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विकल्प की तलाश [contest]

शब्दस्वर

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विकल्प की तलाश
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कोई भी देश राजनीति के बिना नहीँ चल सकता। व्यवस्था चाहे कोई भी हो, उसे आखिर चलाना तो व्यक्तियों ने ही है। आजादी के समय से ही अधिकतर समय देश पर कांग्रेस का शासन रहा है। समय के साथ साथ इसमें विकृतियां आती गई और देश तरक्की की राह से भटकता गया। वास्तविकता तो यही है कि कांग्रेस ने अंग्रेजो के पदचिन्होँ पर देश को चलाया लेकिन भारतीयता और आजादी का झूठ सपना भी दिखाया। रीतियाँ और नीतियाँ पश्चिमी सभ्यता की परिक्रमा करती रही। इसी के परिणाम स्वरूप देश की राजनीति दलगत स्वार्थों की कीचड़ में धँसती चली गई। काँग्रेस के रहते कोई भी दूसरा राजनैतिक दल अखिल भारतीय स्तर पर अपने आप को स्थापित नहीं कर पाया। 1977 में आपातकाल के समय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सभी दल कांग्रेस के विरुद्ध एक मंच पर आये चुनाव लड़ा, जीते लेकिन यह जनता पार्टी की सरकार भी अपना काल पूरा करने से पहले ही काल कलवित हो गई। यद्यपि पहली बार देश की जनता ने किसी गैर काँग्रेसी सरकार का शासन अनुभव किया था, लेकिन नेताओं की आपसी महत्वाकांक्षा के कारण देश फिर से कांग्रेस के चंगुल में फंसता चला गया।
इसके साथ ही देश में क्षेत्रीय तथा अन्य छोटे दलों की राजनीति का दौर भी शुरु हो गया। जनता पार्टी टूटने के बाद बने राजनैतिक दलों में भारतीय जनता पार्टी का कैडर तथा जनाधार सर्वाधिक था यद्यपि अन्य क्षेत्रीय दलों के नेता भी जनता पार्टी की सरकार में रहने के कारण अपना जनाधार व पैठ बनाने में सफल रहे। शनै शनै भाजपा अपने पुराने रंग में आई तथा देश की जनता ने उसे स्वीकार भी किया। नब्बे के दशक मेँ राम मंदिर, समान नागरिक आचार संहिता तथा धारा 370 के मुद्दों के कारण स्वाभाविक रूप से भाजपा को देश में लाभ मिला। समय बीतने के साथ साथ समझौतावादी राजनीति व सत्ता मेँ आने की जल्दबाजी में भाजपा अपना वैचारिक आधार तथा वोट बैंक खोती चली गई। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भी पार्टी अपनी विचारधारा तथा प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बहुत बेहतर प्रदर्शन नहीँ कर पाई। उल्टे इसके नेता अपने को विलासिता, भ्रष्टाचार तथा अन्य बुराईयों से नहीँ बचा पाये। कमल कीचड़ में डूबता चला गया तथा नेताओं पर नैतिकता को दरकिनार करने के आरोप लगने लगे।
फिर भी कांग्रेस के मुकाबले भाजपा हिन्दीभाषी राज्योँ में अपना जनाधार बनाये रखने में सफल रही जिसके कारण मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं तथा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने आये हैं। लेकिन यह सब होने के बावजूद भी देश में भाजपा के प्रति लोगोँ के मन में विश्वास और आस्था में कमी आई है जिसका प्रकटीकरण दिल्ली विधाधसभा के चुनाव में देखने को मिला है। आज देश की जनता को कांग्रेस के विरुद्ध एक ईमानदार विकल्प चाहिये और वह भाजपा से हटकर भी कोई हो सकता है। इस बात पर भाजपा को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
जहाँ तक आप पार्टी का सवाल है वह अभी अपनी प्रारंम्भिक न्यूनतम सांगठनिक तथा वैचारिक प्रतिबद्धायें ही तय नहीँ कर पाई है। दिल्ली राज्य सरकार चलाने को लेकर तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को लेकर इसमें उलझनें बढ़ती जा रही है। फिर भी आप पार्टी ने पूरे देश में अपनी एक पहचान तो बनाई ही है जिसका प्रभाव आने वाले लोकसभा चुनावों में निश्चित तौर पर पड़ेगा।
वर्तमान में देश अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है। इनमें सीमाओं पर चुनौतियां, पड़ोसी देशोँ में भारत के विरुद्ध पनप रहा जेहादी आतंकवाद, मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा गरीबी आदि प्रमुख हैं। दूसरी तरफ केन्द्र में अकर्मण्य तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान से रहित रीढ़ विहीन सरकार के कारण ही विश्व के अन्य देश हमें ज्यादा महत्त्व नहीँ देते। केन्द्र की दिशाहीन कार्यपद्धति के कारण कृषि तथा उद्योग चौपट होते जा रहे हैं जिससे हमारा देश विदेशी कम्पनियोँ को लाभ पंहुचाने वाला बाजार बन कर रह गया है। इन से मुकाबला करने के लिए आज देश को एक मजबूत और कुछ कर दिखाने की क्षमता रखने वाली सरकार की बहुत आवश्यकता है।
इसी महीने से देश की जनता दिल्ली राज्य में बड़े बड़े दावे करने वाली आम आदमी पार्टी की नौसिखिया सरकार के उलझन भरे प्रयोगों को भी देख रही है।
इस दृष्टि से 2014 के लोकसभा चुनाव बहुत महत्त्व रखते हैं।
आशा की जानी चाहिये की देश का जागरुक मतदाता इस बार किसी भी प्रकार के झूठे वादों के बहकावे में नहीं आयेगा, जिसके परिणाम स्वरूप केन्द्र में एक मजबूत, दृढ़ इच्छाशक्ति वाली तथा देश के स्वाभिमान की रक्षा करने वाली सरकार अस्तित्व में आएगी।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य।

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