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ग़ज़ल : रात दिन आवारगी होने लगी

Saarthi Baidyanath

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रात दिन आवारगी होने लगी
तुम मिले तो शायरी होने लगी
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पाँव माँ के मैं दबाता हूँ यहाँ
मंदिरों में हाज़िरी होने लगी
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आरिज़े गुल पर पसीने की लकीर
चांदनी क्या शबनमी होने लगी
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आज फिर उससे मेरी आँखें मिलीं
शाखे-ग़म फिर से हरी होने लगी
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मौत ने मुझको छुआ फिर ये हुआ
ज़िन्दगी से आशिक़ी होने लगी

#saarthibaidyanath

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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