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मैं पांचाली

saanjh aai

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तुम पांचों की अपनी अपनी यात्रा थी और मैं तुम्हारी अनुगामिनी –

महाराज युधिष्ठिर !

आप चले पश्चताप की यात्रा पर

मैं प्यार की तलाश में तुम्हारे पीछे

तुम्हारे साथ चलने के लिए मैं खूब चली

पर धीरे धीरे दूर होती गई ,तुम कदम दर कदम आगे चलते गए

तुम्हारे कदमो के निशान भी आंखो से ओझल होते गए

मैं अँधेरों से घिरती गई – समझ गई

ये तो स्वार्थ की यात्रा थी |

तुम मोक्ष चाहते थे और मुझे तलाश थी प्रेम की

शकुन्तला मिश्रा

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्‍त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्‍य की पुष्टि नहीं करता है।

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