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चुनावी मानसून के बादल ज्यों ही लगे गरजने!

मन-दर्पण

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चुनावी मानसून के बादल ज्यों ही लगे गरजने
सोये थे कूपों में जो पंचवर्षीय मेंढक
निकल बाहर देखो वो लगे फुदकने
कोई फुदक कर इधर गया
कोई फुदक कर उधर गया
सत्ता के लालच में अंधे
खुद ना जाने इमां इनका किधर  गया
कितनी  बार बदलेंगे ये पार्टी
कुर्सी का मोह इनसे क्या क्या करवाएगा
बेदिलो  का हृदय हाय!
कितनी दफ़े परिवर्तन करवाएगा
इनकी इस रंग बदलने की अदा पर
अब तो गिरगिट भी लगे  शर्माने!
खुद की चलनी में है बहत्तर होल
फिर  भी लेकर अपनी ढपली अपना ढोल
खोलते एक दूजे की पोल
उल्लू अपना सीधा करने को
दिन-रात टर्र-टर्र कर लगे टर्राने!
ज्यो-ज्यो चरण गुजर रहे
ये भी अपनी अपनी हदों से गुजर रहे
लोकत्रंत की मर्यादा को करते तार-तार
कर रहे एक-दूजे पर विष की बौछार
करता अचरज विषधर भी
बैठा दुबक कर  कुंडली मार
इस कदर मुख से ज़हर ये लगे उगलने!
चुनावी समर का बिगुल जब बजा था
विकास है हमारा मुद्दा ये हर नेता ने कहा था
पर  जैसे जैसे देखो वक्त लगा गुजरने
एजेंडा इनका लगा बदलने

छोड़ विकास के मुद्दे

धर्म-जात-पात के नाम पर

देखो अब ये लगे चलने!

जब तक चुनाव का दौर जारी है
हर प्रत्याशी की दावेदारी है
अपनी-अपनी जीत के खातिर
अपना रहे सब साम-दाम
कही बँट रही साडियां
कही छलक रहे जाम
नोटों के बंडल भी खुलकर लगे बरसने!
चुनाव-चुनाव नहीं बन गया एक तमाशा है
पशोपेश में हर मतदाता है
जिसको दे वो अपना वोट
अंधो में वो कनवा राजा है कौन

प्रश्न ये दिन-रात उसको लगा है छलने!

बस अब कुछ पल ही ये दौर है
जब फिजाओं में सुनाई दे रहा इनका शोर है
ज्यो ही परिणाम निकल आयेंगे
चुनावी मानसून के बादल छंट जायेंगे
जीते हारे सारे मेंढक एक-एक कर
फिर से कूपों में गुम हो जायेंगे  जायेंगे
और व्याकुल ये नैन हमारे
इनके दर्शन को फिर से लगेंगे तरसने!

शिल्पा भारतीय “अभिव्यक्ति”

(१२/०४/१४)

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