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प्रार्थना (लघु कथा)

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भगवान गणेश की प्रतिमा के सामने मंदिर में खड़ी मंगला ने आज तक कभी भी कुछ नहीं मांगा। वह तो बस हर बुधवार को रिद्धि.सिद्धि के दाता भगवान गणेश के मंदिर आती और मंगलमूर्ति के सामने अपनी आंखें मूंदकर खड़ी हो जाती। अपने मन को एकाग्र कर, अपनी आत्मा को परमात्मा से एकीकृत करके एक सुखद अहसास करती। चाहे कुछ भी हो जाए, बरसों से बुधवार को उसका मंदिर आने का क्रम अनवरत जारी था।

आज भी मंगला मूर्ति के सामने खड़ी थी। बुधवार और उस पर बड़ी चतुर्थी, ऐसा संयोग भरा दिन। मंगला प्रभु के चरणों में ध्यान लगाने की चेष्टा कर रही थी, मगर वह अपने आपको एकाग्र नहीं कर पा रही थी। लाख कोशिशें करने के बावजूद उसका मन परमात्मा में समाहित होने के बजाए बार-बार उचट जा रहा था। वह आंखें बंद कर एकदंत विघ्नविनाशक की छवि अपने अंतस में उतारने की कोशिश करती मगर उसके छोटे से मन में, सारी सृष्टि के पालक अपना विशालरूप लिए समा ही नहीं रहे थे।

मंगला के साथ ऐसा पहली बार हो रहा था। वह बार-बार अपने आराध्य की स्तुति के लिए आंखें बंद कर अपने मन में उनकी छवि उतारने की कोशिश करती, मगर भगवान की छवि की जगह उसे अपनी आंखों में आज ही खरीदी गई अपनी नई चप्पलों की जोड़ी दिखाई देती। वह नई चप्पल जो वह मंदिर की सीढ़ियों के पास नीचे उतारकर दर्शन करने ऊपर चली आई थी। मंगला जिन घरों में काम करती है, उनकी मालकिनें कैसे अच्छी-अच्छी नई डिजाइनों वाली चप्पलें पहनती हैं। कोई हील वाली तो कोई सैंडिल जैसी बद्दीवाली। मंगला को कभी कोई, तो कभी कोई अपनी चप्पल दे ही देता था। फैशन के बदलते ही मंगला के पैर में पुरानी उतरी हुई चप्पल आ ही जाती थी। पर नई चप्पलों की चाह पूरी नहीं होती थी, वही जिन्हें बाजार में कांच के जगमगाते शोकेस में मंगला देखती आई थी।

मालकिन बिटिया की शादी की खरीदारी में मंगला को भी साथ ले गई थीं। शोकेस में रखी चप्पलों को ललचाई निगाहों से देख रही मंगला, मालकिन की निगाह से बच न सकी। “चाहिए “… मुंह से कुछ न बोल सकी ऐसा लगा उसकी चोरी पकड़ी गई है। निगाहों में लालच अवश्य था। पैक करवा लो… मालकिन ने कहा।  मगर मालकिन… पैसे। बिटिया की शादी है, तुम्हारे लिए तोहफा है और ऐसे मंगला ने पहली बार मंहगी वाली चप्पल दुकान से खरीदी थी, जिन्हें पहनकर वह मंदिर चली आई थी। मंगला ने एक झटका देते हुए गर्दन को हिलाया। कहां भगवान की आस्था और कहां एक जोड़ी चप्पल। उसकी आत्मा ने उसे धिक्कारा। आंखें मूंदकर फिर से एक बार कोशिश करने लगी कि मंगलमूर्ति, गणपति बप्पा के प्रति उसकी आस्था पुनर्जीवित हो जाए।

आंखें बंद, हाथ नमन की मुद्रा में थे, पर मंगला का चंचल मन था कि वह फिर उन्हीं चप्पलों की जोड़ी पर जा अटका। कहीं कोई उन्हें चुरा न ले जाए। जिसने भगवान से कभी कुछ न मांगा। वह आज अचानक भगवान से मांग बैठी। भगवान नीचे मेरी नई चप्पल पड़ी है, कोई चुरा न ले उसको। बस इतना कहा और आंखें खोल लीं। मंगला ने मूर्ति से थोड़ा सा सिंदूर उंगली में लिया उसे मांग पर फेरा और कलाई में बंधे पुराने पंचरंगी धागे को खोला और नया धागा लेकर दौड़ती हुई सीढ़ियां उतरने लगी। नीचे आकर उसने देखा उसकी नई चप्पलें सुरक्षित रखी थीं। मंगला की आत्मा तृप्त हो गई, उसने चप्पलें पैर में डाली और बोली “भगवान  आपने मेरी प्रार्थना सुन ली।”

— श्याम यादव  श्रीविनायक 22.बी संचार नगर एक्सटेंशन, इन्दौर 452016

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