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आनंद और उसकी नौकरी

Vichar Manthan

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नौएडा नया नया बसा था छोटे बच्चों के लिए स्कूलों की जरूरत थी। हमारे परिवार का प्राइमरी तक स्कूल था। एक दिन नेपाली युवक एक गोरे चिट्टे नेपाली लड़के को साथ ले आया और मुझसे बोला। आपको स्कूल में काम करने के लिए किसी की जरूरत होगी। यह लड़का ढाबे में काम करता मझे मिला, लेकिन वहांं बहुत दुखी था। इसलिए आपके पास लाया हूं। मैनें उससे कहा कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखना अपराध है। नेपाली ने सफाई दी कि गरीब का दुबला पतला बच्चा है। देखने में छोटा लगता है उम्र 15 वर्ष है।

 

 

 

मैंने देखा लड़के की आंंखों में मायूसी थी। किसी सभ्रांत घर का लगता था। पढ़ाई की उम्र में यह काम क्यों कर रहा है? नेपाली ने जवाब दिया  गरीबी सर। रहना खाना पीना आपके यहांं हो जायेगा। आप इसको 500 रूपये पगार पर रख लीजिये। मैं हर महीने पैसा इसके घर भेज दूंंगा बिचारे आपको आशीर्वाद देंगे।

 

 

 

लड़के का नाम आनन्द सौभाग्य था। नाम के साथ सौभाग्य जुड़ा पहली बार सुना। स्कूल दो मंजिला था, आनन्द स्कूल के गेट के पास कुर्सी पर बैठा रहता था। उसका काम स्कूल आने वाले हर बच्चे का ध्यान रखना था। स्कूल की छुट्टी होती तो सीढ़ियों पर खड़ा होकर बच्चों की उतरने में मदद करता। किसी काम के लिये कहो उसके चेहरे पर शिकन नहीं आती थी। जब क्लास चलती वह टकटकी लगा कर टीचर की तरफ देखता ऐसा लगता वह एक–एक शब्द को मन ही मन दोहरा रहा है।

 

 

 

हैरानी की बात थी पढ़ने में ऐसी रूचि लेता था जैसे उसकी पढ़ाई अधूरी रह गयी हो। बड़े अच्छे स्केच बनाता था। वह हमारे परिवार के बच्चों के साथ घुल मिल गया। यूंं समझिये परिवार का ही अंग बन गया। परिवार का हर बच्चा उसका टीचर बन गया। वह उनसे अधिक जानता था।हैरानी थी वह अंग्रेजी भी समझता था। बच्चों से अंग्रेजी की कहानियों की किताब लेकर पढ़ता। खाली समय में खाली कागजों पर सवाल करता। समस्या होती तो परिवार के किसी भी सदस्य से पूछ लेता। उसकी पहले महीने की पगार उसे लाने वाला ले गया। लेकिन, अब उसने कहा आप मेरा पैसा अपने पास जमा कर लें। लाने वाले ने उसे धमकाने की कोशिश की हमें भी देख लेने की धमकी दे कर चला गया।

 

 

 

आनन्द अपने बारे में कुछ बताता बस बच्चों से काठमांडू में पशुपति नाथ के मन्दिर का जिक्र करता था। बात करते-करते अचानक चुप हो जाता। कभी–कभी नेपाली भाषा में गुनगुनाता। उसे टीवी में फिल्म देखने का बहुत शौक था। लेकिन, दूरदर्शन में फिल्म हफ्ते में एक आती थी। वीसीआर का चलन शुरू हो गया था। परन्तु फिल्मों में उसकी रूचि कम होती गयी। मेरे भाईयों की इलेक्ट्रोनिक की अकेली दूकान थी। वह हर सभ्रांत नेपाल के बाशिंदे से पूछते आपके यहांं गुमशुदा बच्चे कैसे ढूंढे जाते हैं।

 

 

 

नेपाल के पढ़े लिख सज्जन से मेरे भाई ने कहा क्या काठमांडू की लोकल अखबार में फोटो सहित आप इश्तहार दे सकते हैं। आपका जो भी खर्च होगा आप बता दीजिये अभी दे देता हूंं। उस व्यक्ति ने कहा आप एक परदेसी बच्चे का इतना दर्द ले रहे हैं। इतना काम मैं कर दूंंगा। काफी दिन बीत गये। वह भलामानस फिर नहीं आया। हम निराश हो गये।

 

 

 

एक दिन दुकान पर एक सभ्रांत सम्पन्न व्यक्ति अपने दामाद के साथ आकर पूछताछ करने लगे। उनके चेहरे पर दुख की छाया आंंखें आसुओं से भरी थीं। अटक-अटक कर बोल रहे थे। गला रुंधा हुआ था। उन्होंने आनन्द का नाम लिया मेरा बेटा है। आनन्द को बुलाया उसने अपने पिता को देखा और दौड़ कर उनसे चिपट कर बिलखने लगा। वह बड़ा ही कारुणिक दृश्य था। आनन्द के पिता बेहाल थे बड़ी मुश्किल से उन्हें सम्भाला। उन्होंने बताया हम काठमांडू में रहते हैं। हमारा अपना रेस्टोरेंट है, बहुत चलता है।

 

 

उन्‍होंने आगे बताया कि आनंद वहांं के अच्छे स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ता था। न जाने कहांं से बाल कलाकार बनने की धुन सवार हो गयी।सब कहते थे गोरा चिट्टा घुंघराले बाल वाला लडका है। बड़ा होकर फिल्मों में धूम मचा देगा। यह शीशे के सामने एक्टिंग करता। सबने समझाया पहले पढ़ लो, मैं तुम्हें स्वयं बम्बई ले जाऊंगा। एक्टिग इंस्टिट्यूट में दाखिला करवा दूंगा। दुर्भाग्य से हमारे रेस्टोरेंट में एक आदमी आने लगा वह लच्छेदार बातें करता बम्बई नगरी के किस्से सुनाता। सब सुनते बाद में पता चला वह आनन्द के स्कूल के बाहर उससे बातें करता था। अचानक आनन्द ऐसा गायब हुआ कि हम हैरान हो गए।

 

 

हमें चिंता हुई और लगने लगा कि शायद किडनैप कर लिया गया है। कई दिन तक फिरौती के फोन का इंतजार किया। पुलिस ने कोशिश की बम्बई के लोकल अखबार में इश्तहार दिये। पर्चे मैंने खुद चिपकाये, सब बेकार। मेरी मांं दुख से मर गयीं। तीन बेटियों के बाद हमारा सौभाग्य बड़ी मन्नत से हुआ था। कई साल तक मन्नत उतारते रहे। एक दिन हमने रेलवे स्टेशन और बस स्टाप पर हाथ से लिखा कागज देखा। उसमें मेरे बेटे का हुलिया था। साथ ही उनका पता जिसने इश्तहार लगाया था। हम उनसे मिले तो उन्होंने कहा घबराओ नहीं आपका बच्चा सुरक्षित है और आपका पता बताया।

 

 

 

अब आनन्द बोला उसे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। सब कहते थे कि कितना सुंदर हीरो जैसा लड़का है। काका मुझे बम्बई के नाम से लाया था। पहले काम के लिए ढाबे पर लगाया। वहांं का मालिक बहुत मारता था। वह आदमी मुझे आपके यहांं लाया। वह तुरंत जाना चाहते थे। मेरे भाई ने उसकी जमा पगार उसके हाथ में रख दी। आनन्द मना करने लगा। सज्जन फिर बिलखने लगे। नहीं आपकी वजह से अपना लड़का देख रहा हूंं। हमने कहा यह इसका अपना कमाया स्काॅलरशिप है। इससे इसका एडमिशन कराइयेगा। पिता नें रूपये माथे से लगा लिये। आनन्द पैर छूकर सबके गले लग कर चला गया पर दिल से कभी नहीं गया। कई वर्ष बीते, एक दिन एक सुंदर लड़का घुंघराले बाल और बड़ी आंखों वाला मेरी दूकान पर चुपचाप खड़ा था। मेरे भाई ने उसे पहचान लिया और चिल्लाया आनन्द। दोनों एक दूसरे के गले लग गए। आनंद ने बताया कि वह अब दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमएससी कर रहा है।

 

 

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं, इसके लिए वह स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। संस्‍थान का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

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