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विद्या बालन: गोवा में ऐसा क्या हुआ ?

Jagran Sakhi

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विद्या बालन, अभिनेत्री


vidyaशूटिंग के सिलसिले में अकसर देश-विदेश की सैर करते हैं हम कलाकार। लेकिन निजी तौर पर भी मुझे घूमना बहुत पसंद है। कई बार तो शूटिंग के लिए किसी ऐसी जगह जाती हूं जहां कभी पहले भी गई थी तो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई की शूटिंग के लिए मैं गोवा गई थी। मेरी आंखों के आगे बचपन के दिन घूमने लगे। दरअसल बचपन में स्कूल की ओर से हम गोवा गए थे। दस दिनों का वह टूर हमारे लिए यादगार था। उस टूर में जितनी मौज-मस्ती की, शायद ही इसके बाद कभी की होगी। शूटिंग के दौरान तो व्यस्तता बहुत ज्यादा रहती है, इतना सुकून नहीं होता कि घूमना एंजॉय कर सकें।

मुझे समुद्र के किनारे मॉर्निग वॉक करना बहुत अच्छा लगता है। शांत जगहें मुझे बहुत पसंद हैं और जब भी थोडी फुर्सत होती है, मैं पंचगनी जाना पसंद करती हूं जो मुंबई से काफी पास है। बचपन में पापा छुट्टियों में हमें वहां ले जाते थे। पहाड, झरने और प्राकृतिक दृश्य..मन शांत हो जाता है वहां। लोग स्विट्जरलैंड जाना पसंद करते हैं लेकिन सच कहूं तो हिमाचल प्रदेश में शिमला के नजदीक कुफरी किसी स्विट्जरलैंड से कम नहीं है। कुफरी में बर्फ से ढके पहाडों को देखना मेरे यादगार नजारों में से एक है। अपने काम से जुडा सैर का यह पहलू मुझे सबसे अच्छा लगता है, क्योंकि इसके जरिये हमें पूरी दुनिया को देखने का मौका मिलता है।


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हवा में उडान भरना रोमांचक अनुभव है


अनुषा, पायलट, एयर इंडिया, दिल्ली

मैं पायलट हूं, लिहाजा हवा पर ही सवार रहती हूं। जमीन से इतने ऊपर हवा में उडान भरना जितना जोखिम भरा है, उतना ही आनंददायक भी। मन में गहरा आत्मविश्वास पनपता है। हमें महीने में लगभग 75 घंटे की उडान भरनी होती है। कई बार तो 2-3 दिन तक लगातार उडते हैं। सफलतापूर्वक लैंडिंग होने पर सराहना-पत्र मिलता है। मुश्किल उडान में सफल होने पर तारीफ भी मिलती है। लेकिन मेरा एक कडवा अनुभव भी है। उन दिनों मैं ट्रेनिंग कर रही थी। पटना से जमशेदपुर गई थी। मौसम खराब था और सोचा था कि अगले दिन लौटेंगे। मेरे एक सीनियर को अगले दिन किसी जरूरी पार्टी में जाना था और उन्होंने मुझे उसी दिन लौटने को कहा। बीच रास्ते में एक बडी सी पहाडी है, जहां मैं बादलों के बीच घिर गई। वे पल मेरे लिए मौत जैसे भयानक थे। समझ नहीं आ रहा था कि कहां जा रही हूं। लग रहा था मानो आखिरी वक्त आ गया है। लगभग 45 मिनट जिंदगी व मौत के बीच झूलने के बाद मैं बादलों के भंवर से बाहर निकल सकी। उस दिन मैंने खुद से वादा किया कि कभी दूसरे के कहने पर अपने फैसले नहीं बदलूंगी।

मेरे पति भी पायलट हैं और मुझे उनका पूरा सपोर्ट है। लेकिन मेरे दोनों बच्चे अभी बहुत छोटे हैं। पेरेंट्स को बार-बार नहींबुला सकते। घर पर सपोर्ट सिस्टम के न होने के कारण थोडी मुश्किलें आ रही हैं। मैंने दोनों बच्चों के जन्म में कम अंतर रखा, ताकि दोनों साथ-साथ पल सकें और मैं जल्दी परवरिश की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सुकून से दोबारा उडान भर सकूं।


काम के बीच में ही घूमने का मौका ढूंढती हूं


उर्मिला मातोंडकर, अभिनेत्री

हम कलाकारों के पास अलग से छुट्टी लेकर घूमने का मौका कम ही होता है। काम के बीच में ही फुर्सत के पल भी ढूंढने होते हैं। मैंने कभी एक साथ दो-तीन फिल्मों में काम नहीं किया। साल में एक-दो बार विदेशों में शूटिंग का शेड्यूल बनता ही है। जब कभी किसी खूबसूरत लोकेशन पर शूटिंग होती है, मैं उसे पूरी तरह एंजॉय करती हूं। एक बार छह महीने के लिए मैं एक शो ट्रूप पर गई थी। इस दौरान टोरंटो, न्यूयॉर्क, न्यूजीलैंड गई। मुझे सभी जगहें पसंद आई। आउटडोर शूटिंग होती है तो मैं अपने लिए 5-6 दिन जरूर निकाल लेती हूं, ताकि थोडा आराम कर सकूं और उन जगहों में इत्मीनान से घूम भी सकूं।

ऐसे समय में मैं कोशिश करती हूं कि मेरे परिवार वाले और करीबी दोस्त भी वहीं आ जाएं। हिंदुस्तान में कश्मीर, मनाली, गोवा, महाबलेश्वर और पंचगनी मेरी पसंदीदा जगहें हैं। अगर यहां शूटिंग हो तो मन खुश हो जाता है। हम कलाकारों के लिए प्रकृति वरदान की तरह है, जो हमें तरोताजा कर देती है। प्रकृति के बीच कुछ पल हम आम इंसान की तरह जीते हैं। वर्ना तो आर्कलाइट्स टेक-रीटेक के बीच मशीन जैसे बन जाते हैं।


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