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विश्व योग दिवस के अर्थ

आर्यधर्म

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तेरह सौ वर्षों से (वृहद) भारत भूमि कुचली गयी है, इन पंद्रह समग्र वर्षों में हमने जो भी पूर्वगामी स्वर्णकाल में अर्जित किया था, लुटा दिया I
हमने अपनी सभ्यता-संस्कृति, ऐश्वर्य-राज्य, मानव जन एवं सबसे बढ़कर ज्ञान सम्पदा सब कुछ गँवा दिया है ! हमने तब से मात्र पराधीनता ही की है, हमने ऐसा कुछ नहीं किया जो हम कह सकें की हमने वास्तव में खुद विश्व को दिया I आलू चिप्स से लेकर दवाइयाँ सब तो हम भीख में पाते हैं, दुनिया में जितनी वस्तुएं प्रयुक्त हो रही हैं, वो किसी भारतीय ने नहीं खोजीं, हम बस भिखारियों की तरह दूसरों का गिराया खाते रहे I अधिक से अधिक हमने उसे मूल्य देकर खरीद लिया- अन्न हो या लड़ाकू विमान ! भारत शर्म की पहचान बन चूका है !
पर, अब एक दिवस है तमाम विदेशी सम्बद्धता दिवसों के बीच -अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो भारत का ही सृजन है !! अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस !

योग

पर, योग क्या हम भारतीयों को योग के रूप में कभी पसंद रहा ? नहीं तो, भारतियों ने योग को तब तक नहीं चाहा जब तक योग “योगा” होकर विदेशियों द्वारा स्पर्शित हो पुण्य बन भारत में वापस नहीं परोसा गया ! हमने कभी भी योग को इसलिए नहीं अपनाया की यह हमारा अपना है, हमारे लिए है ! हमने तो इसकी तरफ तब देखना शुरू किया जब बीटल्स ने इसमें रूचि दिखाई, जब मैडोना, रिचर्ड गियर इत्यादि ने इसे अपनाया, भारत के अंदर भी हमें ये शिल्पा शेट्टी की देहयष्टि के साथ ही ग्राह्य लगा और उस देहयष्टि से उतरकर यह उतना भी नहीं रहा !
आज योग को लगभग १९० देश स्वीकार कर अपनाने ही नहीं उसका सम्मान करने की राह पर चलने की संस्तुति कर चुके हैं ! पर, किसी देश ने योग को इसलिए नहीं अपनाया की यह भारत देश का है, या यह हिन्दू ऋषियों और पंडितों द्वारा प्रदत्त है, या इसलिए नहीं कि ये ५००० एवं २००० वर्षों में परिवर्धित भारतीय विधा है …..योग विश्व में इसलिए अपनाया गया है क्योंकि यह वैज्ञानिक चिकित्सीय प्रतिमानों पर खरा एवं स्वास्थ्य प्रवर्धन में सहायक सिद्ध हुआ है ! योग, और योगा नहीं भारत द्वारा पददलित करने, अपनों द्वारा ही उपेक्षित, विदेशियों द्वारा विकृत किय जाने के बाद भी आज वैश्विक पटल पर अगर सम्मानीय है वो इसलिए क्योंकि इसे वैज्ञानिक आधार पर मानव स्वस्थ्य के लिए सहायक पाया गया! किसी गोरी चमड़ी, किसी नारी देह या फ़िल्मी कलाकार के इसके जुड़ाव से इसका भविष्य नहीं सुधरा है !
सच है, हम भारतीय तो मात्र विदेशी चमक दमक के अभिलाषी, स्वयं से घृणा करने वाले, हर विदेशी वस्तु की प्रशंसा करने वाले बस कुछ पा लेना ही चाहते हैं ..हम फुटबॉल विश्व देखकर फुटबॉल खेलना चाहते हैं, हम अमेरिका ब्रिटेन को देखकर अंग्रेजी बोलना चाहते हैं…………. हम उनसे हर चीज पा जाना चाहते हैं, हम मात्र दूसरो से पाना ही चाहते हैं …. हम देश भी से बस चाहते ही हैं, उसे कुछ देना नहीं चाहते ! “उत्सवधर्मी” यानी अपनी ही वासना में चूर हम कुछ और करने कि स्थिति में कभी नहीं थे !
योग के कारण आज भारतीयों को कम से कम विश्व एक दिन तो याद करेगा; पर ऐसे योग को करने से क्या फायदा होगा जो इस महान वैज्ञानिक विधा को, जो ना ही स्वास्थ्य बल्कि आत्मिक शोधन एवं धर्म-संस्कार के लिए प्रयुक्त भारतीय महान आत्मा- ऋषि और आचार्यों द्वारा दिया गया, हम मात्र आलंकारिक एवं लोकप्रियता के साधन के रूप में प्रयोग करें और इसकी आत्मा को भी क्षतग्रस्त कर दें !!??
योग कभी भी सामान्य जन के लिए नहीं था, विदेशीयों के लिए तो कत्तई नहीं, विधर्मी म्लेच्छों के लिए तो कत्तई नहीं, इसके लिए भी एक न्यूनतम अर्हता एवं पात्रता चाहिए थी, हम भाग्यशाली हैं कि आज यह सामान्यजन के लिए भी उपलब्ध है ! हाँ, इसमें उन राष्ट्रीय जनांदोलनों के सेनानियों यथा बाबा रामदेव इत्यादि का एक महत्वपूर्ण हाथ है पर विश्व में योग के स्थापित होने का एकमात्र कारण उसकी चिकित्सीय एवं स्वास्थ्यपरक उपादेयता ही है !
अब, आज देखते हैं कि भारत में इसका क्या स्थान है ! भारत में आज भी योग उन लोगों द्वारा प्रचलित है जिन्हे इसका लिखित साहित्य कहीं से मिल गया है, या जिन्हे पारिवारिक परम्परा या सामग्री के रूप में यह प्राप्त हुआ है, या फिर कुछ ऐसे लोग हैं जो इससे अपना जीवनयापन कर रहे हैं ! कुछ बातें यहाँ सामने रखना मैं आवश्यक समझता हूँ भारतीय जनता के लिए भी और भारतीय सरकार के लिए भी !
योग भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के कई चिकित्सीय विधियों में एक तंत्र क्रियात्मक पद्धति (NeuroPhysological Therapy) है, पतंजलि आदि महर्षियों द्वारा पूर्णित यह ज्ञानविधा अत्यधिक विशिष्ट वैज्ञानिक अविष्कार है, हम आज भी इसके सम्पूर्ण महत्त्व को नहीं जानते और हीरे को कंचे की तरह बेच रहे हैं !! आज जितने भी लोग योग नाम की किसी भी चीज से जुड़ें हैं वो सभी अवैज्ञानिक लोग हैं मैं इसमें भगवाधारी किसी भी फक्कड़ साधु इत्यादि, किसी मठ-आश्रम में किसी साधक योगी जो कोई धार्मिक कर्म कर रहे हैं से लेकर तमाम आयुर्वेदिक चिकित्सक को भी शामिल करता हूँ जिनके लिए यह अधिक से अधिक एक साहित्य ही मात्र है … ध्यान देने योग्य बात ये है कि विज्ञानं को लिखा तो साहित्य के रूप में ही जाता है, पर वो तब तक वापिस वैज्ञानिक रूप में स्वीकार्य नहीं किया जा सकता जब तक उसे प्रयोग करने वाला स्वयं वैज्ञानिक ना हो ! आज आयुर्वेद-काफी हद तक, और योग-ध्यान इत्यादि अलंकारिक साहित्य के रूप में ही जनता के सामने है ! अधिकांश लोग, मात्र लिखी हुई बातों को दोहराते रहते हैं उसके सार को समझाने छोड़िये, समझने की योग्यता भी नहीं रखते, फिर भी ऐसे तमाम लोग इसे कर रहे हैं, क्योंकि ना हम भारतीयों को वैज्ञानिकता में कोई रूचि है, ना हमें इसका ज्ञान और ना इसकी कोई परवाह ! पर, चन्दन की लकड़ी से गुल्ली डंडा खेलने का क्या लाभ ? पर, हम वही कर रहे हैं !
आज ऐसे सभी योग से सम्बंधित लोगों तक वैज्ञानिकता नहीं पहुंची है और अधिकतर आधुनिक चिकित्सक (Alloptahic Physicians) इसे हेय ही मानते हैं क्योंकि वास्तव में वो भी इसके सत्व, इसके प्रभाव को पूरा नहीं जानते !! योग-ध्यान इत्यादि आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं में LIFESTYLE CLINIC या APPLIED PHYSIOLOGY के रूप में विकसित हो रहा है जिसके विशेषज्ञ Medical Physiology से सम्बन्ध रखते हैं साथ में अन्य कुछ चिकित्सा विषय भी इसमें योगदान देते हैं! वैसे आज भी यह बहुत ही सिमित संस्थानों में ही है – जैसे आयुर्वज्ञान संस्थान, दिल्ली, मो. दे. रा. योग संस्थान, आयुर्विज्ञान संस्थान वाराणसी इत्यादि ! ये भी एक तथ्य है कि इस विषय में अभी भी कोई स्पष्ट दिशा निर्धारण नहीं है, और हस्पतालों में इसके लिए व्यवस्था या सोच नहीं है और सबसे बढ़कर हमारी ही इस विद्या के लिए आधुनिक चिकित्सालयों में विशिष्ट शोध एवं प्रवर्धन की कोई व्यवस्था नहीं है !
योग-ध्यान-आयुर्वेद का कल्याण एवं विकास किसी फ़िल्मी कलाकारा कि देहयष्टि से या विदेशी जुड़ाव से स्थापित नहीं होगा, इस और सम्बंधित क्षेत्र में बेहद गंभीर शोध तंत्र स्थापित करने से ही हम इस क्षेत्र का वो विकास कर पाएंगे इसकी बाट समूचा विश्व जोह रहा है…….!! वास्तव में, किसी शिल्पा शेट्टी इत्यादि से जुड़कर इसकी गंभीरता एवं गुणवत्ता अपमानित एवं दूषित ही होती है !
दूसरी सबसे बड़ी बात, योग जैसा श्रष्ठ उपहार किसी विधर्मी, किसी ऐसे विदेशी सोचवाले के लिए नहीं है जो इस विद्या को अपनाने वाले, या इस विद्या को बनाने वाले या फिर समूचे भारतीयता से ही घृणा करता हो, किसी मुस्लिम के योग करने ना करने से योग की महत्ता और ना इसकी स्वीकार्यता पर कोई प्रभाव पड़ेगा, वास्तव में जिसे इसपर विश्वास न हो उसे इसे करना ही नहीं चाहिए I और न किसी को इसके लिए जोर देना चाहिए !
आज जिस तरह से मुस्लिमों की इसके लिए चिरौरी की जा रही है और जिस तरह से तमाम इस्लामी अपनी धर्म के प्रति मूर्खता, विज्ञानं से अनभज्ञता एवं अपने ही जन्मस्थान भारत देश के प्रति घृणा दिखा रहे हैं उससे यह बात पुनः स्थापित होती है की वो इस उपहार के लायक ही नहीं हैं !
फिर भी, मैं इस विधा में २३ वर्षों से रहने के बाद उन्हें एक मौका देने को तैयार हूँ …. और इसीलिए मैं अगला उत्तर उन्हीके लिए रखता हूँ …
योग मन-बुद्धि-शरीर-आत्मा के मेल के लिए है, जिससे स्वास्थ्य मिलता है, उससे ही भक्ति होगी और ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है ..उसीसे मन से वासना का मैल भी निकलेगा उसीसे रोग भी दूर होगा, और, इसीलिए उसीसे आत्मिक उन्नति होगी !
सबसे पहली बात, भारतियों मुसलमानो को अपने रवैय्ये में परिवर्तन लाना चाहिए ..उन्हें इस देश से घृणा करने का कोई औचित्य नहीं है ये उनकी ही जन्मभूमि एवं पूर्वज भूमि है .. उनका पूर्व क्या है पहले वो जान लें ! इस्लाम वास्तव में इसी भारत भूमि का विरोध स्वरूप उत्पाद है ! * (जिसके बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे)
सूर्य नमस्कार एवं प्रणव स्वर ओम तो योग क्रिया पद्धति के केंद्रीय आधार एवं उपकरण हैं इससे घृणा करने वाला बहुत अच्छा हो इस विधा से दूर रहे! मुस्लिमों के इस तर्क की कि उन्हें खुदा या अल्लाह के सिवा किसी और कि इबादत नहीं करने की शिक्षा है तो मैं कहता हूँ कि हर सम्मान पूजा या आराधना ही नहीं होती, हम बड़ों का सम्मान करते हैं, हम अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, हम अपने से श्रेष्ठ लोगों का ज्ञानी विद्वानों का सम्मान करते हैं, हम पैगम्बरों(महापुरुषों) का भी सम्मान करते हैं I क्या एक मुसलमान दुसरे बन्दे को सलाम नहीं कहता, क्या उसे पता है इसका क्या मतलब होता है ? अगर वो एक मनुष्य के सामने झुक कर अपना सम्मान प्रदर्शित करके सलाम कर सकता है तो क्या वो अल्लाह से बेअदबी नहीं कर रहा ? वास्तव में, जिसे वो अल्लाह कहता है वो यही सूर्य ही है… अल्लाह शब्द अरबी “अल-लत” या “अल्लात” से आया है, जो मूलतः संस्कृत शब्द है और जिसे “शिव”के लिए ही प्रयुक्त किया गया है (प्राचीन आर्य इतिहास), शिव के एक रूप विष्णु हैं, विष्णु वास्तव में सूर्य के ही एक रूप हैं इसे “आर्य राजाओं” ने समस्त विश्व में स्थापित किया था जिसमे अरब और यूरोप भी सम्मिलित थे और मोहम्मद साहब के चाचा अबु बक्र उन्ही शिव और इसीलिये विष्णु (यानी अल्लाह) के मंदिर काबा मंदिर के पुजारी थे ! सूर्य तो प्रत्यक्ष देव हैं, उसी महान पिता ईश्वर का एक अंश ! और हमारा पिता !
योग वास्तव में मात्र कोई व्यायाम ही नहीं है यह उससे बढ़कर है ! और, वास्तव में नमाज़ यानी “नमः अज्ञ” ईश्वर के सामने झुकना ही है और यह ईश्वर कौन है ? वही ईश्वर जिसे आप मुस्लिम “रमजान/रमादान” या “शबे बरात”में याद करते हो — यानि “रामध्यान” के दिन श्रीराम को और “शिव-व्रत” के दिन शिव को ……………
और सूर्य तो सबको रौशनी देता है जीवन देता है, समस्त अस्तित्व देता है चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम, क्या कभी वो किसी मुस्लिम को अपनी धूप देने के लिए मना करता है ? सोच के देखें तो पाएंगे कि हर मनुष्य -हिन्दू, मुस्लिम या अन्य कोई भी, का जीवन मात्र सूर्य पर ही निर्भर है जिस दिन सूर्य चला गया सबकी मौत निश्चित है वही हमारा ईश्वर है, नहीं तो उस परम-ईश्वर का प्रतिनिधि तो अवश्य है तो उसके प्रति कृतज्ञता जताने में क्या हर्ज, मैं तो कहता हूँ सभी को मुस्लिमो को भी, हर रोज़ सूर्य को धन्यवाद कहना चाहिए ! हिन्दुओं के लिए तो इसके लिए बाकायदे विधि विधान निर्धारित हैं ! और जब, इस कृतज्ञता ज्ञापन में स्वास्थ्य लाभ भी हो जाये तो क्या बुरा ?
और फिर, अगर आप किसी कृत्य से आपके पडोसी भाइयों, आपके देशवासियों को अच्छा लगे तो उसे ऐसे ही कर लेने के क्या बुराई ? क्यों मुस्लिम योग का विरोध करने और देशद्रोही कोंग्रेसी (एवं उनकी गद्दार जमात) हर उस बात का विरोध करते दीखते हैं जो भारत एवं हिन्दुओं की मौलिक पहचानों से जुड़ा हुआ है ?! जिस योग को तमाम इस्लामी देश से लेकर ख्रिस्ती आदि देशों ने भी अपना लिया आपके इमाम मूर्खता में क्यों जी रहे हैं और आपको भी जहालत करने पर विवश कर रहे हैं!
मैं, भारत सरकार से फिर से प्रार्थना करना चाहता हूँ कि योग कि उत्कृष्टता को नष्ट करके और विधर्मियों का साथ लेकर हमने यदि किसी खिचड़ी वस्तु को विश्व के सामने रखा तो कल हमारी ही जगहंसाई होगी ! अगर कुछ लोग योग करने को तैयार नहीं हैं तो उनसे वैचारिक विमर्श किया जाना चाहिए जिसके लिए विशेषज्ञ, जीवन शैली चिकित्सक इत्यादि भी हैं हर काम मात्र नेता और अभिनेताओं से ही नहीं होगा, ना ऐसी कोशिश की जानी चाहिए ! अगर पूरा देश और विश्व साथ आ जाये तो क्या कहने पर, ना भी आये तो क्या होगा ..हम ही योग करते रहेंगे क्योंकि आधार अधूरा जैसा भी विदेशी तो इसे कर ही रहे हैं, ये फिर भी श्रेष्ठ है ! लोकप्रियता के लिए योग या हमारी किसी भी ज्ञान-विधा का अपमान एवं क्षय नहीं होना चाहिए ! ज्ञान-विद्या के प्रति हमारी क्या सोच क्या रही है ये पुरानी सरकार ने खूब दिखाया है, और इस सरकार में शुद्राओं को शिक्षा विभाग देकर भी साबित किया गया है.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी, समस्त भाजपा सरकार इस महान उपलब्धि के लिए प्रशंसा के योग्य है जिन्होंने वैश्विक पटल पर भारत कि सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक पहचान सशक्त रूप में रखी है, पर मैं समझता हूँ किसी ऐरे गैरे फ़िल्मी नटों, छिछोरे, खोखले कलाकारों से इस विद्या को दूर रखें, प्रधानमंत्री महोदय स्वयं ही इसके सुयोग्य ब्रांड एम्बेसेडर बनने की पात्रता रखते हैं ! आशा है कि सभी भारतीय एवं विश्व के योग प्रेमी (योगा YOGA नहीं) इसका लाभ उठावेंगे एवं यह भी आशा है की सरकार एवं हम सभी भारतीय भी मिलकर योग को सबसे पुष्ट वैज्ञानिक रूप में एक व्यवस्थित तंत्र के रूप में अपने देश में स्थापित कर पाएंगे !
कभी काशी यानी वाराणसी ने ही आयुर्वेद की दुंदुभी समूचे विश्व में बजायी थी, आज भी उसका मूल इसी काशी में ही शेष है, किंचित काशी यह प्रकाश पुनः प्रज्जल्वित करेगी ऐसी हमें आशा रखनी चाहिए .
सभी भारतीय भाइयो बहनो को कल यानी २१ जून पर विश्व योग दिवस की शुभकामनायें …………………….
डा शैलेश
काशी

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