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होममेकर हूं इसमें गलत क्या है…..

Jagran Sakhi

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house 2गृहिणी, हाउसवाइफ, होममेकर, डोमेस्टिक इंजीनियर, होम मैनेजर या घर की सीईओ..नाम में क्या रखा है! लेकिन जरा सोचिए, नाम में अगर कुछ न होता तो गृहिणी से होम मैनेजर या सीईओ तक ये संबोधन बदलते क्यों रहते! शायद ये बदलाव इसीलिए हैं कि घरेलू कार्यो की कीमत अब लोग समझने लगे हैं। होममेकर्स की जिम्मेदारियों को परिभाषित नहीं किया जा सकता, ये अंतहीन हैं। सुबह आंख खुलने से लेकर नींद से पलकेबोझिल होने तक सिर्फ जिम्मेदारियां। सुबह और शाम काम ही काम..


बाई गई छुट्टी पर

दीदी, मैं हफ्ते भर की छुट्टी पर जा रही हूं, आप मैनेज कर लेना.. काम वाली बाई जब सुबह-सुबह छुट्टी लेने का ऐलान करे और वह भी ठीक किसी त्योहार से पहले तो किसके पसीने नहीं छूटेंगे! वह छुट्टी पर न जाए, इसके लिए उसकी चिरौरी करनी पडती है, ढेरों प्रलोभन दिए जाते हैं और गिफ्ट्स भी।



एक फिल्म थी, अतिथि तुम कब जाओगे। इसके एक दृश्य में परेश रावल काम वाली बाई को झाडू ठीक से लगाने को कहते हैं तो वह झाडू पटक कर यह कहती हुई चली जाती है कि मैं कोई चुहिया हूं जो कोने-कोने में घुस कर सफाई करूंगी?


ऐसे जवाब रोज ही सुनने को मिलते हैं आम गृहिणियों को। महानगरों में अधिकतर स्त्रियां घर से बाहर निकल रही हैं और वहां डोमेस्टिक हेल्पर्स पर ही जिंदगी निर्भर हो गई है। मेड के भरोसे ही घर चलता है। इस दर्द को नौकरीपेशा स्त्रियां अच्छी तरह समझती हैं, जिन्हें अपनी तनख्वाह का एक मोटा हिस्सा मेड, आया, कुक या मेड एजेंसियों पर खर्च करना पडता है, इसके बावजूद संतुष्टि नहीं मिल पाती। एक स्त्री घर से बाहर कदम रखती है तो घर की व्यवस्था संभालना कितना मुश्किल होता है!


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यहां कोई छुट्टी नहीं

जिस तरह करियर में अपना सौ फीसदी देना जरूरी है, उसी तरह घर भी पूर्ण समर्पण और समय की मांग करता है। यह फुल टाइम जॉब है, यहां न संडे की छुट्टी है, न होली-दिवाली की। छुट्टी के दिन तो यहां ओवरटाइम भी करना पडता है। यहां काम के घंटे निश्चित नहीं होते। फिर भी भला हो टेक्नोलॉजी का, जिसने स्त्रियों के लिए घरेलू कार्य कुछ आसान बना दिए हैं।


एक ग्लोबल एन.जी.ओ. हेल्थ ब्रिज द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया कि भारतीय स्त्रियां दिन भर में लगभग 16 घंटे काम करती हैं। इसमें घरेलू कार्यो के अलावा बच्चों को पढाना और कुछ बाहरी कार्य भी शामिल हैं। शहरी स्त्रियों की तुलना में ग्रामीण स्त्रियों को अधिक काम करना पडता है। यदि इन घरेलू कार्यो का मूल्य तय किया जाए तो भारतीय स्त्रियां वर्ष भर में यू.एस. के 612.8 बिलियन डॉलर्स के बराबर काम करती हैं।


कुछ नहीं में छिपा सब कुछ

आपकी पत्नी क्या करती हैं?

जी, कुछ नहीं, घर पर रहती हैं?

इतना पढ-लिखकर चूल्हे-चक्की में क्यों पिस रही हो..?


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घरेलू कार्यो के प्रति इस तरह के हिकारत भरे वाक्य बताते हैं कि ये काम कुछ नहीं की श्रेणी में आते हैं। शायद यही कारण है कि होममेकर्स के लिए मेहनतानेकी मांग समय-समय पर कई संगठन करते रहे हैं। कुछ समय पूर्व केरल में नेशनल हाउसवाइव्स यूनियन ने यह मांग उठाई थी कि हाउसवाइफ को घरेलू कार्यो व बच्चों की परवरिश के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक व सामाजिक सुरक्षा दी जानी चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि यह मांग नई नहीं है। यूक्रेन व वेनेजुएला जैसे देशों में भी ऐसे संगठन हैं।


दिल्ली की जानी-मानी नृत्यांगना और आई.ए.एस. अधिकारी शोभना नारायण बचपन की एक घटना का जिक्र करती हैं। एक बार कक्षा में टीचर ने सभी बच्चों से पूछा कि वे बडे होकर क्या बनना पसंद करेंगे? सभी ने जवाब दिए। तभी एक लडकी ने कहा कि वह हाउसवाइफ बनना पसंद करेगी। पूरी क्लास में ठहाके गूंज उठे। बाद में टीचर ने छात्रों को समझाया कि हाउसवाइफ बनना शर्म या मजाक की बात नहीं है, यह सबसे महत्वपूर्ण काम है।


इच्छा पर भारी मजबूरी

यूं तो होममेकर बनना या बाहर काम करना किसी स्त्री का अपना फैसला है, लेकिन कभी-कभी मजबूरी या जरूरत उनकी इच्छा पर भारी भी पडती है। कोई स्त्री करियर बनाना चाहती है, लेकिन घरेलू परिस्थितियां उसे घर पर रहने को मजबूर करती हैं। सेंटर फॉर वर्क-लाइफ पॉलिसी के एक अध्ययन के अनुसार, अधिकतर भारतीय स्त्रियां शादी के बाद घरेलू जिम्मेदारियों या बच्चे की परवरिश के कारण नौकरी छोडती हैं। एक हजार भारतीय स्त्रियों पर हुए इस सर्वे में से 51 फीसदी को विवाह के बाद और 52 प्रतिशत को बच्चा होने के बाद ऐसा दबाव महसूस हुआ। स्त्रियों ने माना कि ऑफिस के बाद घर जाकर सेकंड शिफ्ट का दबाव उन्हें कई बार घर पर ही रहने को मजबूर करता है।


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house3होममेकर बनाम कामकाजी स्त्री

होममेकर्स ज्यादा खुश हैं या नौकरीपेशा स्त्रियां? कभी-कभी होममेकर्स को अपनी स्थिति बुरी लगती है तो कई बार नौकरीपेशा स्त्रियां नाखुश दिखती हैं। दिल्ली की 55 वर्षीय कल्पना लांबा होममेकर हैं। वह एक कॉलेज में लेक्चरर थीं, लेकिन बच्चों की खातिर उन्हें जॉब छोडनी पडी। कहती हैं, जिन बच्चों की परवरिश केलिए मैंने नौकरी छोडी, उन्हीं के पास बाद में मेरे लिए समय नहीं रहा।

मैं रोज सुबह सबसे पहले उठती, पति और बच्चों के लंच बॉक्स तैयार करती और नाश्ते की टेबल पर उनका इंतजार करती। संडे को मेरा मन होता कि सबके साथ कहीं बाहर निकलूं तो बाकी लोग आराम के मूड में होते। हरेक की अपनी दुनिया थी, जिसमें मेरे लिए समय कम था। शादी के बाद बच्चे अपनी-अपनी गृहस्थी में मसरूफ हैं, पति रिटायर नहीं हुए हैं। मेरी लाइफ अभी भी वैसी ही है। अब अकेलापन खलता है। लगता है नौकरी छोडने का मेरा फैसला गलत था।



दूसरी ओर शादी के बाद एम.एन.सी. में अपने बेहतरीन करियर को छोडने वाली गुडगांव (हरियाणा) की नेहा शर्मा कहती हैं, पेरेंट्स की ख्वाहिश थी कि मैं नौकरी करूं, मैंने की। 3-4 साल मन लगा कर काम किया। पिछले साल मेरी शादी हुई तो मुझे लगा कि पति व परिवार को पूरा समय दूं। हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद मैं दोबारा जॉब करूं, अभी तो घर मुझे अच्छा लग रहा है।


नॉन-वर्कर्स नहीं हैं होममेकर्स: सुप्रीम कोर्ट पिछले वर्ष दुर्घटना के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंट को होममेकर्स की भूमिका पर पुनर्विचार करने को कहा। जस्टिस ए.के. गांगुली ने कहा, स्त्रियां घर बनाती हैं, समस्त घरेलू कार्य करती हैं, बच्चों की परवरिश करती हैं, उन्हें पाल-पोस कर बडा करती हैं। वे परिवार को अपनी जो सेवाएं देती हैं, उन्हें बाजार से नहीं खरीदा जा सकता। लेकिन खेद का विषय यह है कि उनके कार्यो का अब तक मूल्यांकन नहीं किया गया है।


वर्ष 2001 में हुई जनगणना में कहा गया था कि भारत में 36 करोड स्त्रियां नॉन-वर्कर्स हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि होममेकर्स को नॉन-वर्कर्स की श्रेणी में रखना उनके श्रम का अपमान करना है।


इस मामले में पीडित की पत्नी सडक दुर्घटना में मारी गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीडित को ढाई लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। फैसले के खिलाफ व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। इस पर कोर्ट ने कहा कि मुआवजा तय करते समय होममेकर द्वारा किए गए हर कार्य का मूल्य आंका जाना चाहिए। उसकी आय को पति की कमाई का महज एक तिहाई मानना गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की रकम को ढाई लाख से बढा कर छह लाख रुपये किया। साथ ही अपील की तारीख से मुआवजे में ब्याज की राशि भी जोडने को कहा।


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