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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: बचपन से ही सशक्त होती हैं महिलाएं, बदलता है तो बस हमारा समाज

Rizwan Noor Khan

7 Mar, 2021

मोनिका मीनल-

Women’s Day Special: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के मौके पर म्यांमार की नेता आंग सान सू की के द्वारा कही गई एक बात मैं यहां शेयर करना चाहूंगी- ‘You should never let your fears prevent you from doing what you know is right.’ काफी हद तक सच है ये। वोट देने के अधिकार के साथ शुरू होने वाले ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के साथ आज न जाने कितने ही अधिकार हम महिलाओं के हाथ में हैं। ये अलग बात है कि इन अधिकारों का इस्तेमाल हम समाज के लिहाज, परिवार के बंधनों या किसी और मजबूरी के कारण न करने को बेबस हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि किसी महिला का कमजोर होना या सशक्त होना पूरी तरह समाज पर निर्भर करता है।

मम्मी से सीखा ‘धैर्य और हिम्मत’
मुझे अब तक किसी बड़े या कठिन मौकों का सामना नहीं करना पड़ा है लेकिन छोटे-बड़े ऐसे कई मौके आए हैं जहां मेरी मम्मी ने मेरा साथ दिया। उनकी ही हिम्मत अब तक मेरे लिए प्रेरणा रही है। स्कूल में ही थी जब पापा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। तब से हम तीनों भाई-बहनों को संभालते हुए मैने हर डगर पर मम्मी को बड़े हिम्मत और धीरज के साथ कदम बढ़ाते देखा है और इसलिए हम सब आज आत्मनिर्भर बन पाए हैं।

कुछ दिनों पहले दूर के रिश्ते की एक बुजुर्ग महिला का आना हुआ। मुझे ऑफिस के बाद घर आकर काम करता देख उन्हें शायद कुछ महसूस हुआ क्योंकि वापस लौटते वक्त मेरे हाथों को अपने हाथों में थाम सहलाते हुए उन्होंने कहा, ‘तुम जैसी लड़कियां ऑफिस और घर दोनों भले ही संभाल रही हों, लेकिन मुझे लगता है कि ये अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, हमारा जमाना कहीं बेहतर था। हमारे पास केवल घर के भीतर के ही कामों की जिम्मेदारी थी, बाहर का टेंशन नहीं।’ मैंने उनसे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में सोचा पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारी यदि ऐसा होता तब तो आगे बढ़ने की ताकत ही नहीं होती।

पुरुषों से पहले महिलाओं को है बदलने की जरूरत
‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर हम महिलाओं को प्रोत्साहित करने वाले लेखन की कमी नहीं है। आए दिन हाउस वाइफ को लेकर उनके त्याग और कर्मठता के सोशल मीडिया पर पोस्ट पढ़ने को मिल जाते हैं इस मौके पर ऐसे लोगों की भी बेहतरीन पोस्ट पढ़ने को मिलती हैं जो अपने घर में सुबह की चाय से लेकर रात के डिनर तक में भेदभाव करने से बाज नहीं आते हैं। लेकिन क्या इन सब प्रयासों से महिला वर्ग को फायदा मिल सकता है…। नहीं इसके लिए समाज को बदलने की जरूरत है। समाज के पुरुषों से पहले महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी। क्योंकि महिलाओं के उस तबके को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है जिन्हें लड़कों या पुरुषों का किचन में होना नागवार गुजरता है।

– Monika Minal (twitter.com/monikaminal1)

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