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कितना झूठ जरूरी होता है ?

Jagran Sakhi

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lieसदा सच बोलने का पाठ हमें बचपन से पढाया जाता है, पर हमें सबसे बडा झटका उस वक्त लगता है, जब सच बोलने पर हमें पहली बार डांट पडती है और यहीं से हमारे सामाजिक जीवन में झूठ की एंट्री होती है। छोटी उम्र में ही हमें किताबी उपदेशों और व्यावहारिक जीवन का फर्क बखूबी समझ आने लगता है।


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क्यों लेते हैं हम झूठ का सहारा

सच बोलना सचमुच बहुत अच्छी बात है, लेकिन ऐसा सच किस काम का जिससे किसी मासूम बच्चे का दिल टूट जाए, किसी के रिश्ते में दरार पड जाए..। ऐसा सच, सच तो जरूर है, पर प्रिय नहीं। तभी तो कहा गया है-

सत्यम् प्रियम् ब्रूयात्,

न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।

प्रियंच नानृतम् ब्रूयात्

एष धर्म: सनातना।।


(ऐसा सच बोलें, जो सच होने के साथ सुनने में भी प्रिय लगे, अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए क्योंकि यह धर्म के अनुकूल नहीं है। )

जरा आप उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब आप किसी रिश्तेदार के नवजात शिशु को पहली बार देखने जाते हैं। वह बच्चा देखने में ऐसा है कि उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती, लेकिन सबसे पहले आपके मुंह से यही निकलेगा,अहा कितना प्यारा बच्चा है! आपकी नानी ने अपने हाथों से आपके लिए स्वेटर बुना है, पर उसका ब्राइट ऑरेंज कलर आपको जरा भी पसंद नहीं है। फिर भी जब वह आपसे स्वेटर के बारे में पूछेंगी तो क्या सच बोलकर आप उनका दिल दुखाना चाहेंगी..? नहीं न..शायद कभी नहीं। यहां सच-झूठ कानून और नियम-कायदों के लिए तो बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन जब बात भावनाओं की हो तो झूठ-सच का सारा भेद मिट जाता है क्योंकि अपनों की खुशी से बढकर कुछ भी नहीं होता।


जब सच से प्यारा लगे झूठ

सच और झूठ के इस बहस में असली मुद्दा इरादे का है कि अगर किसी ने आपसे झूठ बोला भी है तो उसे गुनाहगार साबित करने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि झूठ बोलने के पीछे उसका मकसद क्या है? कुछ झूठ इतने प्यारे होते हैं कि बोलने वाले पर आपको गुस्सा नहीं आता, बल्कि उसके लिए आपके दिल में अपनत्व की भावना जाग उठती है। ऐसे ही एक झूठ का जिक्र करते हुए आईटी प्रोफेशनल नमिता जैन कहती हैं, जब मैंने ससुराल में पहली बार खाना बनाया तो मेरे ससुर जी ने खाने की बहुत तारीफ की। उन्हें खिलाने के बाद जब मैंने खाना चखा तो दाल में नमक नहीं था और सब्जी भी बेस्वाद थी, लेकिन वह मेरा दिल नहीं दुखाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मेरी झूठी तारीफ की। उनके इस झूठ की वजह से मेरे दिल में उनकी इज्जत और बढ गई। एक नहीं, कई ऐसे प्यारे झूठ होते हैं, जिन्हें याद करके मन भावुक हो उठता है। जरा याद कीजिए अपने बचपन के उस दोस्त को जो झूठ बोलकर आपको टीचर की मार से बचा लेता था। याद कीजिए अपनी मां को, जो दूसरे शहर में बीमार और अकेली होने के बावजूद यह सोचकर आपको अपनी बीमारी की सूचना नहीं देतीं कि मेरी वजह से घर से दूर बैठे बेटे/बेटी को परेशानी होगी। अगर झूठ बोलने के पीछे इंसान का इरादा नेक हो तो वह सच से कहीं ज्यादा अच्छा होता है, लेकिन जब किसी को दुख पहुंचाने के मकसद से सच बोला जाए तो वह एक सच सौ झूठ से भी ज्यादा बुरा है।


मन के आईने में झांकें

सामाजिक जीवन में हम एक साथ कई रिश्तों को जी रहे होते हैं और किसी भी रिश्ते को प्यार के साथ निभाने के लिए हमें कभी न कभी झूठ का सहारा लेना ही पडता है। जिस झूठ से किसी का भला हो, वह झूठ-झूठ नहीं होता। सुनने में यह वाक्य थोडा फिल्मी जरूर लगता है, लेकिन सच्चाई यही है कि ये छोटे-छोटे झूठ हमारे रिश्तों को कई बडी उलझनों से बचा लेते हैं। जरा सोचिए, अगर हम सब एक-दूसरे के बारे में जैसा महसूस करते हैं, वही बोलना शुरू कर दें तो हमारे रिश्तों की कैसी फजीहत होगी। फिर शायद किसी से भी हमारे संबंध सहज नहीं रह पाएंगे।

जरा सोचिए पार्टी में जाने से पहले पत्नी अच्छी तरह तैयार होकर पति से पूछे कि इस ड्रेस में मैं ज्यादा मोटी तो नहीं लग रही..? ऐसे नाजुक मौके पर शायद कोई भी इंसान सच बोलकर पत्नी का और (अपना भी) मूड खराब करना नहीं चाहेगा। लिहाजा, उसे झूठ से ही काम चलाना पडेगा।

अगर आपके सामने कभी ऐसी दुविधा की स्थिति आए कि न चाहते हुए भी आपको झूठ बोलना पडे तो ऐसे में आपको अपने अंतर्मन के आईने में झांककर खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि कहीं मैं गलत तो नहीं कर रहा/रही? हम चाहे कुछ भी बोलें पर हमारी अंतरात्मा कभी भी किसी गलती में हमारा साथ नहीं देती। इसलिए ऐसे में अंतर्मन की आवाज जरूर सुननी चाहिए।


कितना झूठ है सही

इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, हमें हमेशा सच बोलेने की ही कोशिश करनी चाहिए। सच बोलना हमारी मूलभूत प्रवृत्ति है। सच के प्रति हम बहुत संवेदनशील होते हैं। अगर झूठ सुनकर हमें दुख होता है तो ऐसी बातें बोलने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे दूसरों की भावनाएं आहत हो सकती हैं। बचपन में हम झूठ नहीं बोलते पर बाद में बडों को देखकर अपनी सुविधाओं के लिए झूठ बोलना सीखते हैं। दूसरों की भलाई के लिए कुछ खास स्थितियों में बोले गए झूठ को झूठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन अपने फायदे/लालच और दूसरों को नुकसान पहुंचाने या उन्हें परखने के उद्देश्य से झूठ बोलने की आदत बहुत भारी पड सकती है। झूठे बच्चे और भेडिये वाली कहानी तो आपने बचपन में जरूर सुनी होगी। ऐसा करने वाले लोग अपनों का विश्वास खो देते हैं। नकारात्मक छवि की वजह से इनकी सच्ची बातों पर भी लोगों को यकीन नहीं होता। अगर कभी मजबूरी में आपको झूठ बोलना भी पडे तो बाद में जब स्थितियां सामान्य हो जाएं तो विनम्रता से माफी मांगते हुए अपना झूठ स्वीकार लेना चाहिए। इससे मन में कोई ग्लानि नहीं रहेगी और आपकी छवि भी नहीं बिगडेगी।


हमारे जीवन में झूठ के लिए उतनी ही जगह है, जितना कि खाने में नमक की। खाने में नमक बहुत जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा नमक न केवल खाने को बेस्वाद बनाता है, बल्कि सेहत के लिए भी नुकसानदेह होता है। इसी तरह किसी अच्छे मकसद के लिए बोला गया छोटा सा झूठ तो चल जाता है, लेकिन गलत इरादे से बोला गया झूठ हमारे लिए जहर का काम करता है। इसलिए कोई भी झूठ बोलने से पहले कई बार सोचें। अगर कभी आपके सामने झूठ बोलने और चुप रहने का विकल्प हो तो चुप ही रहना ज्यादा अच्छा है।


नोट : इस लेख का मकसद झूठ को बढावा देना कतई नहीं है, बल्कि हम आपको सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि किसी भी भलाई के लिए कानून और नैतिकता की सीमाओं में रहते हुए बोला गया झूठ गलत नहीं होता।


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