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कम उम्र में ही सेक्सी दिखना चाहती हैं लड़कियां!!

वर्तमान हालातों के ठीक उलट एक दौर ऐसा भी था जब बच्चे अपने अभिभावकों की इच्छा के अनुरूप कार्य करते थे. फैशन की चकाचौंध से दूर यह समय बच्चों के विकास और उनके भीतर मौजूद बचपने के लिए सुनहरा काल कहा जा सकता है क्योंकि जब से व्यक्तिगत जीवनशैली में टी.वी. और इंटरनेट प्रधानता के साथ शामिल होने लगा है तभी से मनुष्य के वास्तविक और अपेक्षित स्वभाव में काफी भिन्नताएं देखी जा सकती हैं. विशेषकर बच्चों की बात करें तो हम इस बात को अनदेखा नहीं कर सकते कि इन सब चीजों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों की बदलती मानसिकता पर ही देखा जा सकता है. स्कूल जाने और खेलने की उम्र में आज बच्चे ब्वॉय-फ्रेंड और गर्ल-फ्रेंड के चक्करों में पड़ जाते हैं. अभिभावकों की आज्ञा के अनुसार कार्य ना करते हुए आज वह अपने लिए एक अलग दुनिया बसाने की सोचने लगे हैं. ऐसी दुनिया जिसमें उनके परिवार या संबंधियों का किसी प्रकार का कोई दखल ना हो.


वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें तो किशोर अपना अधिकांश समय वीडियो गेम्स के साथ बिताते हैं वहीं किशोरियों का सारा ध्यान अपने पहनावे और सुंदरता पर होता है. वह उम्र जिसमें उन्हें खिलौनों से खेलना चाहिए आज उसी उम्र में वे दूसरे लोगों को अपने प्रति आकर्षित करने के लिए सजती-संवरती हैं. कम उम्र के बच्चों में आ रहे यह बदलाव निश्चित तौर पर परिवर्तित होते सामाजिक और पारिवारिक हालातों के प्रति इशारा कर रहे हैं.


little girlक्या मैच्योरिटी पहले आने लगी है?

अमेरिका में हुए एक अध्ययन पर नजर डालें तो हालात कहीं अधिक चिंतनीय प्रतीत होते हैं. इस सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि छ: वर्ष की होने के साथ ही लड़कियां आकर्षक दिखने के बारे में सोचना शुरू कर देती हैं. जबकि इससे पहले यही समझा जाता था कि लड़कियों में यह चाहत किशोरावस्था में पहुंचने के बाद ही शुरू होती है.


ग्लेसबर्ग ( इलिनोइस) स्थित नॉक्स कॉलेज से संबद्ध मनोवैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में यह जानने की कोशिश की कि बदलते हालातों और विस्तृत होती जीवनशैली का बच्चों के मानसिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है. इस शोध के अंतर्गत मनोवैज्ञानिकों ने छह से नौ वर्ष की उम्र तक की लड़कियों को दो प्रकार की गुड़ियाएं, जिसमें से एक ने चुस्त और तंग कपड़े पहन रखे थे और दूसरी ने ढीले-ढाले वस्त्र, दिखाकर यह पूछा कि वह इनमें से किसकी तरह दिखना चाहती हैं.


वैज्ञानिकों के इस सवाल के जवाब में अधिकांश लड़कियों ने उस गुड़िया का चुनाव किया जिसने तंग और आकर्षक वस्त्र पहन रखे थे. उनके इस उत्तर के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित किया है कि अब कम उम्र की लड़कियां भी खुद को सेक्सी दिखाने के लिए तंग वस्त्र पहनना ही पसंद करती हैं.


क्या भारत में भी कम उम्र लकड़ियों की मानसिकता बदल रही है?

उपरोक्त अध्ययन को भारतीय परिदृश्य के अनुसार देखें तो भले ही पाश्चात्य देशों में छ: वर्ष की उम्र में लड़कियां सेक्सी दिखने की चाहत रखने लगती हैं, लेकिन अब भारत में भी यह परिस्थितियां कुछ ज्यादा भिन्न नहीं हैं. स्कूल में पढ़ने वाली छोटी-छोटी लड़कियां अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों को रिझाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके अपनाती रहती हैं. तंग और छोटे कपड़े पहनना उनकी जरूरत बन गई है, अन्यथा अपने दोस्तों की नजरों में वे ओल्ड-फ़ैशंड प्रमाणित हो जाएंगी. अपने दोस्तों के साथ वह पढ़ाई की बात करें ना करें उन मसलों पर चर्चा जरूर होती है जो उनकी उम्र से बिलकुल मेल नहीं खाते.


उनके भीतर आ रहे इन बदलावों के लिए सिर्फ इंटरनेट और मॉडर्न होती जीवनशैली को ही दोषी ठहराना सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि बच्चों को सही मार्ग पर चलाने के लिए कुछ जिम्मेदारियां उनके परिवार और समाज की भी होती हैं. परिवार को बच्चे के लिए प्राथमिक विद्यालय का दर्जा दिया जाता है. अभिभावकों को चाहिए कि वह अपने बच्चों में आ रहे हर परिवर्तन, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, पर नजर रखें और अगर वह कुछ गलती करते हैं तो उन्हें समझाएं. उन्हें सही-गलत की शिक्षा देने का सबसे पहला दायित्व उनके माता-पिता का ही है.


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