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पिता जी…

! अब लिखो बिना डरे !

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कार एक्सीडेंट में परलोक सिधारे दिवंगत पिता की तस्वीर के समक्ष पुष्प समर्पित करते हुए अचानक समर का दिल भर आया और आंखें नम हो गयी। समर ने कल्पना भी नहीं की थी कि इस तरह अचानक पिता का साया उसके सिर पर से उठ जायेगा। अभी कुछ दिन पहले ही तो पार्टी ऑफिस में यहां जश्न का माहौल था। पिताजी तीसरी बार लगातार विधायक चुने गए थे। चारों ओर ढोल-नगाड़े बजाये जा रहे थे और आज कैसा मातम पसरा है।

ऐसा लगता है जैसे किसी ने धड़ के ऊपर से सिर काट दिया हो और भ्रमित सा धड़ इधर-उधर भाग रहा हो… कहाँ जायें… किधर जायें ? जी चाहता है कि अभी कहीं से उसके कानों में पिता जी की वो गरजती हुई आवाज़ आकर टकरा जाये, समर… समर बेटा… कहां हो तुम ? तुम्हारे पास तो अपने पिता के लिए दो मिनट भी नहीं। सारे उलाहने, सारा दुलार लिए पिता जी तो हाथ छुड़ाकर हमेशा-हमेशा के लिए परमतत्व में विलीन हो गए और समर शोक में डूबी मां का एकमात्र सहारा। ज्येष्ठ की तेज धूप में झुलसते हुए एक कोमल वृक्ष की भांति रह गया बिलकुल अकेला।

समर इस दुःख की सुनामी को ह्रदय में समा लेने का भरसक प्रयास कर रहा था पर छब्बीस वर्षीय युवक का ह्रदय इतना भी मजबूत न था कि दुःख की कठोर चोटों को बिना आह भरे सह जाये। पार्टी-ऑफिस में श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सभी पदाधिकारियों ने दिवंगत आत्मा की शांति व पार्टी की ओर से विधायक पद के लिए समर को ही उम्मीदवार बनाये जाने की इच्छा व्यक्त की पर समर असमंजस में था। एक ओर पिता जी द्वारा रोपे गए आदर्शों के पनप आये बीज और दूसरी ओर पद-प्रतिष्ठा के लुभाते झाड़फानूस। उसने न इनकार किया और न ही हामी भरी।

कोठी पर पहुंचते ही समर के दोनों चाचाओं ने उसे घेर लिया और समझाते हुए बोले- बेटा भाई साब के एकमात्र वारिस तुम्ही हो। अब उनकी विरासत को संभालना ही तुम्हारा कर्तव्य है और ये जो सहानुभूति है ना, ये ज्यादा दिन नहीं टिकती। भाईसाब के खास आदमी ने खबर दी है कि इस सीट से पार्टी का टिकट लेने के लिए पार्टी मुख्यालय पर भाईसाब के विरोधी एक करोड़ रूपये लेकर पहुंच गए थे पर बात नहीं बनी उनकी… ज्यादा सोचो मत हम हैं ना साथ में।

समर ने विनम्रता से जवाब देते हुए कहा- आप की बात सही है, पिता जी की विरासत संभालना मेरा काम है पर राजनीतिक विरासत का वारिस मैं कहां ? मैं उनके जीवन-काल में चौदह वर्ष की आयु में ही फॉरेन चला गया था, पढ़ने। आप जानते ही हैं और अब एक वर्ष पहले ही लौटा भी तो आईटी कम्पनी का सीईओ बनकर। मैं कब घर-घर गया उनके साथ क्षेत्र की जनता की तकलीफें सुनने, दूर करने, उनके हक़ में भूखे पेट रहकर मांगें मनवाने ? बताइये चाचा जी… राजनीतिक विरासत का हक़ मुझे नहीं, बल्कि पार्टी के हर उस कार्यकर्ता का है, जिसने पिता जी को तीन-तीन बार लगातार विधायक बनवाने में खून-पसीना एक किया। यहां वंशवाद नहीं, कर्मवाद की आवश्यकता है। पिता जी अक्सर कहते थे तुम तो बस नाम के बेटे हो। मेरे असली बेटे तो मेरे कार्यकर्ता हैं, जो दिन-रात लगे रहते हैं मेरे साथ क्षेत्र की विकास कार्यों में और आज ये नाम का बेटा उनके असली बेटों से उनका हक़ छीन ले… ऐसा कभी नहीं होगा चाचा जी। कब तक नेताओं के भाई, बेटे,पत्नी, बेटियां और बहुएं सच्चे कार्यकर्ताओं को पीछे धकेलकर उनके जीवन भर की पूंजी यूं लूटते रहेंगे। चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए नेताओं के ऐसे सम्बन्धियों को। लोकतंत्र का ऐसा बलात्कार, घिन आती है मुझे, ऐसी सोच, ऐसी व्यवस्था से।

ये कहकर समर चाचाओं के चक्रव्यूह को तोड़कर अपने कमरे की ओर बढ़ लिया और चाचा इस सोच में पड़ गए कि कैसे समर को तैयार किया जाये चुनाव लड़ने के लिए। आखिर इसमें उनका हित भी तो प्रभावित हो रहा है। तीन दिन बाद पार्टी मुख्यालय पर रखी गयी मीटिंग में भी समर ने ये ही विचार व्यक्त किये और सर्वसम्मति से पार्टी के लिए दिन-रात एक करने वाले जुझारू कार्यकर्ता को टिकट दिलवाकर उसने राजनीति की स्याही किताब में एक उजला पृष्ठ जोड़ ही दिया। चाचाओं की नाराजगी दूर न कर पाने का उसे दुःख रहा पर जब मां ने उसके सिर पर हाथ रखकर ये कहा कि तूने आज अपने पिता जी के आदर्शों के अनुरूप ही ये फैसला लिया है। तब उसकी आंखें भर आईं और वो मां से लिपटकर बहुत देर तक रोता रहा।

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