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महाभारत की वो घटना जब युधिष्ठिर के हाथों को जलाकर राख कर देना चाहते थे भीम

अपमान, न्याय-अन्याय, बदला और विध्वंस कुछ ऐसे शब्द हमारे दिमाग में आते हैं जब हम महाभारत का नाम सुनते हैं. महाभारत के हर चरित्र की अपनी ही कहानियां है. हर किरदार का व्यक्तित्व उनकी परिस्थितियों, पुर्नजन्म आदि तत्वों से प्रभावित दिखाई देता हैं. उन किरदारों से आप खुद को जोड़कर देख सकते हैं. इसके अलावा महाभारत प्रतिज्ञाओं के लिए भी जाना जाता है.


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महाभारत में जब दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण करने का आदेश दिया था, तो पांडव खेल के नियमों का पालन करते हुए मौन रहे. लेकिन प्रतिशोध की ज्वाला उनमें जल रही थी. भीम ने जब दुशासन को द्रौपदी के बाल खींचकर घसीटते हुए ले जाते देखा, तो उन्होंने बड़ा भाई होने के नाते युधिष्ठिर को उनके फैसले के लिए जिम्मेदार ठहराया.


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युधिष्ठिर कर रहे थे पांडवों का नेतृत्व

पासों के खेल में बड़े भाई युधिष्ठिर ना केवल पासें खेल रहे थे बल्कि फैसले भी वही ले रहे थे. जब पांडव खेल में सबकुछ हार गए तो कौरवों के उकसाने पर युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया. द्रौपदी को हारने के बाद दुर्योधन और दुशासन ने द्रौपदी का अपमान किया और भरी सभा में चीर हरण करने का प्रयास किया. द्रौपदी का घोर अपमान देखकर भीम क्रोध से उबल पड़े.


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कौरवों सहित युधिष्ठिर पर क्रोधित थे भीम

भीम को द्रौपदी से बहुत अधिक प्रेम था. प्रेम से अधिक वो द्रौपदी का मान करते थे, इसलिए जब द्रौपदी का अपमान हुआ तो उन्हें क्रोध आ गया और कौरव के अलावा उन्हें अपने भाई युधिष्ठिर की बुद्धि और उनके हाथों पर बहुत क्रोध आ रहा था. जिन हाथों से पांसे खेलते हुए वो हार गए थे. पौराणिक कहानियों की मानें तो उस समय भीम को इतना क्रोध आ गया कि उन्होंने भरी सभा में युधिष्ठिर के हाथ जलाने के लिए अर्जुन से अग्नि मंगवाई थी. थोड़ी देर बाद जब भीम का क्रोध शांत हुआ तो वो युधिष्ठिर के चरणों में सिर रखकर विलाप करने लगे. …Next





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