराब पि कर किसी को अपने गाड़ी के चक्कों के नीचे किसी को कुचल देना हत्या नहीं तो फिर क्या है?) कर दी जाती है और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगता । पुलिस ने तो घटना के फ़ौरन बाद ही ये कह दिया था के गाड़ी में शराब नहीं थी जबकि अख़बारों में हादसे की खबर के साथ ही गाड़ी की पिछली सीट पर रखे शराब के बोतलों की तस्वीर छपी थी, अगर प्रशासन चाहती तो उसी वक़्त न्यायिक दंडाधिकारी के पास जा कर औपचारिक जानकारी ले सकती थी जिससे उसी वक़्त इस मामले में बहुत कुछ साफ़ हो जाता हालाँकि DTO से भी कुछ ही मिनटों में गाड़ी मालिक का पता लगाया जा सकता था , हादसे को 4 दिन हो जाने पर भी अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी है करवाई तो बहुत दूर की बात है। क्या इन बातों से साफ़ ज़ाहिर नहीं होता के प्रशासन जानबुझ कर मामले को हल्का कर दोषियों को बचाने की कोशिश कर रही है ? मैं जानना चाहता हूँ के क्या सुशासन बाबू का कानून सिर्फ आम आदमियों के लिए है? क्या इस मामले में दोषियों के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज नहीं होना चाहिए ? मन में सवाल बहुत हैं लेकिन मैं जानता हूँ के उससे कोई फायदा नहीं होने वाला है। इंसाफ लेने के लिए आपको एकजुट होकर आवाज़ लगानी होगी तभी बहरी हो चुकी व्यवस्था तक आपकी आवाज़ पहुंचेगी शराबबंदी तोड़ने वाले साधारण से ऊंची पहुंच वाले लोगों को भी जेल का रास्ता दिखाने के लिए कृत संकल्पित बिहार सरकार उस न्यायिक दण्डाधिकारी के खिलाफ क्या कार्यवाई का आदेश जारी करेगी जिनकी नीली बत्ती लगी कार ने सोमवार को दोपहर बाद जहानाबाद के काको के रहने वाले इंजीनियरिंग के दो होनहार छात्रों का कुचल कर मार डाला इस गाड़ी ने जिन दो छात्रों तौसीफ आलम व अल्तमश आलम को अपना शिकार बनाया वे दोनों पटना स्थित आरपीएस इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र थे और पटना से अपनी बाईक से काको (जहानाबाद) लौट रहे थे। तभी जहानाबाद की ओर से आ रही जज की कार ने दोनों को कुचल डाला जिसे दोनों की मौत हो गई।अलतमस सबका दुलारा था : मुमताज के चार पुत्रों में सबसे छोटा होने के अलतमस सबका दुलारा था. पूरा परिवार उसकी पढ़ाई के लिए सहयोग करता था. उसके बड़े भाई भी पढ़ाई में सहयोग करते हुए यह ख्वाब देखा करते थे कि उसका भाई एक दिन इंजीनियर बन कर परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करेगा. पूरे परिवार की आशा की किरण था अलतमस .कुछ ऐसा ही हाल मो तौसीफ आलम पिता तनवीर आलम ने ग्रामीण चिकित्सक के रूप में घर-घर जाकर लोगों का इलाज कर उससे होनेवाली आमदनी से अपने बेटे को इंजीनियर बनाने का सपना पाल रखा था. परिवार के सदस्य गुमसुम बैठे अपने बेटे के गम में डूबे नजर आये. दो भाइयों में एक मंदबुद्धि का होने के कारण पूरे परिवार के लिए आशा की किरण तौसीफ ही था दोनों बच्चे असमय खुदा को प्यारे हो गये. जो यह कांड हुआ है इस पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए , जिससे अलतमस तौसीफ के साथ जो घटना हुई है। यह घटना किसी और के साथ न हो। और जिन लोगो ने यह किया है उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वह कुछ बनाना लेकिन कुछ पलों में उसके सारे सपने टूटकर बिखर गए। और जीने की आशा ख़त्म हो गई।
हमारे समाज में ऐसी बहुत साडी घटनाये होती है पर किसी न किसी तरीके से उसे दबा दिया जाता है ऐसा क्यों? भारतीय संविधान ने अपने नागरिकों के इंसान की तरह सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार प्रदान कर रखा है।

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply