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कहाँ है आनंदवन का आनंद … काशी का कल्याण कैसे हो ?

आर्यधर्म

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आज काशी यानी वाराणसी राजनैतिक आकर्षण का केंद्र बन गया है पर अभी तक किसी मीडिया किसी राजनीतिज्ञ या किसी भारतीय का भी ध्यान इस महानतम नगरी पर नहीं गया था .. क्यों इतना आकर्षणकारी महत्वपूर्ण है यह आनंदवन जो इसके ३६ प्राचीन नामों में से एक है, और क्यों आवश्यक है इसका उद्धार ?
(मैं ६ वर्ष पूर्व लिखा एक खंड अपने पाठक मित्रों से साझा कर रहा हूँ जो मैंने स्थानीय पत्र दैनिक जागरण को प्रेषित किया था ! आज इस महान नगर के उद्धार के लिए हर भारतीय के नैतिक समर्थन की आवश्यकता है और आवश्यकता है हर आर्य के समर्थन की भी यानि अखंड भारत के भी यानि बाली\ यव द्वीप से लेकर काबा एवं वेटिकन तक एवं विश्व के हर भारतीय की ! )

अजब शहरे बनारस

अजब है यह शहर बनारस I हजारों साल पहले बसा ये शहर जिसे सभ्यता का पालना कहा जा सकता है, आज भी हज़ार साल पुराने ढर्रे पर अटका हुआ है. विश्व भर में बनारस का जो भी अतिशयोक्तिपूर्ण अतिआडम्बरपूर्ण चित्रण हो, यहाँ आने जाने वाले पर्यटकों को बस दीखता है भारतीय हिन्दू संस्कृति का सडा गला स्वरुप. काशी को विश्व के केंद्र में प्रचारित करने वालों ने इसे गन्दगी और अव्यवस्था की राजधानी बना दिया है. यह बनारस का दुर्भाग्य है जिसमे ऐसे स्वार्थी और मूढ निवासी बसते हैं. कभी पांच हजार से भी कम लोगों के लिए बसा यह शहर चंहु ओर जरूरतमंद, पिपासु और मौका परस्त ३५ लाख से अधिक शहरियों के बोझ तले घुट रहा है. पर किसी भी गली, किसी भी पटरा सड़क, किसी भी घाट पर एक भी इन्सान नहीं जिसे एक अदद शहर कैसा होता है इसका ज्ञान हो या इस शहर की घटिया व्यवस्था से किसीका चिंदी भर भी सरोकार हो. हर बाशिंदा इस शहर की ईंट ईंट को चूस लेना चाहता है, चाहे वो हर घाट पे पूजा आरती करने कराने वाले शहरी व पंडा हो, हर नुक्कड़ पर मंदिर उगा कर नोट बनाने वाले माफिया हों, गंगा के किनारे हर गज अपनी परिसंपत्ति समझने वाले मल्लाह, सन्यासी या अन्य हों, इस शहर की संकरी सडको पर ठेला, फेरी या दुकान लगाने वाले दुकान दर हों, हर मौके पर वसूली करने वाले पुलिसवाले या फिर पुरे शहर को चिडियाघर बना देने वाले मवेशियों व अन्य पशुओं के मालिक हों या फिर सामान्य अन्यमस्क जनता I हर इन्सान इस शहर के इंच इंच जमीं पर कब्ज़ा कर लेना चाहता है, अपनी पिपासा अपना स्वार्थ हर युक्ति से साधना चाहता है I इस छोटे कुव्यवस्था से बिलबिलाते शहर के हर कोने में , जायज़ नाजायज़ तरीके से अनधिकृत बेतरतीब कालोनियां मोहल्ले बनाकर बनाकर आसपास के राज्यों से लोग बस रहे हैंI इनमे से कई बड़ी हस्तियाँ हैं जो रंगदारी व अन्य कई अपराधों से इस शहर की पारम्परिक शांति सौहार्द्य पूर्ण फिजा को तनावपूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं I
उत्तर प्रदेश के राजस्व का खजाना भरने में बनारस और आगरा जैसे कुछ चंद शहर ही हैं और इन शहरों को भी व्यवस्था, इन्फ्रास्ट्रक्चर, बिजली, सड़क, समुचित रखरखाव से वंचित कर क्षेत्रीय अधिकारी और लखनऊ में बैठे नेता खुद ऐश कर रहे हैं और केवल राजनितिक मुन्ह-नुचौव्वल में मात्र राजधानी को ही चमका रहे हैं.
शहर के बीसियों चौराहे रोज घंटों रिक्शा और बड़ी गाड़ियों से (जैसे गोदौलिया चौराहा, लंका, बांसफाटक , नीचीबाग इत्यादि) जाम में फंसे रहते हैं फिर भी शहर के भीतरी इलाको में बड़ी गाड़ियों (इंनोवा) साथ ही बेलगाम रिक्शा, ऑटो की संख्या बेहिसाब बढती ही जा रही है. लोगों के घरो की बाल्कनियाँ सड़कों पर पुरे पुरे घर यहाँ तक की घाटों की सीमा तक पहुँच चुके हैंI पतितपविनी गंगा में अभी भी लोग अन्धो की तरह मल मूत्र डाल रहे हैं, हजारों गाय भैंसों की धुलाई करके घाटों को और बदबूदार और बदसूरत बनाने का कुकर्म कर रहे हैंI
पंद्रह फीट की सड़क पर दुकान खोल कर ४-४ फीट सड़क पर लोग व्यवसाय कर रहे हैं और ग्राहकों व उनके वाहनों से पूरी सड़क कब्जिया कर अपनी जागीर जैसे इस्तेमाल कर रहे हैं. हर मंदिर, गली, घाट पर घाट लगाये पण्डे, ठग और बदमाश अन्धो की तरह इस शहर में बारात लगाने वाले पर्यटकों से उगाही कर रहे हैं I और शहर की सेवा में कर्मठ खाकी और ट्राफ्फिक पुलिस जिनके जवान शायद ही कभी दीखते हों, पान की जुगाली करके चौराहों पर हंसी ठठ्ठा या वसूली करने में मशगूल हैं.
मंदिरों में कर्मकांड के नाम पर चढ़ाव और गन्दगी बढ़ रही हैI नगर की एकमात्र देखने लायक खुली जगह घाट पर भी गन्दगी फ़ैलाने, धंधा करने वालो का जमावड़ा है. कुछ लोगों को मैंने देखा है जो इसी नदी में खड़े होकर मछली मार रहे हैं और उसी में निवृत हो रहे हैं पान थूक रहे हैं. गंगा की आरती उतारने वालों के सामने ही कीचड़, नदी में चढ़ाये फूल, मालाओं का सड़ता कूड़ा , राजेंद्र प्रसाद और यहाँ तक की सबसे महान प्राचीन स्मृति स्थल दशाश्वमेध घाट पर एक बड़ा हिस्सा मूत्र विसर्जन क्षेत्र बना हुआ है पर यह महान बनारस वासी देशविदेश से आए पर्यटकों के सामने शर्मसार भी नहीं होतेI पर्यटन पुस्तिकाओं में पढ़ पढ़ कर यह विदेशी यात्री एक बारगी आ तो जाते हैं पर शहर में फैली घोर बदहाली, गन्दगी, स्थानीय निवासियों की बेपरवाही (जिसे वो स्वयं बनारसी मस्ती का नाम देते हैं) और घोर अनाचार देखकर शायद ही यहाँ दोबारा आने की सोच पाते हैं. एक प्राचीन देश भारत, एक पुरातन सांस्कृतिक नगर वाराणसी और पवित्र नदी गंगा को देखने की हसरत लेकर आने वाले विदेशी एक बेहद ही पिछड़े, मलिन, लापरवाह निवासियों और भ्रष्ट अधिकारीयों से पटे हुए नगर की असलियत (अपने कैमरों और) अपने दिल में लेकर वापस चले जाते हैं जहाँ वो दुबारा कभी आना नहीं चाहेंगे. मेरे जैसे लोग जिन्होंने देश विदेश अन्य शहर भी देखें हैं उन्हें यहाँ वापस अपने शहर में आकर शर्म ही आती है.
पर इस शहर का मास्टर प्लान , कानून व्यवस्था, उद्धार, सुन्दरीकरण स्वघोषित छुट्टा नेताओं की इच्छाओं की गिरवी पड़ी है I बनारस की संस्कृति के तथाकथित रखवाले, हर प्रगतिशील उद्धार कार्य में अड़चन पैदा करने वाले इन क्षुद्र स्वार्थ के नेताओं ने वाराणसी को एक निकृष्ट गाँव बना दिया है.
जहा विश्व में लन्दन, परिस, जेनेवा, रोम जैसे नगर हैं जो खुद भी उतने ही प्राचीन हैं, दर्जनों बार उजाड़- बस चुके हैं; हाॅन्कोंग, बैंगकॉक, सिंगापुर जैसे शहर हैं जहाँ दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक शहरों की प्लानिंग और बहु मंजिला इमारतें व फ्लाई ओवर्स खड़ा करने में प्रयुक्त हो रही है, वही भारतीय शहर अभी भी निपट गाँव ही बने ही हैं.
जहाँ यह देश उच्च तकनिकी शिक्षा प्राप्त विश्व स्तरीय इंजीनिअर्स, आर्कीटेक्ट्स, प्लानर्स को पैदा करता है वही बनारस जैसे शहरो के अधिकारी अभी भी मध्ययुगीन दुनिया में जी रहे हैं.
वाराणसी के पास ७०० करोड़(१० वर्ष से) से अधिक धनराशी शहर के पुनरोद्धार व सौन्दर्यीकरण हेतु मौजूद है पर क्षेत्रीय स्तर एवं लखनऊ से राजनीती के चलते वाराणसी के कल्याण पर ग्रहण लगा हुआ है. काशी के नाम पर पर्यटक यहाँ आते हैं, इन पर्यटकों व निवासियों का दोहन दुकानदार, पण्डे, रंगदार व ठग कर रहे हैं, पुलिस वसूली कर रही है और नेताओ की तिजोरिया भरी जा रही हैं, आखिर यह लालची नेता क्यों भला होने दे शहर का?
और इसीलिए धर्म की नगरी काशी जहाँ आकर धर्म-संस्कृति-हिंदुत्व का स्वच्छ पवित्र रूप अतिथिओं के सामने आना चाहिए, जहाँ पर उच्च तकनिकी कलात्मकता सड़कों, गलियों, घाटों इत्यादि के लिए इस्तेमाल होनी चाहियें, जहाँ गंगा की हजारों सालों की मातृत्व का स्वछता व श्रमदान से प्रतिदान देना चाहिए वहां पुरे शहर का घोर शोषण जारी है I आखिर क्यों पूरा शहर जो कभी आनंदवन के नाम से विख्यात हुआ करता था रहने लायक छोडिये घूमने और साँस लेने लायक नहीं रह गया है? क्यों नरमुंड भनभनाते हुए इस शहर का गला घोंट रहे हैं? क्यों ये प्राचीन काशी हर नुक्कड़ पर बन रहे दुकानों, इमारतों और मॉल में गुम हो रहा है? कौन नए बने घाटों पर कल खड़े हुए ‘प्राचीन दुर्गा मंदिर’ या प्राचीन १००८ आश्रम के नाम पर कब्ज़ा करवा रहा है? कौन ‘गाड़ी स्टैंड’ बना कर उगाही तो कर रहा है पर घाटों पर होने वाली दुर्व्यवस्था , अतिक्रमण रुकवा नहीं रहा? कौन एक ५००० साल पुराने घाट पर नए आधुनिक घाट पर शौपिंग मॉल्स खोल रहा है? और कौन शहर को घाट की परिधि में घुसने का कुचक्र रच रहा है ? ये सब साबित करता है कुछ स्वार्थी लोग इस शहर को कुछ देना नहीं बल्कि पूरा पूरा चूस लेना चाहते हैं. हर अव्यवस्था को सुधारने की जगह उसका गलत फायदा उठाना चाहते हैं? क्यों घाटों पर प्रचार बैनर लगाकर होटलों की प्रदर्शनी हो रही है? क्यों घाटों की सफाई, निगरानी व्यवस्था क्षेत्रीय मल्लाहो के भरोसे छोड़ दी गयी है? क्यों नदी किनारों पर ‘जज गेस्ट हाउस’, आश्रम, स्कूल, रेसोर्ट इत्यादि बनाकर कानून का खुला मखौल उड़ाते हुए नदी के तटबंधिया पर्यावर्णीय क्षेत्र को बर्बाद करने की कोशिश की जाती हैI
कभी गंगा ने इस नगर और इस देश की सभ्यता को जन्म दिया होगा, उसे पाला होगाI आज उसी नगर के निवासी इसी माँ रूपी नदी के खून का एक एक कतरा पी लेना चाहते हैं I
आज इस नदी को झुठलाने वाले आरती, पूजा और दीपदान की आवश्यकता नहीं है किसी अतिशय प्रपंची यज्ञ या आडम्बर की जरूरत कत्तई नहीं है, आज जरूरी है यह मनुष्य उसे बस दूर ही रहे I
तेजी से बढ़ रही इस देश की भूखी नंगी आबादी को तो एक दिन यह धरती भी नहीं पाल पायेगी I खुद ही दुर्व्यवस्थ को पैदा करने वाले, इस समस्या के बारे में सर्वथा अनभिज्ञ हैं और बस नियति के भरोसे बैठें हैं या फिर प्रतीक्षा में हैं किसी अवतार के I
आखिर यह कब तक चलने वाला है यह भ्रष्ट्राचार, अनैतिकता और अधर्म का यह नंगा नाच?
क्यों इस देश के तकनिकी संपन्न प्रोफेशनल्स, चाहे वो फौजी हों, इन्जिनिअर्स या शहर नियंता (सिटी प्लानर्स), सबको अपना काम बखूबी करने के लिए किसी नेता की इच्छा का इन्तेजार करना पड़ता है? क्यों किसी छुटभैया नेता को नगर की भलाई के हर काम में नेतागिरी चमकाने का मौका मिल जाता है? क्यों इस देश के कुछ शहर जैसे मुंबई, कलकत्ता, दिल्ली, आगरा, कानपुर या बनारस को नरक बना दिया जाता है और बाकि अन्य शहरों को तिरस्कृत कर दिया दिया जाता है? जहाँ दुनिया में तकनीकी ज्ञान चरम पर पहुँच रहा है वाही हिन्दुस्तानी अभी एक हजार साल पुराणी दुनिया में रहरहे हैं I
अभी भी लाखों हजारों बाढ़- सूखा में बर्बाद हो रहे हैं, हर साल बारिश लोगों की जिंदगियां सबसे बड़े शहरों में रोक देती है, भूकंप -तूफ़ान-दुर्घटनाएं-बीमारियाँ नियमित अन्तराल पर जिंदगियों को लील रही हैं और वहीँ मौकापरस्त भ्रष्ट सरकारें रहत साधन देकर मात्र वाहवाही लूट रही हैं I देश का अथाह पैसा अभी भी नेताओं के पेट में जा रहा है और नीति निर्धारण, नगरीय प्रबंधन और वैज्ञानिक रूपांतरण शून्य हो गया है I
इस देश के लिए औए फिर इस नगर के लिए शर्म की बात है की हजारो मील दूर से आने वाले विदेश अतिथि, जो काशी में बारे में जाने क्या क्या सोच कर आते हैं, वाराणसी रेलवे स्टेशन पर सामना करते हैं मवेशी झुण्ड जैसी भीड़ का जो रस्ते भी नहीं छोड़तेI मूत्रालय, खुले शौचालय से प्रदोषित स्टेशन का प्रांगन, मुख्या सड़क तक पहुचते पहुचते ऑटो, रिक्शा व दलालों के बजबजाते ऐसे झुण्ड से घिर जाते हैं जो सेवा देते कम लूटते हुए अधिक दिखाते हैं I फिर ऑटो रिक्शा वालों का कोलाहल जो लोगो को जानवरों की तरह ठूंस कर चलते हैं और गाहे बगाहे मनमाने पैसे की मांग करते रहते हैं I रोज बेतहाशा नियमित रूप से जाम सड़कें जहाँ एक भी पुलिस वाला नहीं दीखता I घाटों पर सिवाय मलमूत्र के अम्बार, पर्यटकों या क्षेत्रीय नागरिको से रोजी चलने वाले खोमचे, रेहड़ी वाले, पूरी नदी घाट पर बड़ी भद्दी नावों से कब्ज़ा जमाये मल्लाह के कुछ नहीं दीखता, या फिर दीखते हैं गोबर से भरे कई कई घाट जहाँ मवेशी ऐसे बंधे रहते हैं मानो घाट किसी की निजी जायदाद होंई कीचड़ मिटटी, मुत्रस्थान, जो सीधे गंगा जी में गिरते हैं, मलबे मिटटी से भरे घाट पर कब्ज़ा किये जोंको को सुधारने की मानसिकता न तो क्षेत्रीय नागरिकों में दिखती है और न ही अदृश्य अधिकारीयों में जो केवल परदे के पीछे रहकर दमड़ी दोहन कर रहें हैं I
स्वच्छ गंगा के नाम पर खाना पूर्ति करने वाले मठाधीश केवल नदी के तट पर स्थित संसाधनों को निचोड़ कर अपनी जेब भर रहे हैं और अपना बायो डाटा फैला रहे हैं I गंगा नदी में मिलने वाली दक्षिण स्थिति में छोटी नदी अस्सी (पौराणिक नदी असि) को इस निर्लज्ज शहर के मल और कूड़े में दफनाया जा चूका है और गंगा किनारे गन्दी बस्तियों का बसना जारी हैI यह घोर शर्म की बात है की जिस नदी के नाम पर यह शहर है उसी को हमने अपने लालच में दफ़न कर दिया हैI
घाट पर जिनके मकान हैं वो इस प्राचीन नदी के विश्व प्रसिद्द घाट पर शौपिंग मॉल्स खोल रहे हैंI इन मूढो को यह भी नहीं मालूम की जो विदेशी पर्यटक यहाँ आते हैं उनके यहाँ इससे करोडो गुना बेहतर मॉल्स होते हैं I विदेशी सैलानी बनारस में मॉल्स देखने नहीं आता, वो आता है यहाँ की प्राचीनता और पौराणिक स्मृतिस्थलों का अनद लेने के लिए I आखिर कौन हैं वो लोग जो घटो पर धड़ल्ले से दुकाने और होटल बनाने दे रहे हैं? कौन हैं वो लोग जो गंगापार की हजारो सालो से अनछुई सुन्दर तटरेखा पर मकान, मठ और अन्य निर्माण की अनुमति बेच रहे हैं? ऐसे तो जल्दी ही लोग नदी के तट पर और बीच नदी में रहने लग जायेंगेI आखिर क्यों मानव पशुओं जैसा रह रहा है यहाँ? मनुष्य स्वयं ही प्रकृतिजनित प्रलय को न्योता दे रहा है, अपनी आँखों से उसे भविष्य दिखेगा नहीं और ज्ञान चक्षु उसके पास हैं नहीं I जब तक यह दानव प्रत्यक्ष सामने आकार खड़ा होगा तब केवल मौत होगी और होगा केवल हाहाकारी प्रलयI अगर शहर और प्रदेश के पास अपनी समझ नहीं है तो देश विदेशों के विशेषज्ञों की मदद लें; नहीं तो इसी शहर में मौजूद समझदार, जागरूक पढ़े लिखे नागरिकों की राय ले जो इस विषय में सक्रिय हों या होना चाहते होंI अभी भी शहर के चौराहों पर अत्यधिक अफरातफरी रहती हैI इस शहर के लोगों को अभी भी दाये बाये का ज्ञान नहीं हैI लोग जहा चाहे वहा सड़क पर करने लगते हैंI गोल चक्करों पर पूरा टर्न लेकर जाने के बजाय उलटी लेन में आ रही ट्रेफिक से ठीक विपरीत दिशा में घुस जाते हैंI न तो पुलिस को ही इसका ज्ञान है न ही जनता के प्रशिक्षण का कार्य हो रहा है. तेजी से बढ़ रही है इस नगर की जनसँख्या को देखते हुए एक महानगरीय व्यवस्था जल्दी से जल्दी व्यव्हार में लाने की जरूरत है वर्ना यह भी एक ऐसा नरक बन जायेगा जिसका उद्धार कभी भी नहीं हो पायेगा !!
हर बीस फीट से अधिक चौड़ी सड़क पे दो लेन होने चाहियें बीच में पीली (उभारदार) रेखा से उसका विभाजन होना चाहिए, हर चौराहे पर मध्य में गोल प्लेटफॉर्म होना चाहिए, हर सड़क पर यथा संभव फुटपाथ का निर्माण होना चाहिए और पदयात्रियो को सही नागरिक व्यवस्था से चलने का प्रशिक्षण देना चाहिए I किसी भी दुकानदार का सामान,वाहन, ग्राहक यदि फूटपाथ या सड़क पर जगह घेरते हों तो उनसे जुरमाना लिया जाना चाहिए वो भी रोज की दर से I इस जुर्माने के एवज में उन्हें कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए I अपने घर या दुकान के सामने की सड़क को अपनी बपौती समझने वालो के साथ सख्ती से निपटाजाना चाहिएI
प्राचीन नगरी में रहने का मतलब ये नहीं की हम पांच हजार पुरानी व्यवस्था में ही रहें ; गाँव से घिरे होने का मतलब ये नहीं की बनारस के शहरियों को बदहाल, गंवार, शहरी तरीके से रहने को मजबूर होना पड़ेI दिल्ली में जिस गाड़ी का माइलेज ३० या ३५ होता है वही १० किलो मीटर के इस शहर में ५ या ६ कि. \ली. रह जाता हैI उसी सड़क पर तांगा, बैलगाड़ी,ठेला, रिक्शा, ऑटो,कार, बस इत्यादि कभी कभी एक ही साइड या लेन में ; यह एक हाहाकारी ट्राफिक व्यवस्था (तबाही) है I डिवाईडर से सटा हुआ सड़क का भीतरी हिस्सा फास्ट लेन होता है पर यहाँ पर इसी लेन में साइकिल, रिक्शा सभी घुस जाते हैं और तो और कई बार उसी फास्ट लेन में सांड भी निश्चिंत जुगाली करते मिल जाते हैंI
इतनी अधिक कुव्यवस्था प्रदुषण भी बढ़ा रही है, जाम में गाडियों का अध्कच्चा धुआं इस शहर में जहर भर रहा है, यह प्रदुषण शहर कि जिंदगी कम कर रहा है जो पहले ही खंडहर इमारतों से गंजा हुआ है I यह एक नगरीय महाखड्ड है (अर्बन कैनयन)I
आतंकवाद के इस दौर में मार्केट, मंदिर,सडकों पर बेतहाशा जाम लगना भी एक भयावह भविष्य का संकेत हैI
यह इस शहर का सौभाग्य है जो यहाँ हजारो विदेशी पर्यटन पर आते हैं I बहुत जरूरी है कि इस शहर में बढ़ रही भीड़, सड़क किनारे अतिक्रमण, नदी, नाले, रेलवे लाइनों,पुलों के नीचे के अतिक्रमण और गन्दगी, कचरे इत्यादि को कम किया जाये I घाट के पीछे वाली गली और सडको को दुकानों और बेतरतीब वाहनों के झुण्ड से मुक्त किया जाये I गोदौलिया, नयी सड़क व घाट से पीछे लगे अन्य बड़े बाजारों को शहर के इस इलाके से दूर विस्थापित किया जायेI सड़को के बीच नियत निश्चित स्थानों पर ही पार्किंग की व्यवस्था हो और कही भी वाहन खड़ा करने करने वालो से फ़ौरन जुरमाना वसूला जायेI बड़ी गाड़ियों को पुराने पक्के महाल में प्रवेश न दिया जाये I दुकानों की संख्या कम की जाये, सारा का सारा बनारस कोई बाजार नहीं है, शहर को पैदल घूमने लायक बनाया जाये.
लंका क्षेत्र (और ऐसे ही अन्य क्षेत्र) जो ५० से १०० मीटर चौड़े हों, को व्यवस्थित किया जायेI मोड़ों, चौराहों को पूड़ी- जलेबी वालो से मुक्त रखा जाये I ऑटो वालो ने शहर की ही और खासकर लंका की हालतबिगाड़ रखी है जिनको संरक्षण स्थानीय पुलिस ने दे रखा हैI ऑटो के लिए एक नियत जगह पर स्टैंड की व्यवस्था हो ऑटो वालो ने शहर की ही और खासकर लंका की हालत बिगाड़ रखी है जिनको संरक्षण स्थानीय पुलिस ने दे रखा हैI ऑटो के लिए एक नियत जगह पर स्टैंड की व्यवस्था होI BHU के पास ठेलेवालो, सब्जीवालो, रिक्शो और ऑटो वालों का जमावड़ा शीघ्रातिशीघ्र ख़त्म किया जाये I यात्रियों, मरीजो के लिए मुख्य गेट से दूर ऑटो और बस स्टैंड बनाये जाएँ I लंका के फूटपाथ को तुरंत अतिक्रमणों से मुक्त किया जायेI
डा. शैलेश
dr.shaileshg@gmail.com
९५३२८५२२६४

क्रमशः ……………….

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