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बेटियाँ

मन-दर्पण

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सदियों से बेटों की चाहत में कोख में ही मिटती रही है बेटियाँ
धन-दौलत के लालच में दहेज की वेदियो पर जलती रही है  बेटियाँ
हवस की आग में अंधे गुनाह करते है दरिंदे
और जमाने भर  दंड सहती रही है  बेटियाँ
रखती है वो दो कुलों का मान भी सम्मान भी
और मान-सम्मान के नाम पर क़त्ल भी होती रही है बेटियाँ

लिख तो दी तूने कहानी उसकी अपनी जुबानी
पर भुला दिया इस कहानी में एक किस्सा उसका अपना भी है
खुदा ने बख्शी है जो ये ज़मीं ये आसमां उसमे एक हिस्सा उसका भी है
है आँखों में कुछ ख्वाब उसके भी दिले नादाँ में कुछ अरमां उसका भी है
पर तोड़ दिए तूने सपने उसके अरमां सब  उसके क़त्ल कर डाले
की उड़ने जो चाहत उसने पंख तूने उसके कतर डाले
मिटा दिया उसकी ही कहानी से किस्सा उसका
छीन लिया उसके हिस्से की वो ज़मीं वो आसमां उसका
और डाल दी पैरों में उसके बंदिशों की कितनी ही  बेडियाँ
जिन बेडियो में जकड़ी मुद्दतों से घुटती है बेटियाँ

है से सदियों अनुत्तरित वो प्रश्न
जो आज भी चुभता है बनकर एक दंश
है गर बेटो से चलता तुम्हारा वंश
तो क्या बेटियाँ है किसी गैर का अंश
जन्म जब माँ एक बच्चे को देती है
वो बेटा हो या बेटी पीड़ा उसको उतनी ही होती है
सदियाँ बदल गयी अब तुम भी बदलो अपनी सोच
नहीं बेटे-बेटियों में कोई अन्तर
ना ही बेटियाँ है कोई बोझ
दो बेटी को भी उसका अधिकार
दो उसको भी अच्छी शिक्षा और संस्कार
बेटो से कम नहीं होती है बेटियाँ
गर बेटा है कुल का दीपक
तो कुल की ज्योति होती है बेटियाँ

शिल्पा भारतीय “अभिव्यक्ति”

(२३/०४/२०१४)

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