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अटल बिहारी बाजपेयीः राजनीतिक चेतना एवं मानव कल्याण

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी का व्यक्तित्व निसंदेह एक विशाल वटवृक्ष के समान था जिसके तले न केवल अनेक हस्तियों ने बल्कि विभिन्न संस्थाओं ने महत्वपूर्ण सफलतायें हासिल किया। वस्तुतः ये उनके व्यक्तित्व की गहराई एवं चिंतन की व्यापकता थी कि इनके सम्यक प्रभाव ने उन सभी को जीवन के आर्दश मूल्यों के प्रति सहज रूप में पुनर्जीवित और सशक्त किया जो उनके संपर्क में आये और इसके फलस्वरूप उन सभी ने समाज और देश की सेवा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा आगे चल कर वे सभी समाज में प्रसिद्ध हुये। निश्चय ही उनके विशिष्ट व्यक्तित्व एवं चिंतन के द्वारा भारतीय समाज व देश को एक नई दिशा मिली तथा संपूर्ण विश्व को उनकी उदात्त एवं सार्वजनीन राजनीतिक चेतना जो उनमें स्टेटसमैनशिप के रूप में प्रकट हुई, ने जीवन जीने का एक सकारात्मक मार्ग भी दिखाया। वास्तव में ऐसा क्यों हैं।

इसके लिये हमें उनके संपूर्ण जीवन काल को देखना होगा जिसमें वे अपने जीवन के आरम्भिक वर्षों से ही देशभक्ति एवं समाज सेवा की निःस्वार्थ भावना से ओत-प्रोत दिखाई पड़तें हैं और यह यात्रा जीवन पर्यन्त चलती हुई उनके महाप्रयाण में विलीन हो जाती है। यह उनके स्वभाव की विलक्षणता ही है कि किसी सामान्य किशोर की भांति तरूणाई के सपने देखने के बजाय या संसार के लौकिक सुखों या आजीविका हेतु कैरियर की परवाह किये बिना वे देश सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लेते हैं। इसीलिये उन्होंने 1939 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की एक स्वयंसेवक के रूप में सदस्यता ग्रहण की और संघ के विशुद्ध राष्ट्रीय सेवा भाव के अनुरूप स्वंय को ढालते हुए समर्पित कर दिया। उन दिनों भारत अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी के विरूद्ध महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता हासिल करने के लिये संघर्षरत था। अतः वे इस महासंगा्रम में खुद की परवाह किए बिना कूद पड़े तथा भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

जीवन के कड़वी सच्चाईयों तथा राष्ट्रनिर्माण की चुनौतियों का अनवरत मुकाबला करते हुए दीर्घकालिक संघर्ष की प्रक्रिया में उनके भीतर का कवि हृदय वाकपटुता नेतृत्व की अप्रतिम क्षमता विरोधियों के साथ सद्भाव एवं सामंजस्य तनाव के मध्य भी विनोद का विचित्र भाव अद्वितीय साहस एवं धैर्य तथा अन्यान्य विशिष्ट गुण प्रकट हुए जिन्हे न केवल देशवासियों ने बल्कि संपूर्ण विश्व ने देखा। वस्तुतः उन्होंने स्व या व्यष्टि को समष्टि में विलीन करने का संकल्प किशोरवस्था या इसके पूर्व ही ले लिया था और तभी वे राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक 1947 में बने और आजीवन अविवाहित रहने के निश्चय पर अडिग रहे। इस प्रकार परिवार के मोहपाश में न बंध कर उन्होंने संपूर्ण राष्ट्र को ही अपने परिवार के रूप में स्वीकार किया और उनकी सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र ध्येय समझा।

जैसा सर्वविदित है कि संघ की विचारधारा भी हिंदू राष्ट्र को ही सर्वोपरि महत्व देती है अतः राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संगठनात्मक ढाचें में उनके विचारों को पूरा सम्मान मिला तथा शीघ्र ही उन्होंने इस संगठन में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। उनको संघ के संस्थापक पूज्य डा0 केशव बलिराम हेगडे़वार जी तथा इस सगठंन के प्रारम्भिक ढाचें को विशाल संरचना में परिर्विर्तत करने वाले पूज्य गुरू श्री माधव सदाशिव गोलवरकर जी का सानिध्य एवं मार्गदर्शन मिला जहां वे भारत को एक सशक्त हिंदू राष्ट्र के रूप में निर्मित करने हेतु संघ के पवित्र लक्ष्य को पूरा करने के लिए तनमन धन से जुट गये। चूंकि अंगे्रजों की गुलामी के दौर में भारत की एक विशिष्ट सांस्कृतिक अस्मिता को सर्वाधिक आघात पहुॅंचा था अतः देश की उस विशिष्ट पहचान को पुनर्जीवित करना संघ के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी तथा इसके लिए भारत की निज भाषा अर्थात राष्ट्रभाषा हिंदी को उसका स्वाभाविक गौरवमयी स्थान दिलाना परम आवश्यक था। अतः इन दोनों चुनौतियों को उन्होंने व्यक्तिगत रूप में लिया और जीवन पर्यन्त इनके लिये प्रयास करते रहे। हिंदी के विश्वव्यापी प्रचार प्रसार के लिए ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में अपना उद्बोधन हिंदी में देकर संपूर्ण विश्व को अभिभ्ूत किया।

इस प्रकार अपनी प्रतिभा के बल पर वे राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ में तथा साथ ही साथ देश की शासन व्यवस्था में निरन्तर नयी ऊचाईयों को पार करते गये और देश के विदेश मंत्री होने के बाद अंत में प्रधानमंत्री के गुरूतर दायित्व का भी सफलता पूर्वक वहन किया। राष्ट्र के सर्वोच्च स्थान को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया और अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी महाशक्तियों के भारत विरोधी रवैये के बावजूद 1998 में परमाणु परीक्षण राजस्थान राज्य के उसी पोखरन नामक स्थान पर सफलतापूर्वक संपन्न करवाया जहाॅं 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व0 इन्दिरा गांधी ने पहला परमाणु परीक्षण कराया था। इससे देश को सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने में महत्वपूर्ण मदद मिली तथा चीन और पाकिस्तान जैसे भारत के शत्रु देशों को करारा जवाब भी मिला।

निश्चय ही हार नहीं मानूंगा रार नहीं ठानूंगा उनकी विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी निरंतर संघर्षरत रहने की दुर्दम्य जिजीविषा को परिलक्षित करता है। इसीलिये उन्होंने देश के भीतर तमाम विरोध के बावजूद पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के साथ संबध सुधारने का अनवरत प्रयत्न किया और इसी उद्देश्य से उनकी पाकिस्तान में लाहौर को की गयी बस यात्रा को समूचे विश्व ने एक सकारात्मक पहल माना और दोनों देशों के संबध सुधारने की दिशा में इसे एक मील का पत्थर कहा गया। इस यात्रा ने जहां भारत की पाकिस्तान से संबध सुधार के प्रति ईमानदारी और बेबाक इच्छा या साफगोई को प्रकट किया वहीं इसने गेंद को इस्लामाबाद के पाले में फेंक कर भारत की कूटनीतिक विजय को सुनिश्चित किया। काल के कपाल पर लिखने और मिटाने का उनका संकल्प उनके कालजयी पराक्रम का सूचक है जहाॅं वे निरन्तर प्रयत्नशील होने का अपना दृढ़ संकल्प बारम्बार दोहराते हैं। इसीलिये गीत नया गाता हॅंू उनकी सतत क्रियाशीलता की पराकाष्ठा को द्योतित करता है।

समग्रतः भारत के इस सच्चे सपूत को आगे आने वाली पीढ़ियाॅं सदैव एक युगनिर्माता के रूप में श्रद्धापूर्वक याद रखेंगी। राष्ट्रप्रेम देशसेवा तथा संपूर्ण मानवता के कल्याण के प्रति उनके दृढ़ निश्चय तथा अमिट योगदान के लिए देश द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारतरत्न वस्तुतः स्वयं ही सम्मानित हुआ सा दिखायी दे रहा है ।

प्रो0 सुधंशु त्रिपाठी
उ0 प्र0 राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय,
प्रयागराज, उ0प्र0।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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