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दिनकर, फेसबुक, और असहिष्णुता

निष्पक्ष:

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कुछ दिनों पहले मैं अपने पुरानी पुस्तकों को देख रहा था तो मेरी नज़र राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक रश्मिरथी पर पड़ी। बचपन में पढ़ी इस किताब की एक पंक्ति याद आ गयी और स्वाभाविकता से ये ख्याल मन में आया की अगर दिनकर “सोशल मीडिया” और “असहिष्णुता” के दौर में होते तो क्या उनकी पहचान राष्ट्रकवि के रूप में होती?

 

हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ?

कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ ।

धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान,

जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान ।

 

इन वाक्यों को हम सभी ने कई बार पढ़ा है और सुना है। लेकिन वास्तविकता ये है की अगर वर्तमान परिस्थिति में कोई लेखक यह कह दे की धँस जाये यह देश अतल में’ तो सोशल मीडिया पर हंगामा खड़ा हो जायेगा और शायद दिनकर तो राष्ट्रकवि नहीं राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जाएगा। तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करना हमारी सभ्यता हो गयी है। वक्तव्य की आज़ादी पर लगातार राजनीतिक ध्रुवीकरण का असर दिखता है। सच ये है की इस आज़ादी के मायने अलग लोगों के लिए अलग हैं। 10 साल पहले ये ध्रुवीकरण आम जीवन का हिस्सा नहीं था।

कबीर की जब चर्चा होती है तो उन्हें एक ऐसे कवि  के रूप में देखा जाता है जिन्होंने लाठी उठा कर हिन्दू या मुस्लिम दोनों की निंदा की।  उनका लक्ष्य भारत की गरिमा को भंग करना नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े अनदेखे तथ्य को उजागर करना था। जातिवाद और जाती आधारित हिंसा आज भी प्रचलित है, हालाँकि अगर अभी कोई पत्रकार या लेख़क जाती आधारित रिपोर्ट देगा तो उसे तुरंत ‘लुटियंस मीडिया’ का हिस्सा बना दिया जायेगा। 

 
पर सवाल ये है की पूर्व ऐसी परिस्थिति क्यों नहीं थी? आज कोई भी सुधार का एक विषय उठाता है तो उसे शक़ की निग़ाहों से क्यों देखा जाता है? उसके सुझाव को एक अलगावादी नज़रिया क्यों दे दिया जाता है? इसका एक ही जवाब है – सोशल मीडिया का उदय।

इस देश का दुर्भाय ये है की यहाँ के लोग सोशल मीडिया influencers को और फेसबुक पर लिखे शब्दों को गंभीरता से लेते हैं। Attention Economy के इस दौर में लाइक्स और फॉलो किसी भी तथ्य की प्रमाणिकता को घोषित करते हैं। आलम ये है की अगर एक ब्लू टिक वाला अकाउंट लिख दे की सूर्योदय पश्चिम में होता है, तो कई लोग इसको सच मान बैठेंगे। और यह कोई मनगढंत कथा नहीं है, आप गूगल पर सर्च कर सकते हैं, कई राज्यों और कई देशों में ऐसा हो चुका है।

इस influencer सभ्यता के कारण देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहिष्णुता बढ़ रही है। अपने बंद एसी कमरे में बैठ कर लोग ट्वीट करते हैं की देश की जमीनी हकीकत बदल देनी चाहिए, जिन्हे ये नहीं पता की कश्मीर में कितने मतदाता क्षेत्र हैं वो फेसबुक पर पोस्ट करते है की कश्मीर में अत्याचार हो रहें है, जिन्हे ये पता नहीं की देश में कितने मंत्रालय हैं वो कहते हैं की वित्त मंत्री अपने पद पर रहने लायक नहीं है, और इन सब के बीच कुछ बुद्धिजीवी इस विचार से आते हैं की ‘Parliament को CTRL+ALT +DELETE कर देना चाहिए।’

चिंतिंत होने की आवयश्कता नहीं है, ऐसे बेहूदे ख़्याल देश की गिरती बौद्धिक क्षमता का प्रमाण नहीं है बल्कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट के अत्याधिक नशे के प्रमाण हैं। कई लोग तर्क देते हैं कि हम ऑनलाइन बुलबुले में रहते हैं जो केवल उन विचारों को हमारे सामने लाते हैं जिनसे हम पहले से सहमत हैं। यह phycology में confirmation bias कहलाता है। यह दर्शाता है कि हम अपने पूर्व-मौजूदा विश्वासों के जैसे विचारों की तलाश करने और सहमत होने की अधिक संभावना रखते हैं। हम सिर्फ वही समाचार साइट का चयन करते हैं और सिर्फ उन सोशल मीडिया अकाउंट को फॉलो करते हैं जो हमारे विश्वासों को और मज़बूत बनाते हैं। यह ऑनलाइन बुलबुला राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए जिम्मेदार है।  

वक्त ऐसा है की हमें ऑनलाइन दुनिया से निकल कर विश्व के वास्तविकताओं से रूबरू होना पड़ेगा। वैचारिक दृष्टि से असहमत होना लोकतंत्र की प्रथा है, इस प्रथा को अलगावाद या राष्ट्रद्रोह नहीं बल्कि एक सुझाव के रूप में स्वीकार करना चाहिए। वरना देश की कई ऐसी प्रतिभाएँ जो विश्वस्तर पर भारत को गौरवान्वित करने की क्षमता रखती हैं, राष्ट्रद्रोह के लबादे से दबा दी जाएंगी।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पु​ष्टि नहीं करता है।

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