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जानें – आखिर क्या हुआ था 18 दिन के महाभारत युद्ध के बाद

18 दिन के महाभारत के युद्ध से हस्र कोई परिचित होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस युद्ध के बाद पांडवों के साथ क्या हुआ? भगवान श्रीकृष्ण कहां चले गए? आइए जानते हैं उसके बाद की कहानी को…


पांडवों के शिवर पर हमला

युद्ध के बाद द्रोण पुत्र अश्वत्थामा अपनी पिता की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद व्यथित हो गया था. युद्ध के दौरान अश्वत्थामा ने दुर्योधन को वचन दिया कि वह अपने पिता की मृत्यु का बदला लेकर ही रहेगा. इसके बाद उसने किसी भी तरह से पांडवों की हत्या करने की कसम खाई. युद्ध के अंतिम दिन दुर्योधन की पराजय के बाद अश्वत्थामा ने बचे हुए कौरवों की सेना के साथ मिलकर पांडवों के शिविर पर हमला किया. उस रात उसने पांडव सेना के कई योद्धाओं पर हमला किया और मौत के घाट उतार दिए. उसने अपने पिता के हत्यारे धृष्टद्युम्न और उसके भाईयों की हत्या की, साथ ही उसने द्रौपदी के पांचों पुत्रों की भी हत्या कर डाली. हालांकि अभिमन्यु का पुत्र अभी जीवित था जो उत्तरा के पेट में पल रहा था.


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अपने इस कायराना हरकद के बाद अश्वत्थामा शिविर छोड़कर भाग निकला. द्रौपदी के पांचों पुत्रों की हत्या की खबर जब अर्जुन को मिली तो उन्होंने क्रुद्ध होकर रोती हुई द्रौपदी से कहा कि वह अश्वत्थामा का सर काटकर उसे अर्पित करेगा. अर्जुन को देखने के बाद अश्वत्थामा असुरक्षित महसूस करने लगा. उसने अपनी सुरक्षा के लिए तथा उत्तरा के पेट में पल रहे पुत्र को खत्म करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जो उसे द्रोणाचार्य ने दिया था. उधर श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को ब्रह्मास्त्र छोड़ने की सलाह दी. अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र को पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था जबकि अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए. हालांकि ब्रह्मास्त्र प्रहार से उत्तरा ने मृत शिशु को जन्म दिया था किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी उसे फिर से जीवित कर दिया. यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ.


अश्वत्थामा को शाप

ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के बाद अश्वत्थामा को रस्सी में बांधकर द्रौपदी के पास लाया गया. अश्वत्थामा को रस्सी से बंधा हुआ देख द्रौपदी का कोमल हृदय पिघल गया और उसने अर्जुन से अश्वत्थामा को बन्धनमुक्त करने के लिए कहा. इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को शाप दिया कि “तू पापी लोगों का पाप ढोता हुआ तीन हजार वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा.”


गांधारी का शाप

युद्ध के बाद महर्षि व्यास के शिष्य संजय ने जब गांधारी को इस बात की जानकारी दी कि अपने साथियों और द्रौपदी के साथ पांडव हस्तिनापुर में दस्तक दे चुके हैं तो उनका दुखी मन गम के सागर में गोते लगाने लगा, सारी पीड़ा एकदम से बाहर आ गई. उनका मन प्रतिशोध लेने के लिए व्याकुल हो रहा था इसके बावजूद भी वह शांत थी, लेकिन जब उन्हें यह पता चला कि पांडवों के साथ भगवान श्रीकृष्ण भी हैं तो वह आग बबूला हो गईं. वह सभा में जाकर श्रीकृष्ण पर क्रोधित होने लगी और शाप दिया.


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गांधारी  ने कहा “अगर मैंने भगवान विष्णु की सच्चे मन से पुजा की है तथा निस्वार्थ भाव से अपने पति की सेवा की है, तो जैसा मेरा कुल समाप्त हो गया, ऐसे ही तुम्हारा वंश तुम्हारे ही सामने समाप्त होगा और तुम देखते रह जाओगे. द्वारका नगरी तुम्हारे सामने समुद्र में डूब जाएगी और यादव वंश का पूरा नाश हो जाएगा.” श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए गांधारी को उठाया और कहा “ ‘माता’ मुझे आपसे इसी आशीर्वाद की प्रतीक्षा थी, मैं आपके शाप को ग्रहण करता हूं”. हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राज्याभिषेक होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण द्वारका चले गएं.


गांधारी के शाप का असर

शाप में गांधारी ने जो कहा था वह सच होने लगा. द्वारका में मदिरा का सेवन करना प्रतिबंधित था लेकिन महाभारत युद्ध के 36 साल बाद द्वारका के लोग इसका सेवन करने लगे. लोग संघर्षपूर्ण जीवन जीने की बजाए धीरे-धीरे विलासितापूर्ण जीवन का आनंद लेने लगे. गांधारी और ऋषियों के शाप का असर यादवों पर इस कदर हुआ कि उन्होंने भोग-विलास के आगे अपने अच्छे आचरण, नैतिकता, अनुशासन तथा विनम्रता को त्याग दिया.


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एक बार यादव उत्सव के लिए समुद्र के किनारे इकट्ठे हुए. वह मदिरा पीकर झूम रहे थे और किसी बात पर आपस में झगड़ने लगे. झगड़ा इतना बढ़ा कि वे वहां उग आई घास को उखाड़कर उसी से एक-दूसरे को मारने लगे. उसी ‘एरका’ घास से यदुवंशियों का नाश हो गया साथ ही, द्वारका नगरी भी समुद्र में डूब गई.


द्वारका में अर्जुन

इस नरसंहार के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी जानकारी हस्तिनापुर के राजा युधिष्ठर को भिजवाई और अर्जुन को द्वारका भेजने के लिए कहा. श्रीकृष्ण के बुलावे पर अर्जुन द्वारका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए. उधर श्रीकृष्ण स्वधाम के लिए चले गए.


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स्वर्ग की यात्रा

श्रीकृष्ण के मारे जाने और यदुवंशियों के नाश से दुखी पांडव भी परलोक जाने का निश्चय करते हैं और इस क्रम में पांचो पांडव और द्रोपदी स्वर्ग पहुंचते हैं. एक तरफ जहां द्रोपदी, भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल शरीर को त्याग कर स्वर्ग पहुंचते हैं वहीं युधिष्ठर सशरीर स्वर्ग पहुंचते हैं. हालांकि उन्हें अपनी एक गलती के कारण कुछ समय नरक में भी बिताना पड़ता है. इस पुरे सफर में उनके साथ एक कुत्ता भी होता है…Next


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