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बचपन के वो प्यारे दिन

Sincerely yours..
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याद आते हैं न कभी कभी, बचपन के वो प्यारे दिन जब कभी रात के आठ बजे के बाद नौ बजते हमने कभी देखा ही नहीं. दिन भर की उछल कूद, स्कूल और खेल तमाशे के बाद क्या खाना है और कहाँ सोना है, ये सोचना हमारा काम नहीं होता था. हम तो बस शाम का अँधियारा घिरते ही जब हाथ- पैर और मुँह धो कर जैसे ही चुप होकर बैठे, उसके बाद क्या करते-करते कब और कहाँ नींद आ गयी, ये पता ही नहीं चलता था. सच है, बचपन के वो प्यारे प्यारे दिन तितलियों के परों पर सवार हो कर न जाने कब दूर आकाश में बादलों की तरह उड़ गए, पता ही नहीं चला. 

ऐसा ही एक नन्हा सा बच्चा था, रोहन. कहने को तो सिर्फ छः साल का था, लेकिन बड़ा होशियार. मम्मी-पापा सब की आँखों का तारा . पढने में जितना होशियार उतना ही बड़ा खिलाडी. हमेशा कोई न कोई नयी हरकत कर के माँ को चौंका देता था. एक दिन शाम को काफी अँधेरा हो चला लेकिन रोहन खेल कर घर नहीं लौटा. माँ की तो डर के मारे  हालत ख़राब होने लगी. उलटे सीधे विचार मन में आने लगे. आखिर जब नहीं रहा गया तो बेहाल हो कर ढूंढने निकली. देखती क्या है कि जनाब शर्ट को पेट पर आधा  मोड़े हुए उस में कोई चीज़ बटोरे, पूरे के पूरे बीसों दांतों की प्रदर्शनी लगाये हुए चले आ रहे हैं. ख़ुशी से चेहरा लाल हुआ है. मुस्कान है कि रोके नहीं रुक रही. माँ डाँटना वाटनाभूल कर आश्चर्य में पड़ गयी कि आखिर इनको ऐसा कौन सा खज़ाना मिल गया है. रोहन दौड़ कर माँ के पास आया और  खुशी ख़ुशी एक साँस में बताना  शुरू कर दिया कि कैसे आज उन्हों ने एक गिलहरी के नन्हे से बच्चे को पकड़ा, कैसे गोद में समेटा और कैसे इसे उठा कर  ले आये  हैं. अगला प्लान यह है किअब इसे पालतू बनाएंगे और अपने रूम में रखेंगे.

माँ के गुस्से का ठिकाना न रहा. कहने लगी -” तुम्हारी खुराफातें दिन पर दिन बढती ही जा रही हैं, गिलहरी का  इतना नन्हा सा बच्चा माँ से अलग हो कर कैसे रहेगा ?” कोई तुमको मुझसे अलग कर दे तो रह लोगे?
रोहन एक सेकंड के लिए तो अवाक् ही रह गया. अपराध – बोध के मारे आँखों से टप -टप आंसू  गिरने लगे . लडखडाती आवाज़ में बोला- “तुम्हे क्या पता माँ, मैं ने कितनी मेहनत की है इस को यहाँ  तक  लाने में.”
“लेकिन ..ये खायेगा क्या?” माँ बच्चे को रोता देख कर थोडा कमज़ोर पड़ गयी. 
रोहन को कुछ आशा बंधी. चहक कर बोला “बिस्किट,अमरुद, रोटी, कुछ भी खा लेगा…”
“और रहेगा कहाँ?..तुम्हारी शर्ट में?” 
अब सोचने की बारी रोहन की थी. कुछ सोच कर बोला – “माँ, तुम किचेन वाली वो जालीदार बास्केट दो न, जिस में टमाटर रखती हो. आखिर इसको सांस लेने के लिए ऑक्सीजन कैसे मिलेगी?” रोहन साहब आज बड़े होशियार हो गए थे. 
जल्दी जल्दी उसके रहने के लिए जालीदार टोकरी में पुरानी कॉपी के पन्नों का बिस्तर लगाया गया , उस में रोहन ने बिस्किट और मूंगफली के दाने रख कर, बच्चे को धीरे से रख कर,  टोकरी का ढक्कन लगा दिया , और जम कर वहीँ बैठ  गया. बेचारा गिलहरी का बच्चा दहशत में था. उस ने कोई भी चीज़ नहीं छुई.केवल चीं, चीं करता रहा.
रोहन की माँ बोली- “देखो तुम ने उसे उस की माँ से दूर कर दिया है न, वो इसी लिए इतना दुखी है.”
रोहन को बात पसंद नही आयी. विरोध के स्वर में बोला . “इतना अच्छा खाना कहीं उस की माँ खिलाती होगी…” फिर भी एक चिंता सी तो हो ही रही थी कि अब क्या होगा? 
रात हो गयी . रोहन ने होम वर्क भी कर लिया, खाना भी खा लिया , सोने चला , लेकिन गिलहरी का बच्चा वैसे ही गुमसुम एक किनारे बैठा रहा .रोहन ने पास जाकर मूंगफली के दाने गिने. जितने उस ने डाले थे , सब पूरे  के पूरे  मौजूद थे. रोहन की माँ भी देखने आयी. बच्चे को भूखा बैठा देख कर दुखी हो कर बोली. “वो नहीं  खायेगा, उसे अपनी माँ की याद आ रही है.” बच्चा वैसे ही गुमसुम सा एक किनारे  बैठा चीं चीं करता रहा.
रोहन अन्दर ही अन्दर सहम गया, अब क्या करे? पता नहीं इस की माँ अब कहीं मिलेगी भी या नहीं? कहीं ये बेचारा अपनी माँ के बिना भूखा न मर जाये. लेकिन अब कर भी क्या सकता था. रात काफी हो गयी थी. उस ने चुप चाप टोकरी उठाई और उसे  खिड़की की चौड़ी सतह पर रख कर सोने चला गया…
रात भर उसे अजीब अजीब सपने आते रहे, देखा कि वो माँ का हाथ पकडे घूम रहा है तभी एक  राक्षस उसे  छीन कर भागा  और ले जा कर पहाड़  की चोटी  पर बैठा दिया ..
वो चीख कर उठ बैठा. माँ ने उसे  और चिपका  कर सुला लिया लेकिन फिर भी उसे ठीक से नींद न आयी. 
सुबह होते ही वो सब से पहले भाग कर अपने  नन्हे मेहमान के पास पहुंचा, और वहां का दृश्य देख कर हतप्रभ रह गया………
खिड़की के उस पार उस नन्हे बच्चे की माँ सीखचों से चिपक कर बैठी थी और इधर वो बच्चा टोकरी की जाली से….
माँ के पंजों में एक छोटा सा कच्चा अमरुद था, जिसे वो बीच में रखे हुए थी और उस का बच्चा बड़े मज़े से , टोकरी के अन्दर से ही कुतर कुतर के अमरुद खा  रहा था.
इतने में रोहन की मम्मी भी  पीछे से आ गयी…
रोहन को अपना रात वाला सपना याद आ  गया…..वो माँ  से लिपट गया..
माँ ने कहा…….”देखा….मैं ने कहा था न, वो माँ के बिना  खाना नही खायेगा.. तुम खाते हो कहीं, मेरे बिना..?”
अब जा कर  रोहन को बात समझ में आई.  लेकिन तब तक गिलहरी इन लोगों को  देख कर भाग गयी थी और बच्चा बड़े जोर से चीं चीं चीं चीं चिल्ला  रहा था मानो माँ  को देख कर उसे संजीवनी शक्ति मिल गयी हो…
माँ ने रोहन को समझाया “वो कही गयी नहीं होगी, वहीं बाहर कहीं बैठी होगी. तुम ऐसा करो, इस बच्चे को टोकरी से निकाल कर गार्डेन में ले जाओ , देखना वो खुद ही आ जाएगी..”
रोहन ने दुखी मन से डरे हुए बच्चे को टोकरी से निकाला.. फिर से अपनी शर्ट में संभाल कर रखा ,और भारी क़दमों से गार्डेन में आ गया, बच्चे को हौले से घास पर रख कर वापस घर के  दरवाज़े तक आया ही था कि  देखता क्या है कि एक पेड़  के पीछे से निकलकर माँ गिलहरी सर्र से आई  और पालक झपकते ही बिजली की सी तेज़ी से बच्चे के साथ सामने वाले पेड़  पर चढ़ कर गायब हो गयी….
देखते ही देखते रोहन का रात का मेहमान विदा हो  गया……रोहन उस खाली टोकरी के पास वापस आया और मूंगफली के दाने गिनने लगा…..सारे के सारे  दाने वैसे ही पड़े थे……..
ड‍िस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम क‍िसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्‍ट‍ि नहीं करता है।  

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