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शिक्षा ब्यवस्था को लेकर असंतोष का माहौल

Education in the hand of a Businessman

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देश भर में शिक्षा ब्यवस्था को लेकर असंतोष का माहौल है और शिक्षा ब्यवस्था के सुधारों के लिए उठाये जाने वाले कदमों में केंद्र व राज्य सरकारों की रुचि उदास करने वाली है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है की किसी भी देश की ताकत उसकी शिक्षित जनता ही होती है, अगर देश का हर ब्यक्ति उचित शिक्षा पा सके तो कदाचित ही इस देश की बाकि सारी समस्याओं का अंत हो जाए। जहाँ तक मै समझता हूँ इस देश की सबसे बड़ी समस्या है उचित नेतृत्व का चयन न हो पाना।
अब क्योंकि देश का एक बड़ा हिस्सा अशिक्षित है इसलिए वो बस कही सुनी बातों पर नेतृत्व चुनने को मजबूर रहता है और फिर अपनी गलती पर पछताने को। देश में चारो तरफ अशिक्षा फैली है और इसी वजह से देश के लोगों में निर्णय लेने की क्षमता में कमि है तथा अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ बोलने की ताकत नहीं है।
ऐसा नहीं है की इस देश के लोगो में शिक्षित होने की क्षमता नहीं है, पर सरकारें और उनके द्वारा इलिये गए गलत फैसले उन्हें बाध्य कर देती है अशिक्षित रहने को। अधिकतर शिक्षण संसथान ब्यक्तिगत हाथों में है, जो की धनलोलुप ब्यवसायी हैं, जिन्हें शिक्षण संसथान शिक्षा देने का माध्यम न लगकर मुनाफा कमाने का कोई बाजार लगती हैं।
ब्यापारियों ने तो साफ़ कर दिया है की जहाँ मुनाफा नहीं वहां ब्यापार नहीं, और अब यहाँ से मुनाफा निकालने के लिए उन्होनो ने हर तरह का हथकंडा अपनाना शुरु कर दिया है, जिनमे अध्यापकों पे किया जाने वाला अत्याचार सबसे गंभीर है, ये ब्यवसायी अध्यापकों को माँ सरस्वती का आशीर्वाद मानने के बजाये अपने ब्यवसाय का दैनिक मजदूर मानते है।
जहाँ एक तरफ ये देश विश्वगुरु बनने का सपना देख रहा है वहीँ दूसरी तरफ इस देश के गुरुओं की दशा, सरकारी विद्यालयों की दशा मुह चिढा रही है। सरकारी शिक्षा ब्यवस्था की नाकामी का ही परिणाम है की ब्यक्तिगत शिक्षण संस्थान कुकरमुत्तों की तरह उग आयें हैं। आज इस देश में जितने सरकारी संस्थान शिक्षा दे रहे हैं लगभग उससे दस गुना ब्यक्तिगत संस्थान शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं।
अब चूँकि सरकारी संस्थानों में शिक्षा का स्तर शून्य है तो मजबूरीवश इस देश के नागरिकों को ब्यक्तिगत शिक्षण संस्थानों की ओर ताकना पड़ता है। इसी मजबूरी का फायदा उठा कर ब्यक्तिगत शिक्षण संस्थान आजीवन इस देश के नागरिकों का शोषण कर रहे हैं और इस देश के गरीबों की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई लूटने का कारोबार कर रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है की आज इन ब्यक्तिगत संस्थानों ने कॉपी-किताबों से लेकर चड्डी-बनियनों तक की बिक्री पर अपना अधिकार जमा रखा है।
इस सब परिणामो की दोषी हमारी सरकारें बड़ी ही चालाकी से ये सब देखती रहती हैं और अपना हिस्सा पाति रहती हैं, उन्हें शायद नजर नहीं आता की किस तरह से इस ब्यवस्था ने शिक्षकों के लाचार कर रखा है। अब की अगर शिक्षक लाचारी और मजबूरी में पढ़ाएगा तो उसके द्वारा सिंचित शिष्य किस प्रकार स्वावलंबी हो पाएंगे?
यह सारी ब्यवस्था इस देश को गर्त में ले जाने का कार्य करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती है। सरकारों को अब पैसे बचने और जिम्मेदारियों से भागने के बजाय यह सुनिश्चित करना चाहिए की इस देश में अच्छी शिक्षा हर नागरिक को सुलभ हो। जितना पैसा आप शिक्षकों को मानदेय न देकर बचा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा आप तब बर्बाद कर देते हैं जब अशिक्षित और ठुकराए हुए लोग हथियार उठा लेते हैं।
अगर यह देश आज टूटने की कगार पर खड़ा है तो इसका सबसे बड़ा कारन इस देश की भ्रस्ट शिक्षा ब्यवस्था है। सरकारों की अनदेखी ने लोगो को भिखारी बनने पर मजबूर कर दिया है। आज भारत अपनी पुरातन संस्कृति को भी खो चूका है। अब भारतीयों में न तो वसुधैव कुटुम्बकम बचा है न ही अतिथि देवो भवः और न ही सर्वे भद्राणि पश्यन्तु का ही लेश मात्र बचा रह गया है।
हम एक परिवार से अकेलेपन की राह पर चल पड़े हैं। सिर्फ शहरी क्षेत्र ही नहीं बल्कि दूर गांव के क्षेत्र भी पूरी तरह से अपनी पहचान खो रहे है। ऐसे में हम न तो अपनी भूमि बचा पाएंगे न ही अपनी संस्कृति। अगर हम इस मानसिक गुलामी से अपने आप को न बचा पाएं तो सब कुछ ख़तम हो जायेगा, और इस मानसिक गुलामी को तोड़ने का एक ही तरीका है की देश की शिक्षा ब्यवस्था को पुनः गुरुओं के हाथ में सौंप दिया जाये, जो की इसे मजबूत भी करेंगे और स्वावलंबी भी।

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