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आँख मिचौली वासंती संग

Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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आँख मिचौली वासंती संग

प्रिय दोस्तों इस रचना को कानपुर उ प्र तथा जमशेदपुर (टाटानगर) झारखण्ड से प्रकाशित दैनिक जागरण के आज के अखबार २१.२.१३ में प्रकाशित किया गया आप सब पाठकों और जागरण जंक्शन का बहुत बहुत आभार
भ्रमर ५
प्रतापगढ़ उ प्र
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पीत वसन से सजी धरती सखि
सोन से भाव में तोलि रही सब
सोंधी सी खुश्बू हिया अब उमड़ति
प्रीति के चन्दन लपेटि रही अंग
कुसुमाकर बनि काम कुसुम तन
सिहरन बनि झकझोरि रहे हैं
नील गगन रक्तिम बदरी मुख
मलयानिल बढ़ी खोलि दिए हैं
पतझर के दिन बीते रे सजनी !
कोंपल-हरि मन जीत लिए हैं
कूके कोयलिया मन बागन में
बौर सना रस प्रीति सुधा जिमि
पवन मंद ज्यों बेल लिपटि फिर
दूर भये व्याकुल चितवन करि
आँख मिचौली वासंती संग
आनंदी आनंद मगन ह्वे
सब ऋतुवन को जीति लियो है …..
पियरी सर-सों मन मीत पियारी
प्रीति अधर खिलि मोह लियो है
स्वर्ग अप्सरा मोर मगन मन झंकृत कर हे
दुल्हन वसुधा श्रृंगार चरम करि तीन लोक में
प्रकृति नटी हिय झंडा गाडि के रीझि रही है !!
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सभी प्रिय मित्रों को वसंत पंचमी और माँ सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभ कामनाएं ….जीवन में माँ शारदे ज्योति भरें मन पुष्पित पल्लवित हो और सदा सदा वसंत सा झूमता खिलखिलाता जीवन समाज को कुछ दे के ही जाए हम समाज से जब लेते रहे हैं तो de के जाना भी हमारा धर्म ही तो है
जय श्री राधे

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़ अवध
14.02.2013 11.45 मध्याह्न

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