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शिक्षक दिवस पर मुक्तक

शब्दस्वर

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अंधकार अज्ञान का, जब बनता अभिशाप।
राह नजर आती नहीं, होता व्यर्थ प्रलाप।
श्रद्धा श्रम से ही मिले, गुरु की कृपा अपार।
सत्य ज्ञान की ज्योति से, मिटते तम संताप।

ज्यों ज्यों होता जा रहा, शिक्षा का विस्तार।
कर्त्तव्यों के नाम पर, भारी हैं अधिकार।
गुरु की महिमा घट रही, भौतिकवादी सोच।
अर्थ सभी कुछ हो गया, हो कैसे उद्धार।

– सुरेन्द्रपाल वैद्य, ०५/०९/२०२०

 

​डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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