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सत्ता से ऊपर धर्म मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

Vichar Manthan

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भगवान श्री कृष्ण की राजनीति धर्म स्थापना के सिद्धांत पर आधारित थी बाद के अनेक कूटनीतिज्ञयों ने राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत को मानते हुये मजबूत राजतन्त्र का समर्थन किया जिनमें अरस्तु और चाणक्य का ईसा से पूर्व का दर्शन हैं| 1531 में प्रकाशित मैकयावली की पुस्तक दा प्रिंस में नवोदित राजा कैसे अपनी सत्ता की पकड़ मजबूत करें के सुझाव थे | विश्व के इतिहास में न किसी ने देखा न सुना न कि ऐसा भी राज्य हो सकता है जहाँ सत्ता की पकड़ मजबूत करने के स्थान पर सिंहासन खाली था जिसका अधिकार था वह पिता के दिये बचनों को पूरा करने राजतिलक के दिन तापस वेश धारण कर श्री राम ने वन गमन किया भरत जिसको राज्य मिला उसे सत्ता की चाह ही नहीं थी उसने अन्याय का प्रतिकार किया |अपने ज्येष्ठ भ्राता को लेने सिंहासन और समस्त प्रजा के साथ वन में गये | सत्ता से ऊपर दोनों भाईयों के लिए धर्म मुख्य था| ऐसा भारत भूमि में महान प्रतापी राजा दशरथ की अयोद्धया में हुआ |स्वर्ण सिहासन पर श्री राम की खड़ाऊँ 14 वर्ष तक विराजमान रहीं उन पर स्वर्ण से जड़ा सफेद सिल्क का छत्र तना था| खड़ाऊँ के नाम का डंका बजा और दोनों भाई भरत शत्रुघ्न तपस्वियों का वेश धारण कर सख्त जीवन जीने का व्रत ले कर सिंहासन के चरणों में बैठ गये| भरत नंदीग्राम में रह कर राम के नाम पर उन्हीं की तरह जीवन बिताते राज्य चला रहे थे |उन्होंने अपनी जननी का भी त्याग कर दिया | प्रतिदिन मंत्री, सभासद और सेना प्रमुख दरबार में उपस्थित होते श्री राम की खड़ाऊँ के सामने सिर झुका कर सम्मान देते थे | पवित्र पावन अयोद्धया में कई दिन तक बादल सूर्य को ढके रहे ऐसा लगता था जैसे चारों और दुःख पसरा हों न गीत न संगीत  ऋतुएं आती थी चली जाती थी| पर्व भी आते थे चले जाते थे न हर्ष न उल्लास केवल उदासी थी जैसे उनके राजा राम वन में रहते थे इसी तरह सम्पूर्ण प्रजा जीवन बिता रही थी उन्हें इंतजार था उस घड़ी का जब 14 वर्ष समाप्त होंगे राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपनी नगरी में लौटेंगे|

महाराज दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के राज्याभिषेक का निश्चय किया सब और उल्लास था लेकिन कैकयी के मायके से आई दासी मंथरा को शांति नहीं थी वह महारानी के कक्ष में गयी बताया कल राम का राज तिलक है रानी आनन्दित हुई उसे पुरूस्कार देने लगी मंथरा ने उसे धरती पर फेक दिया| कैकयी मंथरा के कुटिल स्वभाव को जानती थी उसने क्रोध से कहा यदि मेरे आनन्द से आनन्दित नहीं हो सकती तो चुप ही रहो तू राम को नहीं जानती है उस जैसा प्रिय पुत्र नहीं हो सकता | मंथरा बोली भरत के पास संदेश भिजवाओ कभी ननिहाल से न लौटे तुम्हारे भी दिन फिरने वाले हैं राम राजा होगा उसकी माता राजमाता तुम उसकी सेविका |केकयी के मर्म पर चोट करते हुए कहा तुम और भरत यदि सेवक और सेविका बन कर रहोगे तभी चैन से जी सकोगी| रानी भयभीत हो गयी मंथरा की दुर्बुद्धि उस पर हावी हो गयी मंथरा ने कैकई को याद दिलाया तुम महाराज की तीसरी रानी हो महाराज के कोई सन्तान नहीं थी उन्होंने विवाह के समय तुम्हारे पिता को तुम से उत्पन्न पुत्र को राजसत्ता सौंपने का आश्वासन दिया था| धीरे –धीरे रानी मंथरा की बातों में आ गयी उसने रानी को याद दिलाया देवासुर संग्राम में तुमने रथ संचालन करते हुए राजा दशरथ के प्राण बचाए थे कृतज्ञ राजा ने तुम्हें दो वरदान मांगने के लिए कहा था आज यह सुअवसर आया है तुम राजा से अपने बरदान मांग कर अपने और भरत के अधिकारों की रक्षा कर सकती हो | जाओ कोप भवन में जा कर महाराज के आगमन की प्रतीक्षा करो एक बात याद रखना जब तक महाराज राम की सौगंध न खायें तब तक वरदान नहीं मांगना |रानी कोप भवन में चली गयी उसके केश बिखरे हुए थे वह नागिन की तरह फुंकार रही थी|  महाराज ने महल में प्रवेश किया हर तरफ शोक और संताप था रानी कहाँ थी ?मंथरा ने कोपभवन का मार्ग दिखा दिया महाराज आशंकित हुए ठिठके ,प्रिय रानी से क्रोध का कारण पूछा रानी ने महाराज को उनके दिए वरदानों की याद दिलाई| महारानी के षड्यंत्रकारी मन को न समझ कर राजा ने दोनों वर मांगने के लिए कहा यही नहीं राम की सौगंध भी खायी रानी के दो बचन क्या थे? तरकश से निकले दो विषैले तीर ,भरत को राज्य राम को तपस्वी वेश में 14 वर्ष का बनवास |असहाय बचनबद्ध राजा को रानी अजनबी लगी वह व्यथित हो उठे रानी को समझाया तुम अपने लिए वर नहीं वैधव्य मांग रही हो मैं यह अन्याय सह नहीं सकता परन्तु सब बेकार था |सुबह हो गयी महल में कहीं हलचल नहीं थी कारण जानने के लिए राजा के महामंत्री सुमंत महल में गये राजा की हालत देख कर कारण पूछने पर हैरान रह गये उन्होंने रानी की कुटिलता पर दंड देने को कहा बचनबद्ध राजा ने राम को बुलावा भेजा गया| राम ने पिता को व्यथित देखा कैकई द्वारा कारण जानने पर पिता के बचनों की रक्षा के लिए तुरंत वन जाने का निश्चय किया| निरपराध राम को बनवास ,उनके साथ पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण ने भी वन जाना अपना धर्म समझा| राज महल के बाहर सभासदों प्रमुख प्रबुद्ध जनों और जनसमाज की भीड़ बढ़ने लगी | राम और लक्ष्मण समस्त राजचिन्ह त्याग कर तपस्वियों के  वेश में राजमहल से बाहर आये साथ में राजसी वस्त्रों में राजलक्ष्मी सुकुमारी सीता भी थी |ऋषि वशिष्ठ ने सहारे से सीता को रथ पर चढाया राम को अपनी युद्ध विद्या का निरंतर अभ्यास करते रहने का परामर्श दिया | सुमंत ने हवा के वेग से चलने वाले घोड़ों को चाबुक से इशारा किया घोड़े अगले पंजों को ऊपर उठा कर हिनहिनाये वेग से सरपट भागने लगे | राजा को होश आया, बालकनी पर आकर चीत्कार कर उठे ठहरो-ठहरो लेकिन रथ महल का दरवाजा पार कर चुका था सेवकों ने द्वार बंद करने की कोशिश की लेकिन नाकाम हो गये महल के मुख्य द्वार पर आक्रोशित जन समूह खड़ा था हर निवासी अन्याय के खिलाफ अयोद्धया छोड़ने के लिए आतुर महाराज को दिए बचनों की रक्षा कैसे की जाए क्षुब्ध महामंत्री ने हवा में चाबुक लहराया विशाल भीड़ के मध्य से रथ को निकाल लिया | रथ ने पहले विशाल राजमार्ग पार किया धीर-धीरे मार्ग पतला होता गया कच्चे मार्ग से चलता रथ तमसा के तट पर रुका राजप्रसाद ,नगरी पीछे रह गयी लेकिन विशाल जनसमूह भी पीछा करते आ पहुँचा यह जनता का रानी के अन्याय के विरुद्ध जन आक्रोश था |

‘राम राम कहि राम कहिराम राम कहि राम |तनु परिहरी रघुबर विरह राऊ गयउ सुरधाम ||’ राजा ने प्राण त्याग दिये पिता की अन्तेष्ठी के बाद भरत ने सिंहासन स्वीकार नहीं किया उनका मन माता के कुकृत्य पर ग्लानी से भरा था | उन्होंने वन जा कर श्री राम को वापिस अयोद्धया लाने का निश्चय किया सभी नगरवासी , मातायें और गुरुजन साथ थे | वन में सभा बैठी भरत ने राम से आग्रह किया वह अपनी नगरी में लौट कर राज्य सम्भालें उनके स्थान पर वह पिता के बचनों की पूर्ति के लिए बन में रहेंगे| माता कैकयी पश्चाताप और ग्लानी से झुकी हुयीं थी जिसने बरदान मांगा अब उसे कुछ नहीं चाहिए था जिसके लिए राज्य माँगा उसे स्वीकार नहीं था |वह राम से लौटने का आग्रह कर रही थी| लेकिन पिता नहीं थे भरत के बार-बार आग्रह पर भी राम नहीं माने अंत में भरत ने कहा मैं नहीं आपकी खडाऊ सिंहासन पर बिराजेगी यदि 14 वर्ष के बीतने पर एक दिन भी ऊपर हुआ वह अग्नि में प्रवेश कर लेंगे |

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