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मत छीनो मुझसे मेरा बचपन


child_labour_25यह श्याम है इसकी उम्र 12 वर्ष है. यह अपने माता-पिता और चार भाई-बहनों के साथ रहता है. एक वर्ष पहले इसके पिता को लकवा पड़ा था और तब से वह बिस्तर में ही पड़े रहते है. श्याम की माता दूसरे घरों में बर्तन धोती हैं और महीने में दो हज़ार रुपये कमाती हैं परन्तु यह रकम सात लोगों के परिवार का खर्चा चलाने के लिए उपयुक्त नहीं थी अतः श्याम को एक ढाबे में काम करना पड़ा. उसे अपना स्कूल छोड़ना पड़ा और पैसों की खातिर उसे अपना बचपन कुर्बान करना पड़ा. यह कहानी केवल श्याम की नहीं है. यह दास्ताँ उन करोड़ों बच्चों की है जिनका बचपन गरीबी के कारण अंधकारमय हो गया है और मज़बूरन उन्हें बाल मज़दूरी करनी पड़ रही है.

 

बचपन-“खुशियों का बसेरा”

 

बचपन का मतलब होता है मौज-मस्ती और खेल-कूद के दिन, जहाँ बच्चा किताबों के माध्यम से ज्ञान अन्वेषण करता है.School Going Kids बाल अवस्था में बच्चा सुख-दुःख से अनजान कभी अपनी किताबों से भरे बस्ते से जूझता है तो कभी अध्यापक द्वारा दिए गए होमवर्क से, कभी खेल के मैदान में क्रिकेट की गेंद से जूझता तो कभी अपने दोस्तों के मनोभावों में बहकर क्रोध का पात्र बनता है. बचपन मासूम होता है, एक बच्चे के लिए उसका घर और स्कूल ही उसका संसार होता है.

 

जब हम बालिग अवस्था में कदम रखते हैं तो जीवन यापन करने के नए आयाम ढूँढने लगते हैं. रोज़ी-रोटी के संसाधनों की प्राप्ति के लिए हम नौकरी करते हैं और मौज-मस्ती के दिन ज़िम्मेदारी में तब्दील हो जाते हैं. परिवार का उत्तरदायित्व आपके कंधों पर आ जाता है और आप सामाजिक बंधनों से बंध जाते हैं. तब हम अपने बचपन की तरफ तरसी नजरों से देखते हैं और सोचते हैं काश “हम भी अगर बच्चे होते”.

 

लेकिन अगर आप से आपकी बाल्यावस्था छीन ली जाए और आप को रोज़ी-रोटी कमाने के लिए काम करना पड़े तो? काम क्या आप को मजदूरी करनी पड़े तो? कहाँ रह जाएगा आप का बचपन, खो जाएगी आपकी आज़ादी और आप की जिंदगी कालकोठरी के अँधेरे में कहीं गुम हो जाएगी. कुछ ऐसे ही फरियाद भारत के उन बाल मजदूरों की है जो हमसे यह गुहार कर रहे हैं कि “मत छीनो मुझसे मेरा बचपन”.

 

starving-kids-india-child-poverty1बाल-श्रम “एक अभिशाप”

 

आज हमारे देश में एक करोड़ से भी ज़्यादा बाल श्रमिक हैं जो दुनिया के किसी भी देश की तुलना में सबसे अधिक है. यद्यपि हमारा संविधान 6 से 14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की कवायद करता है फिर भी इसके बावज़ूद आज हमारा देश इस श्राप से ग्रषित है. आज हमारे देश में बाल मजदूर हर क्षेत्र में पाए जाते हैं. बीड़ी के कारखाने, शिल्पकारी, कारीगरी, होटलों, ढाबों और यहाँ तक की पटाखे बनाने जैसे असुरक्षित कार्यों में भी बाल श्रमिक पाए जाते हैं. विडंबना यह है कि लोगों को पता है बाल मज़दूरी समाज पर श्राप है, वह इसका विरोध भी करते हैं परन्तु सिर्फ बोलकर या लिखकर. ज़मीनी स्तर पर आप जाएं तो सच्चाई कुछ और है. यहाँ तक कि सरकार की बात करें तो वह बाल मजदूरी के खिलाफ़ नीतियाँ बनाती है परन्तु कितनों का पालन होता है इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 24 साल हो गए बाल मजदूरी निषेधाज्ञां और विनियमन कानून को परन्तु अभी तक स्थिति वही की वही है. आंकड़े बद से बदतर हो गए हैं. इतने वर्षों में बाल मजदूरी करने वाले बच्चों की गिनती 15 % अधिक हो गई है.

 

बाल मज़दूरी के कारण

 

1979 में सरकार ने गुरुपद्स्वामी समिति का गठन किया गया था जिसका उद्देश्य उन कारणों का पता लगाना था जिसके कारण बाल मज़दूरी फैलती है. इसके साथ-साथ इस समिति को बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए उचित उपाय भी सुझाने थे.

 

गुरुपद्स्वामी समिति के मुताबिक बाल मज़दूरी का मुख्य कारण गरीबी है. गरीबी के रहते हमारे देश के अधिकतर परिवार दो वक्त का खाना भी प्राप्त नहीं कर पाते, अतः मज़बूरन अपने परिवार के पालन-पोषण हेतु बच्चों को काम-धंधा ढूंढ़ना पड़ता है, जिसके रहते वह अशिक्षा का भी शिकार जो जाते हैं और अंततः बाल मज़दूरी करने पर आश्रित हो जाते हैं.

 

child_labour-721181वर्ष 2008 की विडम्बना

 

वर्ष 2008 में सरकार ने बाल मज़दूरी को अपराध घोषित किया, जिसके तहत होटलों, घरों, कारखानों इत्यादि जगहों में काम करने वाले बाल मज़दूरों को मज़दूरी से हटा कर उचित शिक्षा का प्रावधान रखा गया. इसके अलावा बाल मज़दूरी को बल देने वाले व्यक्तियों के खिलाफ़ दंड देने का प्रावधान भी रखा गया. जिसके तहत बच्चों को मज़दूरी करवा रहे व्यक्तियों को दंड के तौर पर कारावास हो सकती थी या उन्हें मुआवजा देना पड़ता. परन्तु सरकार के इस सराहनीय कदम के बाद भी इस कानून को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. लेकिन विडम्बना देखिये यह विरोध मालिकों की तरफ़ से ना होकर बाल श्रम से ग्रषित परिवारों की तरफ़ से था. इस विरोध का मुख्य कारण परिवारों की आर्थिक तंगी थी क्योंकि अगर उनके घर एक भी व्यक्ति काम करना बंद कर देता है तो इसका मतलब है कि उनके घर की आय कम होना अर्थात खाने की तंगी और गरीबी का बढ़ना. इस हालत में उनके पास इस कानून के खिलाफ़ विरोध करना ही बचता है.

 

परन्तु क्या यह विरोध सही है? क्या हमें इन नन्हे परिंदों के सपने तोड़ने का हक है? यह प्रश्न एक समस्या गहराते हैं जो कि समाज के प्रति अभिशाप है. आखिर यह सवाल उन करोड़ों बच्चों से जुड़ा है जो अंधकारमय जीवन जी रहे हैं.

 

इन बाल-मजदूरों को सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है बल्कि इनकी समस्या गरीबी के फंदे से जकड़ी है. अतः एक कर्तव्यनिष्ठ सामाजिक व्यक्ति होने के नाते यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम गरीबी के कारणों को समझें और इसे हटाने के प्रयत्न करें.

 

बाल मज़दूरी तभी खत्म हो सकती है जब इन बाल-मजदूरों को कम वेतन के एवज में अच्छी पढ़ाई मिले जिससे आगे चलकर वह भी अच्छी नौकरी पाएं या अच्छी जिंदगी के हकदार बन सकें. अच्छी नौकरी का मतलब है आर्थिक तंगी से निजात जो गरीबी भी खत्म करती है. अगर हम गरीबी से निजात पा लें तो उससे जुड़ी अनेकों समस्याएं समाप्त हों सकती हैं.

 

खुशियों के बसेरे में, मैं भी जीना चाहता हूं,
महसूस करना चाहता हूं बचपन की मौज-मस्ती,
तारों की टिमटिमाहट मैं भी देखना चाहता हूं,
आखिर मैं भी पढ़ना चाहता हूं,
आखिर मैं भी पढ़ना चाहता हूं…………..

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