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संस्कृत में पूरे देश को भाषाई एकता में बांधने की ताकत

Sumit Kumar

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हिमाचल प्रदेश सरकार ने सरकारी विद्यालयों ने कक्षा दूसरी से देववाणी संस्कृत भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ाने का निर्णय किया है, जो वर्तमान समाज की सर्वोच्च आवश्यकता होने के कारण स्वागत योग्य कदम है। राजनैतिक व गैर राजनैतिक गलियारों में सरकार के इस निर्णय के बारे में विभिन्न मत हो सकते हैं। पर मैं व्यक्तिगत रूप से विश्व की प्राचीनतम भाषायों में से एक संस्कृत को हिमाचल सरकार द्वारा प्रदान किये गए सम्मान का स्वागत करता हूँ।

 

 

भारत का गौरवमयी इतिहास, भारत की उत्कृष्ट मनीषा,अमूल्य चिन्तन,रचनात्मकता, भारतीय सनातन संस्कृति,वैचारिक प्रज्ञा व भारतीय दर्शन इसी भाषा से पोषित हुआ है। चाहे वेद हो, पुराण हों ,उपनिषद हों या गीता, रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य हों या बौद्ध धर्म का महायान व जैन धर्म के अनेक ग्रन्थ हो, सभी मूल रूप से संस्कृत भाषा में ही विकसित हुए। विकलिपीेडिया की मानें तो असंख्य प्राकृतिक व मानवीय आपदाएं (विदेशी आक्रमण ) झेलते हुए भी संस्कृत में 3 करोड़ से अधिक पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं।

 

 

 

उपनिवेश काल में, सन 1783 में विलियम जोन्स को कलकत्ता में जज नियुक्त किया गया तो उन्होंने अनेक भारतीय भाषायों व ग्रन्थों में रुचि दिखाई। वे भारतीय दर्शन, शोधों व साहित्य से इतने प्रभावित थे कि संस्कृत व फारसी भाषा की पैरवी करते हुए भारतीय ग्रन्थों के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। पर , उनके बाद परिस्थितियों में भारी बदलाव आया। विदेशी आक्रांताओं व ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारतीय धरोहरों को भारी नुकसान किया। इन धरोहरों में हमारी सांस्कृतिक भाषा संस्कृत को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा।

 

 

 

विदेशी आक्रमणकारी यह बात भली भांति जानते थे कि भारतीयों को बौद्धिक गुलाम बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था व स्थानीय भाषायों पर प्रहार करना पड़ेगा। लॉर्ड मैकाले के भेदभाव व द्वेषपूर्ण रवैये के कारण 1835 में प्राच्यवादी ज्ञान के प्रसार पर अंकुश लगा कर अंग्रेजी भाषा व अंग्रेजी रहन- सहन को बढ़ावा दिया जाने लगा। 1854 के वुड्स डिस्पैच ने भी भारत के लिए शिक्षा नीति तैयार करते हुए युरोपियन शिक्षा पर ही बल दिया। उनकी यह साजिश भारतीय मूल्यों पर चोट कर भारत में बौद्धिक गुलाम पैदा करने की थी, जिसमें वे सफल भी हुए। अंग्रेजी व अंग्रेजियत की अंधी दौड़ ने समाज में नैतिकता व सौहार्द का विनाश किया है।

 

 

 

प्रत्येक देश की भाषा उस देश के मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है। जिन देशों से अंग्रेजी भाषा का उद्गम हुआ है ,यदि शोध किया जाए तो आप पाएंगे कि उनका पूरा इतिहास परस्पर संघर्ष, सत्तालोलुपता व भौतिकवाद पर आधारित है। उन भाषायों के साथ वही संस्कार हमारे समाज में भी पैर पसारने लगे हैं। इसके विपरीत विदेशी हमलावरों के आने से पहले भारतीय इतिहास पर नजर दौड़ायें तो विश्व गुरु की उपाधि व वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः, ॐ शाँति, सत्यमेव जयते जैसे सौहार्दपूर्ण दर्शन के रचयिता होने की सुखद व गौरवमयी अनुभूति होती है। भारत का समस्त गौरवमय ऐतिहासिक विकास संस्कृत भाषा के माध्यम से ही हुआ।

 

 

 

संस्कृत भाषा मात्र विचारों के आदान प्रदान का साधन ना होकर, मानवीय मूल्यों व संस्कारों का पर्याय रही है। आधुनिक समय में, जो मानवीय मूल्य व संस्कार हम बच्चों में स्थापित करना चाहते हैं, वे सभी संस्कृत शिक्षण में स्वतः ही अंतर्निहित हैं। भारतीय संविधान में 8वीं अनुसूची में अंकित 22 भारतीय भाषायों में संस्कृत का नाम भी शामिल है, परन्तु यह भाषा अधिकतर भाषायों की जननी है। “संविधान की धारा 343,धारा 348(2) व 351 का सारांश है कि देवनागरी लिपि में लिखी व मूलतः संस्कृत से अपनी पारिभाषिक शब्दावली लेने वाली हिंदी राजभाषा है।”

 

 

 

संविधान प्रारूप सभा अध्यक्ष डॉ0बी0आर0 अम्बेडकर ने भी माना था कि संस्कृत पूरे देश को भाषाई एकता में बांधने वाली इकलौती भाषा हो सकती है। वे इसे आधिकारिक भाषा बनाने के पक्षधर थे। पर बिडम्बना यह रही कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग सात दशकों बाद भी संस्कृत भाषा व सांस्कृतिक ग्रन्थों के पुनरुत्थान हेतु सकारात्मक प्रयासों का आभाव रहा। दूरदर्शन व आकाशवाणी पर सँस्कृत समाचार प्रसारित कर सरकारों ने अपने कर्तव्य से इतिश्री कर ली ,परंतु इसे आम बोलचाल की भाषा बनाने के प्रयास नहीं किये गए।

 

 

 

संस्कृत मात्र पूजा, हवनों व कुछ लोगों तक सीमित होकर रह गई। यदि देश की सांस्कृतिक भाषा का ह्रास कर उसे सामाजिक , नैतिक, बौद्धिक व सांस्कृतिक गुलामी की और धकेला जा सकता था तो स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही उसी भाषा का उत्थान कर विश्व गुरु जैसा प्रतिष्ठावान पद पुनः प्राप्त किया जा सकता था। संस्कृत एकमात्र प्राचीन भाषा है जिसमें सुस्पष्ट व्याकरण व वर्णमाला की वैज्ञानिकता है।

 

 

 

वर्तमान तकनीकी युग में इसे सुपर कंप्यूटर व कृत्रिम बुद्धि के लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा माना गया है। भारतीय प्राचीन ग्रन्थ अपने आप में शिक्षा,तकनीक,चिकित्सा,योग व अध्यात्म का अथाह सागर सँजोये हुए हैं। ऐसे में पूरा विश्व उम्मीद भरी नज़रों से उस देश की तरफ देखेगा जहां से इन ग्रन्थों की सुभाषा का उद्गम हुआ है और गर्व की बात है कि हम भारतवासी अपने ऋषियों के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास, शोधों, दर्शन व सृजनात्मकता के बल पर विश्व का नेतृत्व कर सकते हैं।

 

 

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा संस्कृत भाषा को प्रारम्भिक शिक्षा का हिस्सा बनाने के साथ ही भारतीय संस्कारों, भारतीय संस्कृति , भारतीय दर्शन व मानवीय मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों में पुनर्स्थापित करने की पहल की गई है। यह कदम भारत के विश्वगुरु बनने की दिशा में उठाया गया सशक्त कदम साबित हो ,ऐसी कामना हम सभी को करनी है तथा सहयोग के लिए तैयार रहना है।

 

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण जंक्शन किसी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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