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जब जड़ नहीं तो वृक्ष कैसा!

मन-दर्पण

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वैज्ञानिको का एक शोध कहता है किआधुनिक मानव अपने विकास की सर्वश्रेष्ठ अवस्था में है!
तो भाई प्रकृति का नियम है कि ”जिसका उत्थान हुआ है उसका पतन भी निश्चित है ”
तो जाहिर सी बात है मनुष्य का पतन भी निश्चित है जिसके लक्षण हमारे समाज में परिलक्षित होने लगे हैं!
जरा गौर करे..
आदिमानव से आधुनिक मानव एक लंबी, सतत विकास प्रक्रिया का परिणाम है|
आदिमानव अपनी पेट की भूख मिटाने के लिये जानवरों का शिकार करते थे
फिर कृषि का विकास हुआ और उसके जीवन में स्थायित्व आया
परिवार बने, कुनबा बना, समुदाय बना और फिर समाज बना और उस फिर उस समाज में रहने के कुछ नियम, धर्म,कायदे -कानून बने|
ऐसे उसके सामाजिक जीवन का विकास हुआ अब एक नजर उसके सामाजिक जीवन के पतन की ओर….
संयुक्त परिवार की वो जड़ जो सभ्य समाज रुपी वृक्ष का आधार थी..संयुक्त परिवार जिसमे बच्चे में संस्कार रुपी बीज पड़ते थे..
जिसमे वह सहयोग,सहअस्तित्व की भावना सीखता था..बडो का आदर छोटो को प्यार करना सीखता था..
घर में माँ,बहन चाची ,दादी के सानिध्य में स्त्रियों का सम्मान करना सीखता था,
दादा-दादी, नाना-नाना ,ताऊ-ताई के रूप में बुजुर्गो का सम्मान करना सीखता था  ..
हमने क्या किया! हमने उपभोक्तावादी संस्कृति और बाजार वाद के प्रभाव में अपने व्यक्तिगत सुख की चाह में आकर उस संस्कार रुपी जड़ को ही काट डाला जब जड़ नहीं तो वृक्ष कैसा!
संस्कार और मूल्यों से विहीन मनुष्य उस वहशी जानवर के समान होता है जिसका नैतिकता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता |
उस आदिमानव की पेट की ”भूख” विकसित हो आधुनिक मानव की ”हवस” में तब्दील हो चुकी है, हवस ”धन-दौलत” की, ”संपत्ति की”, ”वासना” की..
अपनी इस हवस के वश में अंधा हो  हर नैतिकता को ताक पर रख कर  आदमी-आदमी का ही शिकार किये जा रहा  है ..
संयुक्त परिवार का टूटना, संस्कार-मूल्यों का पतन होना उसके दुष्परिणाम स्वरूप सामजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होना
और इस सामाजिक ढाँचे के विघटन के अपने अलग ही दुष्परिणाम निकल कर सामने आ रहे है ,
जिनका दुष्प्रभाव आज विभिन्न रूप में हमसब को झेलना पड़ रहा है|
क्या ये सारे लक्षण इस बात को इंगित नहीं करते कि मानव अपने पतन की ओर उन्मुख हो चला है!

”आदिमानव की ”भूख” उसकी आवश्यकता ने नए अविष्कारो  नयी संस्था को जन्म देकर उसे विकसित और   सभ्य मानव में परिवर्तित किया  ..
परन्तु आधुनिक मानव की ”हवस” उसकी अनावश्यक महत्वकांक्षा धीरे-धीरे उसे फिर से अविकसित और असभ्य आदिमानव में परिवर्तित कर रही है  !”

शिल्पा भारतीय “अभिव्यक्ति”

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