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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023: भाजपा के मिशन- 2023 पर भारी गुटबाजी, RLP की भूमिका महत्वपूर्ण

Suresh Kumar Choudhary
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देश के वर्तमान गृह मंत्री और भाजपा के चाणक्य श्री अमित शाह हाल ही में दो दिवसीय (4-5 दिसंबर 2021 को) राजस्थान दौरे पर थे।  शाह दूसरे दिन जयपुर पहुंचे तथा जयपुर में आयोजित पार्टी सम्मलेन में उन्होंने यह दावा किया कि राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनाव जो वर्ष 2023 में होंगे उसमे भाजपा दो तिहाई बहुमत के साथ वापसी करेगी। शाह ने कहा कि मैं राजस्थान की जनता से आह्वान करने आया हूं कि यहां की निकम्मी और भ्रष्टाचारी अशोक गहलोत सरकार को मूल समेत उखाड़कर फेंक देना है और भाजपा के कमल के निशान वाली सरकार बनानी है।

राजस्थान में नवम्बर 2023 में विधानसभा चुनाव होने वाले है। पिछले तीन दशक के रिकॉर्ड को देखें तो राजस्थान में प्रत्येक 5 वर्ष में सरकार बदलती जरूर है, यहां एक बार कांग्रेस तो एक बार भाजपा की सरकार बनने की परम्परा रही है।  परन्तु इस बार यह परम्परा टूट सकती है क्योकि वर्तमान कांग्रेस सरकार लगातार खुद को मजबूत करने में लगी हुई है। राजस्थान में मुख़्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिस तरह अपनी सरकार को गिरने से बचाया है, उसके बाद गहलोत गुट में विधायकों का विश्वाश बढ़ा है तथा सचिन पायलट गुट में सिर्फ गिने-चुने विधायक ही रह गए है, जिसे भी कांग्रेस आलाकमान ने संतुष्ट कर दिया है।

वहीं, गहलोत ने लगातार विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाकर कांग्रेस में अपनी पकड़ फिर से बना ली है । वहीं, मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने हाल ही में हुए विधानसभा उपचुनाव में अपनी सुरक्षित सीट भी गंवा दी। वल्लभनगर सीट तो कांग्रेस के पास पहले से ही थी जबकि धरियावाद सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। खास बात यह रही कि भाजपा इन दोनों सीटों पर कांग्रेस से मुकाबला ही नहीं कर पाई और दोनों सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार तीसरे और चौथे स्थान पर संघर्ष करते नजर आये। इन दोनों सीटों पर भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी ने पहुंचाया।

इन विधानसभा उपचुनावों से यह साफ हो गया है कि वर्तमान में गहलोत सरकार के प्रति लोगों का विश्वाश अभी भी कायम है। वहीं, दूसरी तरफ भाजपा में आगामी विधानसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर नेताओं में आपसी होड़ मची हुई है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया और राजस्थान की पूर्व मुख़्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच नेतृत्व को लेकर संघर्ष किसी से छुपा नहीं है। वसुंधरा राजे ने हाल ही में राज्य में धार्मिक यात्रा पर थीं। इस यात्रा के दौरान जिस तरह भीड़ एकत्रित हुई उससे लगता है उन्होंने एक बार फिर अपने शीर्ष नेतृत्व को यह सन्देश दिया है कि वो आज भी राजस्थान की जनता में एक लोकप्रिय चेहरा है। परन्तु शीर्ष नेतृत्व वसुंधरा के नाम पर राजी नहीं है।

पीएम मोदी और अमित शाह को राजे मंजूर नहीं है। ऐसी खबरें अक्सर सुनने को मिलती है। हालांकि शाह के दो दिवसीय दौरे ने यह साफ़ कर दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव पीएम मोदी के चेहरे पर लड़ा जायेगा, लेकिन  अभी भी सीएम के नाम पर असंमजस की स्थिति बनी हुई है।  शाह ने इस सम्मलेन में जिस तरह कैबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को तवज्जो दी है। इससे लगता है शायद शाह का भरोसा शेखावत पर अधिक है।  कांग्रेस के  प्रदेशाध्यक्ष  गोविन्द सिंह डोटासरा ने तो भाजपा के इस सम्मेलन में शेखावत को सीएम प्रोजेक्ट करने से जोड़ दिया। इस बयान के बाद भाजपा में भी सीएम पद के लिए एक बार फिर गुटबाजी तेज हो गयी है।

अमित शाह जब जयपुर आये तो पूरी भाजपा एकजुट दिखी परन्तु अभी सीएम पद को लेकर अंदरूनी गुटबाजी कायम है। भाजपा में वसुंधरा राजे गुट भारी पड़ता नजर आ रहा है। यदि चुनाव के समय राजे को सीएम प्रोजेक्ट नहीं  किया गया तो राजे पार्टी से बगावत भी कर सकती है। आज भी राजे कम से कम 20 से 25 सीटें खुद के दम पर जिताने का हौंसला रखती है। वहीं, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया भी सीएम दावेदार है।  वह किसान नेता है और  राजस्थान में पिछले कई सालों से किसान मुख़्यमंत्री का मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठता रहा है।

किसान मुख़्यमंत्री के नाम पर हनुमान बेनीवाल की पार्टी लगातार दोनों पार्टियों को टक्कर दे रही है। बेनीवाल की पार्टी ने राजस्थान में सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को ही पहुंचाया है।  इसलिए अमित शाह को राजस्थान में भाजपा की सरकार बनाने हेतु वसुंधरा राजे और आरएलपी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल से सुलह करनी होगी। राजस्थान में अभी यह हालत है कि भाजपा कार्यकर्त्ता पूरी तरह हतोत्साहित है जबकि आम जनता गहलोत सरकार से संतुष्ठ नजर आ रही है। भाजपा को राजस्थान में जीत हासिल करने हेतु सबसे पहले अपने नेताओं में चल रही गुटबाजी को दूर करना होगा।

लेखक : सुरेश कुमार चौधरी (राजस्थान)

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