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धरती का स्वर्ग लहूलुहान क्यों ???!

पाठक नामा   -

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कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत का अटल-स्वप्न क्या हुआ ????

ऐसा किसी शायर ने कहा है कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वह स्वर्ग कश्मीर है । 60 के दशक में रोमांटिक फ़िल्म बनाने वाले बलीवुडिया कलाकार निर्माता निर्देशकों की पहली पसंद कश्मीर की वादियां ही हुआ करती थी ? वैसे भी अपनी प्राकृतिक छटा और सुहाने मौषम के कारण पुरे क्षेत्र का जलवा ही किसी योरुपीय देश से काम नहीं है !

लेकिन वही कश्मीर सदा से ही भारतवासियों के गले की हड्डी रहा है. हालाँकि, वर्ष 1989 में शुरु हुए घाटी में सशस्त्र विद्रोह को 1996 में नियंत्रित कर लिया गया और चरमपंथियों को आत्मसमर्पण के बाद भारतीय सुरक्षा बलों के सहयोगियों के तौर पर सक्रिय करने की नीति अपनाई गई ताकि चरमपंथ का मुकाबला किया जा सके. बावजूद इसके इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि तमाम अलगाववादी घाटी में आज भी सक्रीय हैं और पाकिस्तान परस्त नीतियों को अंजाम देने में जुटे हुए हैं.
पिछली दीपावली को नरेंद्र मोदी कश्मीरियों के बीच थे और इस बार ठीक दीपावली के पहले प्रधानमंत्री की इस बड़ी घोषणा ने घाटी के बारे में उनकी प्राथमिकता दर्शाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. अपनी मजबूत इच्छाशक्ति दर्शाते हुए पीएम ने साफ़ कहा कि “कश्मीर पर मुझे इस दुनिया में किसी की सलाह या विश्लेषण की जरूरत नहीं है, बल्कि अटल जी के तीन मंत्र इसके लिए काफी हैं. आम भारतीय की भावनाओं को उकेरते हुए प्रधानमंत्री ने दुहराया कि कश्मीरियत के बिना हिन्दुस्तान अधूरा है और यह हमारी आन, बान और शान है. नहले पर दहला मारते हुए नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि में प्रत्येक वर्ग के लिए सहिष्णुता का प्रदर्शन करते हुए कहा कि दिल्ली का खजाना ही नहीं, हमारे दिल भी आपके लिए हाजिर हैं ‘ अब सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने गलती की है या विपक्षी नेताओं की टांग खींचने वाली आदत गलत है, क्योंकि कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत का ‘अटल-स्वप्न’ तो सबको साथ लेकर चलने में ही है. ज़ाहिर है कि एक के बाद एक मुसीबतों से गुजर रही घाटी को ऐसे ही सच्चे प्रयासों की आवश्यकता है, जिससे पिछले दो दशकों से परेशान आवाम को राहत मिल सके. रोजी-रोजगार और शांति के साथ अगर यह राज्य विकास के पथ पर आगे बढे तो फिर इससे बढ़कर कोई दूजी बात नहीं! और हाँ! इस क्रम में मुफ़्ती सरकार के पहले जो भी गलतियां की गयी हैं, उन्हें दुहराने से बचने का प्रयास करना और उससे बढ़कर सुधारने का प्रयास होना ही चाहिए. लेकिन फिर अफ़सोस के साथ कहना ही पड़ता है की मुफ़्ती की बेटी ने भी उन सभी गलतियों को दोहराना आरम्भ कर दिया है । बुरहांन वाणी से सहानुभूति का हीे सबब है कि आज 45 दिन हो गए है कर्फ्यू को लगे हुए और पत्थर बाजी होते जहाँ पत्थर बजी से सुरक्षा बलों के जवान घायल हो रहे है दूसरी ओर पत्थर बाज पैलेट गन से अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं ?
अभी अभी विपक्षी नैताओं को मोदी जी ने टका सा जवाब भी दे दिया कि कश्मीर में जो कुछ होगा व संविधान के दायरे में ही होगा, लेकिन संविधान का वह दायरा अगर पैलेट गन की गोलियों से ही बनता है तो वह किसी को भी स्वीकार्य नहीं हो सकता , यह अटल जी के स्वपन कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत से मेल नहीं खाता है ?
चूँकि यह समस्या राजनितिक है इसलिये यह राजनितिक तौर पर ही हल होनी चाहिए , लेकिन स्वयं केंद्र की सत्तारूढ़ बीजेपी समझने को तैयार नहीं है चूँकि कश्मीर में खंडित जनादेश मिला था चार पार्टियों में से किसी को भी बहुमत नहीं मिला था और यह भी सच है कि सब एक दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़े थे? दूसरा सच यह भी है कि बीजेपी को जो भी समर्थन मिला वह जम्मू क्षेत्र से ही मिला है लेकिन घाटी में उसका कोई आधार नहीं है , इस लिए बीजेपी ने जो प्रयोग घाटी में किया है सरकार बनाने का वह एक बड़ा कारण है लोगों की नाराजगी का , चूँकि बीजेपी केंद्र की सत्ता के बाद सभी राज्यों में येन केन प्रारकरेण पुरे देश में सत्ता पर काबिज होने की काशमस में कश्मीर में मिली जुली सरकार का प्रयोग कर रही है लोक तंत्र के लिए जरुरी है लेकिन अगर प्रयोग केवल सत्ता के लिए है तो यह किसी को भी स्वीकार्य नहीं है इसलिए पैलेट गन का प्रयोग को सत्ता को बचाए राख्ने के लिए नहीं किया जाना चाहिए ? अतः जनतंत्र की स्थापना के लिए जम्मू कश्मीर में विधान सभा भंग करके दुबारा से चुनाव कराये जायँ यही लोकतंत्र का तकाजा है ?

एस. पी. सिंह , मेरठ

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