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मिठास के साथ हो थोड़ी कड़वाहट

Jagran Sakhi

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बच्चे की प्यार भरी मीठी बातें, शरारतें, उसकी उछल-कूद, रोना-मचलना, रूठना..यह सब अच्छा तो लगता है पर एक सीमा तक। जैसे ही वह बडों के निर्देशों को समझने के काबिल होता है, हमें उसे अनुशासित करने की जरूरत महसूस होने लगती है। जिस तरह स्वाद में कडवी होने के बावजूद मेथी को हम उसके गुणकारी तत्वों की वजह से अपनी मसालेदानी का जरूरी हिस्सा बनाते हैं, उसी तरह बच्चों के व्यक्तित्व के संतुलित विकास के लिए लाड-प्यार के साथ थोडी सख्ती भी बरतनी चाहिए। संस्कृत की एक प्रचलित सूक्ति में भी कुछ ऐसा ही कहा गया है-

लालयेत पंच वर्षाणी दशवर्षाणि ताडयेत

प्राप्तेतु शोडश वर्षे, पुत्रे मित्र वदाचरेत।

अर्थात पांच वर्ष की आयु तक ही बच्चे को लाड-प्यार देना चाहिए, उसके बाद उसे अनुशासित करने के लिए थोडी सख्ती भी जरूरी है। सोलह वर्ष की आयु के बाद बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए।

लगातार कोशिश जारी रखें

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हर अभिभावक की यही इच्छा होती है कि उसका बच्चा अनुशासित और आज्ञाकारी बने, पर बच्चे तो बच्चे ही हैं। उन्हें अपनी आजादी में जरा भी खलल  पसंद नहीं। ऐसे स्थिति में लोगों के सामने सबसे बडी समस्या यही होती है कि बच्चों को अनुशासित करने का सही तरीका क्या हो? उन्हें किस हद तक नियंत्रित किया जाए और कितनी छूट दी जाए? इस संबंध में चाइल्ड काउंसलर पूनम कामदार कहती हैं, जिस तरह बीमारी दूर करने के लिए डॉक्टर हमें कडवी दवा देता है, उसी तरह बच्चों की गलत आदतें सुधारने के लिए उनके साथ थोडी सख्ती  बरतने की जरूरत होती है, लेकिन किसी बच्चे को एक दिन में अनुशासित नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए बहुत धैर्य की जरूरत होती है। सबसे पहले बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखते हुए पेरेंट्स  को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे की किन आदतों में सुधार लाने की जरूरत है। उसके बाद धीरे-धीरे उसे प्यार से समझाएं। हो सकता है कि पहली-दूसरी बार बच्चा आपका कहना न माने, पर आप कोशिश जारी रखें। आप खुद  उसके साथ मिलकर उसकी पढाई और दूसरे कार्यो का शेड्यूल  मैनेज  करें। अगर आप उसे देर रात तक टीवी देखने से मना करती हैं तो आपको भी निर्धारित समय के बाद टीवी का स्विच ऑफ कर देना चाहिए। जब बच्चे को यह महसूस होगा कि आप उसकी भलाई के लिए वाकई चिंतित हैं तो वह आपकी बात जरूर मानेगा।


वक्त के साथ बदलते नियम

समय के साथ पेरेंटिंग  के नियमों में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। जेएनयू की समाजशास्त्री डॉ. रेणुका सिंह के अनुसार, पहले हमारी सोच का दायरा बहुत संकुचित था। हम बंधे-बंधाए नियमों का पालन सिर्फ इसलिए करते आ रहे थे क्योंकि हमारे पूर्वज भी ऐसा करते थे। परेंटिंग  के मामले में पहले तयशुदा फॉ‌र्म्युला यह  था कि केवल डर दिखाकर ही बच्चे को अनुशासित किया जा सकता है, पर समय के साथ लोगों को इस तरीके में बदलाव लाने की जरूरत महसूस हुई। वे ऐसी समस्याओं पर खुल कर बातचीत करने लगे। इस तरह लोगों ने थोडा उदार रवैया अपनाना शुरू कर दिया।


पेरेंट्स का उदार रवैया

पेरेंटिंग के मामले में उदारता बरतने की जरूरत इसलिए भी महसूस की जाने लगी क्योंकि अब हमारी जीवनशैली काफी बदल चुकी है और बच्चों की आदतों पर भी इसका असर पडना लाजिमी है। मिसाल के तौर पर पहले देर तक सोने वाले बच्चों को अनुशासनहीन माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। बडे शहरों में माता-पिता दोनों ऑफिस जाते हैं। ऐसे में वे रात को ही बच्चे से बातें करने का वक्त  निकाल पाते हैं। लिहाजा पहले की तुलना में अब छुट्टी वाले दिन बच्चे थोडी देर तक सोना पसंद करते हैं और पेरेंट्स को भी इस पर कोई ऐतराज नहीं होता।


तय हो निश्चित सीमा-रेखा

उदार रवैया अपनाने का मतलब यह नहीं है कि हम अपने बच्चों को मनमानी के लिए छोड दें। कहीं न कहीं हमें अनुशासन की सीमा-रेखा तय करनी पडेगी। आजकल कामकाजी दंपतियों के पास बच्चों के लिए वक्त  नहीं होता। इस कमी को पूरी करने के लिए वे बच्चे की हर मांग इसलिए पूरी कर देते हैं क्योंकि उनके मन में इस बात को लेकर अपराध बोध होता है कि वे अपने बच्चे की देखभाल अच्छी तरह नहीं कर पा रहे। यह तरीका बिलकुल गलत है। पेरेंट्स के इसी रवैये की वजह से बच्चों में अनुशासनहीनता बढ रही है। बच्चों के साथ दोस्ताना रिश्ता रखने की अवधारणा को भी कुछ पेरेंट्स  सही रूप में अपना नहीं पाते। नतीजतन बच्चे यही सोचते हैं कि मम्मी-पापा से क्या डरना? बच्चों के साथ आपका दोस्ताना व्यवहार वहीं तक ठीक है, जब तक कि वे अपने दिल की बातें आपके साथ ख्ाुल कर शेयर करें। जैसे ही बच्चों के गलत व्यवहार को नियंत्रित करने की बात आए तो इसके लिए अगर बच्चे के साथ थोडी सख्ती  भी बरतनी पडे तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

पेरेंटिंग के कुछ खास नियम

– बच्चे के साथ सहज बातचीत की आदत विकसित करें।

– उसके सभी दोस्तों और टीचर्स से संपर्क बनाए रखें।

– अगर अपने भाई-बहनों के साथ उसका व्यवहार ठीक न हो तो उसे ऐसा करने से उसी वक्त  रोकें।

– पेरेंट्स की आपसी बातचीत में भी शालीनता होनी चाहिए क्योंकि बच्चे उनके व्यवहार का ही अनुसरण करते हैं।

– अगर वह मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल करता है तो आप उसकी एक्टिविटीज  पर पूरी निगरानी रखें कि कहीं वह इन सुविधाओं का दुरुपयोग तो नहीं कर रहा?

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