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जहां औरतें संघर्ष की दूसरी दुनिया में कैद हैं

Shyam Dangi

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मायानगरी मुंबई यूं तो सपनों की नगरी कही जाती है, जहां सपने समुद्री लहरों की माफिक हिलोरे लेते हैं और किसी एकांत की तरह ठंडे पड़ जाते हैं। कहा जाता है कि यहां सपने जीतते हैं तो आसमां का फैलाव कम पड़ता है और सपने हारते हैं, तो दर्द भी बड़ी शिद्दत का मिलता है। खैर, यह शहर शोहरत, सपनों और गुमनामी की कई कहानियों को अपने आंचल में समेटे हुए है। इन्हीं कहानियों में आम मुंबइया औरत जो दरअसल यहां की असली माया है उसकी भी अनकही, अद्वितीय और संघर्षभरी दास्तानें दुबकी पड़ी हैं, जिनका जिक्र जरूरी व महत्वपूर्ण दोनों ही हो जाता है। इन दुबकी हुई कहानियों का ही एक हिस्सा हैं यहां की आम औरतें। जो आपको चाय के होटलों पर चाय बनाते, गुटखा-पान की दुकानों पर रसदार पान बनाते हुए या फिर फुटपाथ पर खाने के छोटे-छोटे स्टॉलों पर खाना खिलाते मिल जाएंगी। जो इस मायावी नगरी का एक दूसरा लेकिन सख्त पहलू है। यही नहीं ट्रेन में, बस में भी आप महिलाओं को लटकते सफर करने के नजारे देख सकते हैं।

एक आम मुंबइया औरत जो गहरे, अंधेरगर्द माहौल में जीवनयापन करती है, उसे देखकर सहसा ही मुक्तिबोध का महाएकांत दिमाग में कौंधने लगता है। इन तमाम ऊहापोह के बीच यहां औरतों का जीवन महज आधी बेटी,  आधी पत्नी और आधी मां बनकर ही रह जाता है। एक आम भारतीय नारी, जिसे अभी तक महज एक हाउसवाइफ के अतिवाद से बाहर नहीं निकलने दिया गया, वहीं मुंबई की एक आम औरत भागमभाग जिंदगी की जद्दोजहद में अपना पूरा जीवन गुजार देती है। घरेलू कामकाज, नौकरी-पेशे के बीच एक बेहतर बेटी,  एक अच्छी पत्नी और एक बेहतर मां बनने का अतिरिक्त दबाव मुंबई की हर औरत झेलती है। वह अवसादों के गुबारों को अपने सिरहाने रखकर सोती है और सुबह जब उठती है तो उन्हें अपने साथ अपने साजो सामान के साथ रखकर घर बाहर निकलती है। असल में यहां एक औरत के लिए एक बेहतर बेटी, पत्नी और मां बनना किसी चुनौती से कम नहीं है।

मर्लिन मुनरो ने अपनी एक कविता में औरत की चुनौतियों को बड़ी खूबसूरती और शालीनता से पेश किया था…

‘मेरा अंदाज़ा है
कि मैं हमेशा गहरे में आतंकित रही हूं
सच में किसी की पत्नी बनकर
जब तक मैं जान नहीं लेती कि जि़न्दगी क्या है
दूसरों को कैसे प्यार कर सकती हूं
हमेशा, सच में’।

 

सच में। मुंबई की एक आम औरत की यही अनकही कहानी है। जो झकझोरती है, लेकिन जीने का हौसला भी देती है। जिन कामों को अभी तक हमारा भारतीय समाज केवल मर्दों के हिस्से डालते आया है, वही काम आज मुंबई में आम औरतें करते नजर आती हैं। जहां मायानगरी की अपनी एक अलग दास्तान है, वहीं एक आम औरत अपनी एक अलग किस्सागोई से, इस शहर की अलग महत्ता कायम करती है। जहां एक आम भारतीय नारी रिश्तों के महीन धागों को समेटने में अपना जीवन बिता देती है, वहीं यहां की आम औरतों को इन महीन धागों को समेटने के अलावा, जीवन की अन्य जिल्लतों से भी दो-चार होना पड़ता है।

वैसे तो मुंबई की अनकही दुनिया पर कई कलमकारों की कलम चली है। इनमें मंटो ने तो इस महानगर की दुखती रग पर ऐसे अफसाने गढ़े कि उन्हें समझने के लिए शायद आने वाली एक सदी भी कम पड़े। वहीं देश में आपातकाल के समय मुंबई के कमाठीपुरा के रेड लाइट एरिया में रहने वाली औरतों के जीवन की दुश्वारियों को आबिद सुरती ने उपन्यास ‘वासकसज्जा’ में उकेरा था। बाद में एस हुसैन जैदी की क़िताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई: स्टोरीज ऑफ वुमेन फ्रॉम द गैंगलैंड्स’ में वेश्याओं के जीवन पर कलम चलाई। हालांकि आम मुंबइया औरतों की परेशानियों से भरी दुनिया पर कलम कम ही चली है।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी आंकड़े या दावे की पुष्टि नहीं करता है।

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