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बंधन नहीं भावनाओं का पर्व है करवाचौथ

karwa chauthभारतीय समाज परंपरा और मान्यताओं के धागे में गुंथा हुआ एक ऐसा समाज है जिसमें व्यक्ति के लिए उसके संबंध सबसे ज्यादा अहमियत रखते हैं. यही कारण है कि हमारे समाज में विद्यमान लगभग सभी परंपराएं पारस्परिक और भावनात्मक संबंधों को और मजबूती प्रदान करती हुई प्रतीत होती हैं. रक्षाबंधन, भाई-दूज, तीज आदि कुछ ऐसे त्यौहार हैं जो पारस्परिक संबंधों को भावनात्मक रूप से गहराई प्रदान करने के साथ-साथ जीवन में परिवार की उपयोगिता को भी दर्शाते हैं.


इन्हीं परंपराओं में से एक है करवाचौथ. यह वह दिन है जिसका इंतजार प्रत्येक विवाहित स्त्री को रहता है. परंपरानुसार करवाचौथ के दिन हर सुहागिन अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ आयु की कामना करते हुए निर्जल उपवास रखती है. रात को चांद देखने के बाद वह अपने व्रत को पति के हाथ से खुलवाती है.


भारतीय समाज में वैवाहिक संबंध अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं. हमारे परंपरा प्रधान समाज में विवाह एक ऐसी धार्मिक और सामाजिक संस्था है जो महिला और पुरुष को आजीवन एक-दूसरे से जोड़े रखती है. विवाह के पश्चात उनका जीवन व्यक्तिगत ना रहकर परस्पर सहयोग की भावना पर आधारित हो जाता है. वैवाहिक दंपत्ति परस्पर समर्पण की भावना को समेटे हुए अपने वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं.


कुछ उदारवादी लोगों का यह मत है कि करवाचौथ स्त्रियों की स्वतंत्रता को बाधित करता है. जब पुरुषों के लिए ऐसा कोई दिन निश्चित नहीं है तो महिलाएं ही क्यों इस दकियानूसी विचारधारा का पालन करें. वैवाहिक जीवन जब महिला और पुरुष दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है तो पत्नी को ही क्यों पति के प्रति अपना प्रेम और समर्पण प्रमाणित करना पड़ता है. आज जब महिलाएं और पुरुष दोनों ही एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं तो एक को ऊपर और दूसरे को निम्न दर्शाने के पीछे क्या तर्क है?


इस बात को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारतीय समाज अपने मौलिक रूप में एक पुरुष प्रधान समाज है. यहां प्रारंभिक काल से ही महिलाओं को पुरुषों से कमतर रखने के लिए विभिन्न प्रावधान किए जाते रहे हैं. परंपरा के नाम पर तो कभी रीति-रिवाजों की दुहाई देकर हर संभव तरीके से महिलाओं को यह जताया जाता रहा है कि परिवार के भीतर और बाहर वह मात्र आश्रित से अधिक और कुछ नही है. लेकिन वर्तमान समय में ऐसी व्यवस्थाओं ने अपना औचित्य पूरी तरह गवा दिया हैं. आज की नारी पढ़ी-लिखी और स्वतंत्र है. वह अपने भले-बुरे से पूरी तरह वाकिफ है. लेकिन फिर भी वह करवाचौथ जैसी संस्कृति को पूरी तन्मयता से अपनाती है. इसके पीछे साफतौर पर पति के प्रति उसका प्रेम छुपा है. आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी महिला जब विवाह के पश्चात करवाचौथ के रूप में पारिवारिक संस्कृति को सम्मानपूर्वक अपनाती है तो यह उसके स्वरूप को और अधिक विस्तार देता है. वहीं दूसरी ओर पढ़े-लिखे युवक भी अपनी पत्नी के प्रति अपना प्रेम भावनाएं व्यक्ति करने से पीछे नहीं हटते. वह भी इस दिन ऑफिस से छुट्टी लेकर या फिर जल्दी आकर उनके साथ अधिक समय व्यतीत करने की कोशिश करते हैं. भूखा ना भी रह पाएं तो उनके साथ पूरा सहयोग करते हैं. इन सब तथ्यों के आधार पर करवाचौथ को बंधन या रुढ़िवादी परंपरा कहना किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता.


किसी भी भारतीय महिला के लिए उसका पति एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसके बिना जीवन व्यतीत करने की कल्पना करना भी उसे गवारा नहीं होता. आजीवन सुहागिन रहने की आशा रखते हुए वह करवाचौथ के दिन पति के लिए लंबी आयु की दुआ मांगती है. निश्चित तौर पर यह दिन उस महिला के लिए बेहद खास है. भले ही आज के समय में जब सभी मान्यताएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आधार रख कर स्वीकारी या नकारी जा रही हैं तो ऐसे में अगर करवाचौथ के दिन पत्नी का भूखा रहना और पति की लंबी आयु की कामना करना असंगत या निरर्थक लगता है तो कभी कभार संबंधों और उनसे जुड़ी भावनाओं को विचार शक्ति से आंकना निरर्थक प्रतीत हो सकता ह. क्योंकि किसी भी महिला को करवाचौथ के दिन भूखा-प्यासा रहने के लिए विवश नहीं किया जाता. वह स्वयं अपनी खुशी से अपने पति के लिए यह सब करती हैं.


हालांकि किसी भी विवाहित स्त्री को उपवास रखने के लिए विवश करना पूर्णत: गलत है, लेकिन जो महिलाएं इस व्रत पर आस्था रखती हैं, उन्हें रोकना या भड़काना कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता.


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