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उपभोक्तावाद के दौर में पिसती मानवता

consumerismउदारीकरण और वैश्वीकरण के परिणाम स्वरूप भारत में अपनी जड़ें जमा चुका उपभोक्तावाद एक ऐसी आर्थिक प्रक्रिया है जिसका सीधा अर्थ है कि समाज के भीतर व्याप्त प्रत्येक तत्व उपभोग करने योग्य है. उसे बस सही तरीके से एक जरूरी वस्तु के रूप में बाजार में स्थापित करने की जरूरत है. उसको खरीदने और बेचने वाले लोग तो स्वत: ही मिल जाएंगे. क्योंकि मानव मस्तिष्क चीजों को बहुत जल्दी ग्रहण कर लेता है, और जब एक ही चीज उसे बार-बार बेहद प्रभावी तरीके से दिखाई जाए तो ऐसे हालातों में उस उत्पाद का व्यक्ति के दिल और दिमाग दोनों पर गहरी छाप छोड़ना स्वाभाविक ही है.


भले ही भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में उपभोक्तावाद अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा हो, लेकिन कुछ समय के भीतर ही इसने भारतीय संस्कृति और मानवता को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत मानव मूल्यों और नैतिकता को ताक पर रख, व्यक्ति को एक ऐसे उपभोक्ता की तरह प्रचारित किया गया है जो हर उस चीज का उपभोग करेगा जो उत्पादित की जा सकती है. बस उसे इन उत्पादों की जरूरत का अहसास कराने की देर है. उनका सीधा सा फंडा है कि व्यक्ति की जरूरत, उत्पाद के प्रचार के तरीके पर निर्भर करती है. अगर प्रचार सही और आकर्षक तरीके से किया जाए तो उसके भीतर उस उत्पाद को प्रयोग करने की जिज्ञासा अपने आप ही विकसित हो जाएगी.


लेकिन उपभोक्तावाद को समझना इतना भी सरल नहीं है. क्योंकि यह ना सिर्फ व्यक्तियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करता है. उनके भीतर लालच और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है वरन यह महिलाओं के शोषण में भी अपनी भागीदारी निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. यह अपने उत्पाद के प्रचार के लिए महिलाओं को एक साधन के रूप में प्रयोग करता है. पुरुषों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले कई ऐसे उत्पाद हैं जिनके विज्ञापनों में महिलाओं की उपस्थिति को बेहूदा तरीके से भुनाया जाता है. बात यहीं पर समाप्त नहीं होती क्योंकि घरेलू वस्तु जैसे कपड़े धोने और नहाने का साबुन, टूथ-पेस्ट आदि से संबंधित विज्ञापनों में भी महिलाओं को किस ढंग से पेश किया जाता है यह किसी से छुपा नहीं है. कुछ विज्ञापन तो ऐसे हैं जिसमें महिलाओं की नुमाइश करने की कोई जरूरत भी नहीं है लेकिन फिर भी उत्पाद को आकर्षक दिखाने के लिए उन्हें मात्र एक वस्तु के रूप में भद्दे तरीके से दर्शाया जाता है. क्योंकि विज्ञापन निर्माता इस बात को जानते हैं कि पुरुष उत्पाद को देखे ना देखे महिला के प्रति आकर्षित जरूर होंगे, और इस उत्पाद तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश भी करेंगे.


विज्ञापन बनाने वालों में भावनाएं ना के समान होती हैं. उनका एक मात्र ध्येय अधिकाधिक पैसा कमाना मात्र होता है. इसीलिए उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि महिलाओं को ऐसे रूप में प्रदर्शित करने से उत्पाद की बिक्री भले ही बढ़ जाए, लेकिन समाज में रहने वाली अन्य महिलाएं जिनका ग्लैमर की दुनियां से कोई लेना-देना नहीं है, उनको भी पुरुषों द्वारा उसी नजर से देखा जाएगा, जिस नजर से उस मॉडल को देखा जाता है जो विज्ञापन में बड़े ही कामुक तरीके से प्रदर्शित की गई है.


नारी सशक्तिकरण के समर्थकों को महिलाओं का प्रयोग नहीं उनका स्वावलंबन दिखाई देता है. इसीलिए वह उनके शोषण को भी आर्थिक प्रगति के रूप में ही देखते हैं.


उपभोक्तावाद और मानवता का प्रत्यक्ष रूप में कोई सकारात्मक संबंध नहीं है. उदारीकरण जैसी नीतियों को अपनाने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने पाश्चात्य वस्तुओं को भारतीय पृष्ठभूमि में अपना स्थान बनाने के लिए एक अच्छा अवसर दिया है. जिसके परिणामस्वरूप भारतीय लोगों की जीवन शैली में विदेशी हस्ताक्षेप बहुत तेजी से विकसित हुआ है. इन देशों के सम्पर्क में आने के बाद भारत में भी एक ऐसे तथाकथित अभिजात्य वर्ग का विकास हुआ है, जिसने पूरी तरह इस उपभोक्तावादी संस्कृति को अपने भीतर समाहित कर लिया है.


भारत जैसे देश जहां अधिकांश आबादी दो वक्त की रोटी की जुगत में अपना सारा जीवन व्यतीत कर देती है, वहां उपभोक्तावाद महंगी और गैर जरूरी वस्तुओं की भूख जगाता है. जिन्हें हासिल करने के लिए व्यक्ति कुछ भी कर गुजरता है. क्योंकि वह जानता है कि अगर उसे समाज में  अपने लिए एक सम्माननीय स्थान अर्जित करना है या खुद को अपडेटेड दर्शाना है तो उसके पास यह सब होना बेहद अनिवार्य है. उसकी इस मनोवृत्ति से सीधे तौर पर भ्रष्टाचार बढ़ता है.


उपभोक्तावाद के अंतर्गत एक ऐसे अभिजात्य वर्ग का विकास हुआ है जिसने आधुनिक जीवन शैली को पूरी तरह खुद में समाहित कर लिया है. इस वर्ग के लोगों की यह धारणा है कि वस्तुओं का अर्जन ही सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार है. उन्हें इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि इन वस्तुओं का संकलन कैसे किया गया है.  कम आय वाले लोग किसी भी तरह जल्दी से जल्दी धनी बन जाना चाहते हैं ताकि अनावश्यक सामान इकट्ठा कर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त की जा सके.


मनुष्य के इस लालच का घृणित परिणाम दहेज की मांग को लेकर औरतों पर होने वाले अत्याचार भी हैं. बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग के लोग, जो केवल अपनी आय पर निर्भर रहकर तथाकथित शान बढ़ानेवाली वस्तुओं को नहीं खरीद सकते, वे दहेज के माध्यम से इस लालसा को मिटाने की कोशिश करते हैं.


उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि उपभोक्तापवाद के इस दौर में मानवीय मूल्यों का कोई स्थान नहीं है. यह भारत की संस्कृति और मौलिक विशेषताओं से कोई संबंध नहीं रखता. इसके अलावा उपभोक्तावाद के अंतर्गत नैतिकता, ईमानदारी और मानवता का भी कोई अर्थ नहीं है.


कुछ तथाकथित उदारवादी लोगों का मानना है कि भारत में उपभोक्तावाद का प्रचलन गरीबी को घटाने में बेहद सहायक सिद्ध हो सकता है. लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट है, क्योंकि उपभोक्तावाद गरीबी को नहीं बल्कि गरीब और हमारे भीतर व्याप्त मानवता को समाप्त करने वाला है.


उपभोक्तावाद ने इस कदर अपनी पहुंच और जड़ जमा लिया है कि इसे समाप्त किया जाना किसी भी रूप में संभव नहीं है. इसीलिए एक विकसित और परिपक्व मानसिकता वाले नागरिक को चाहिए कि उपभोक्तावाद की सीमा में बंधने के बजाय स्वयं सीमा में रहकर इसका प्रयोग करे.


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