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भूख (लघुकथा)

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भूख (लघुकथा)

ट्रेन छुटने में अभी आधा घंटा और बाकी था l श्रद्धा कुछ खाने के लिए रेलवे भोजनालय की और चल पड़ी l उसे बड़ी जोर से भूख लग रही थी l क्योंकि सुबह पांच बजे ही वह तेजपुर से गुवाहाटी के लिए निकली थी l जल्दी न निकलती तो जाम में फंसने का डर था l और एकबार जाम में फंस गए तो ट्रेन छूटने का एक अलग ही डर l इसीलिए वह बिना खाए-पिए घर से निकल पड़ी थी l रेलवे भोजनालय के पास पहुँच कर श्रद्धा ने जल्दी से एक प्लेट इडली का आर्डर किया l बहुत भीड़ के वावजूद उसके हाथ में गर्मागर्म इडली का प्लेट आ चुका था l वह प्लेट लेकर एक कोने में जाकर खड़ी हो गई l जैसे ही वह एक निवाला मुह में डालने को तत्पर हुई वैसे ही उसकी नजर एक नन्ही से बच्ची के पास जाकर ठहर गई l उम्र करीब ६/७ वर्ष की होगी l वह सामने पड़े कूड़ेदान में से लोगो द्वारा फेंकी गई जुट्ठन बटोरने में मशगुल थी l वह खाना जिसमे अब तक नजाने कितने संक्रमण पनप चुका होगा l
श्रद्धा का हाथ यकायक रुक गया l उसने इडली को पुन: प्लेट में वापस रख दिया l फिर वह धीरे-धीरे उस बच्ची के करीब गई l किसी की आने की आहट सुनकर बच्ची ने पलटकर देखा l हाय राम! कितनी प्यारी बच्ची हैं l श्रद्धा चौक उठी l परन्तु किस्मत की मारी बेबस उस गरीब बच्ची के लिए क्या अच्छा खाना क्या खराब फर्क करने के लिए कहाँ समय था l उसे तो बस जिन्दा रहने के लिए पेट भरने से मतलब था l गरीबी की भूख ने उसे आज गन्दगी भरी जुट्ठन और खाने के बीच का फर्क भी भुला दिया था l बच्ची को देखकर श्रद्धा का मन भर आया l उसने बच्ची अपने पास बुलाया फिर इडली का प्लेट उसके हाथ में थमाकर वह ट्रेन की तरफ चल पड़ी …जहाँ ट्रेन छूटने का सिग्नल हो चुका था l

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