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नेताजी सुभाष चंद्र बोसः राष्ट्रप्रेम एवं त्याग की पराकाष्ठा

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भारत की इस पुण्य भूमि पर अनेक ऐसी विलक्षण विभूतियों ने जन्म लिया है जो अपने त्याग, पराक्रम तथा नेतृत्व रूपी गुणों के अदभुत संयोग के बल पर देश सेवा एवं राष्ट्रप्रेम तथा संगठन निर्माण के अप्रतिम उदाहरण बने। ऐसे महापुरूषों की श्रेणी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सदैव अग्रणी रहेगा जिन्होंने अपने जीवन के सुन्दर एवं सुखद वर्षों को पूर्णतया मातृभूमि की आजादी के लिए न्योछावर कर दिया। यद्यपि वे स्कूली शिक्षा के आरम्भिक वर्षों से ही एक अत्यंत मेधावी छात्र थे तथा अपनी प्रतिभा के बल पर उन दिनों इंग्लैण्ड में आयोजित होने वाली भारतीयों के लिए दुर्लभ एवं कठिन आई0 सी0 एस0 परीक्षा, जो किसी भी नवयुवक का एक स्वप्न होता है, में वर्ष 1919 में चयनित हुए परन्तु इस शानदार उपलब्धि को दरकिनार कर देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति कराना ही उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य निर्धारित किया।

उन दिनों देश में यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन पूरे जोर-शोर से चल रहा था जिसकी मुख्य कमान प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत अगले दशक के आते आते महात्मा गाॅंधी और जवाहर लाल नेहरू के हाथों आ गयी थी और उनके प्रभाव के आगे अन्य किसी का स्वतंत्र रूप से खड़े हो पाना अत्यंत दुष्कर था तथापि ऐसे कठिन समय में भी श्री बोस ने केवल कुशल नेतृत्व की न केवल एक मिसाल कायम की बल्कि आई0 एन0 ए0 की लगभग 45000 सशस्त्र जवानों की एक शक्तिशाली फौज खड़ी करके राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक सशक्त पैनी धार दी जिसने अंगे्रजी हुकूमत की तोप-टैंक एवं गन पाउडर से लैस अत्याधुनिक सेना को कड़ी चुनौती देते हुये भयभीत किया और कालांतर में देश छोड़ने के लिये विवश भी किया। कई मुददों पर गाॅंधी जी से वैचारिक मतभेद के बाद भी वे कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुये जो उनके आजादी के लक्ष्य के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता की इस संगठन में स्वीकारोक्ति का सूचक था और इसके लिये देशव्यापी कां्रति के साधन रूपी अस्त्र के प्रति अटूट विश्वास का परिचायक था।

अपने राजनीतिक कार्यक्रम के अनुरूप ही उन्होंने 1939 में फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की जिसके द्वारा वे स्वतंत्र रूप से देश की स्वतंत्रता को हासिल करने के लिये देशव्यापी क्रांति की तैयारी करना चाहते थे। अपनी इसी प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने जनता-जनार्दन को ललकारते करते हुये नारा दिया कि तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूूंगा तथा आगे चल कर सिंगापूर में उन्होंने दिल्ली चलो का नारा भी दिया। इन नारों ने संपूर्ण जनमानस को न केवल आंदोलित किया बल्कि देशभक्त जनता को अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिये प्रेरित भी किया। वास्तव में क्रांंति के द्वारा जहाॅं वे अंग्रेजी शासन को अपदस्थ कर देना चाहते थे वहीं आजाद भारत में देशवासियों की अपनी संप्रभु सरकार की स्थापना की रूपरेखा भी वे बना चुके थे जिसके अनुक्रम में आजादी के पूर्व ही सर्वप्रथम उन्होंने आजाद हिंद फौज का झंडा फहराकर अंग्रेजी शासन को जबर्दस्त झटका दिया और भारतीयों द्वारा देश की स्वतंत्रता को हर हाल में हासिल कर लेने के दृढ़ संकल्प का बिगुल भी बजा दिया जिसे अंगे्रजों के साथ ही संपूर्ण विश्व ने बड़े अचरज के साथ देखा।

उन्होंने अंग्रेजी शासन को दो टूक शब्दों में चुनौती देते हुए कहा कि मैं देश की आजादी याचना से नहीं बल्कि छीन कर लूॅंगा क्योंकि अंग्रेजों की नीयत पर उनका भरोसा उठ गया था। श्री बोस ने अंग्रेजो से लड़ने के लिये क्रांति का रास्ता चुना तथा एक स्वतंत्र सेना का निर्माण किया जिसमें उन्हें अन्य समर्पित क्रंातिकारियों विशेषतया श्री रास बिहारी बोस एवं श्री मोहन सिंह की विरासत रूपी सैन्य-संगठन की आधारभूमि का सहयोग मिला। वस्तुतः इन क्रंांितकारियोेेें ने विश्वयुद्ध में कैद हुये सैनिकों को छुड़वा कर भारत की स्वाधीनता के लिये अंग्रेजी शासन से युद्ध लड़ने के उद्देश्य से सशस्त्र सैन्य बल तैयार किया था जिसे श्री बोस ने सुसंगठित करके एक विशाल आकार दिया तथा जिसने अंगे्रजों के लिये एक बड़ी चुनौती खड़ी किया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ही अंग्रेजों ने उन्हें कारावास में डाल दिया जहाॅं से वे चुपचाप निकल कर अफगानिस्तान और रूस होते हये जर्मनी आये तथा देश की आजादी के लिये हिटलर कीे नाजी जर्मनी का भी सहयोग लिया जिसमें उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली। द्वितीय विश्वयुद्ध तक आते-आते श्री बोस एक प्रमुख क्रंातिकारी बन चुके थे और यह अंग्रेजी शासन के लिये एक बहुत बड़ी चुनौती थी। अतः वे नेताजी को हर प्रकार से चोट पहुॅंचाकर उनके अस्तित्व को ही समाप्त कर देना चाहते थे।

समग्रतः नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी स्व की तिलांजलि देते हुये आत्म-बलिदान तथा सम्रग क्रांति द्वारा देश की आजादी और राष्ट्रनिर्माण के पर्याय बन चुके थे जो उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अद्वितीय और अनुपम कालजयी उदाहरण प्रस्तुत करता है और किसी को भी उनकी ओर बरबस आकर्षित करता है।

प्रो0 सुधांशु त्रिपाठी
आचार्य – राजनीति विज्ञान,
उ0 प्र0्र राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय,
प्रयागराज, उ0प्र0।

 

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्‍त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्‍य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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