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ब्रह्मचारी आदि शंकराचार्य से मंडन मिश्र की पत्नी ने पूछे कामशास्त्र के सवाल, एक माह बाद मिले जवाब

Rizwan Noor Khan

28 Apr, 2020

सनातन धर्म को एक करने वाले आदि शंकराचार्य ने भारतवर्ष के सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले शंकराचार्य ने प्रकांड विद्वान मंडन मिश्र शास्त्रार्थ में पराजित किया तो उनकी पत्नी ने शंकराचार्य को चुनौती दे दी। आदि शंकराचार्य की जयंती के मौके पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के बारे में।

 

 

 

 

भगवान शंकर के वरदान से जन्में शंकर
सनातन धर्म के अनुयायियों में प्रचलित कथाओं के अनुसार केरल के काषल गांव के ब्राह्मण शिवगुरु भट्ट अपनी पत्नी सुभद्रा के साथ निवास करते थे। विवाह के काफी समय बाद भी कोई संतान नहीं होने पर दंपति ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। कहा जाता है कि भोलेनाथ के वरदान के कारण निश्चित समय बाद 788 ईस्वीं में शिवगुरु भट्ट को पुत्र की प्राप्ति हुई। शिवगुरु ने बेटे का नाम शंकर रखा। शंकर की बाल्यवस्था में ही पिता का देहांत हो गया।

 

 

बाल्यकाल में ही प्रकांड विद्वान
शुरुआत से ही धर्म संस्कृति पर रुचि रखने वाले शंकर ने 6 वर्ष की उम्र में ही पंडित की उपाधि हासिल कर ली। 8 वर्ष की उम्र में वह प्रकांड विद्वान हो गए और आचार्य शंकर के नाम से प्रसिद्ध हो गए। इसी अवस्था में उन्होंने सन्यास धारण कर लिया। सन्यास के बाद आचार्य शंकर ने भारत भ्रमण करना शुरू कर दिया।

 

 

 

 

मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में हराया
प्रचलित कथा के अनुसार भ्रमण के दौरान शंकराचार्य काशी पहुंचे। यहां के बाद वह मंडन मिश्र के गांव पहुंचे। कहा जाता है कि शंकराचार्य और मंडनमिश्र के बीच तालवन में शास्त्रार्थ शुरू हुआ। मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती ने शास्त्रार्थ की मध्यस्थता की। शंकराचार्य से मंडन मिश्र शास्तार्थ में हार गए तो उभयभारती ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ शुरू किया। उभयभारती ने बाल ब्रह्मचारी शंकराचार्य से कामशास्त्र के सवाल पूछने शुरू कर दिए।

 

 

 

 

उभयभारती को जवाब देने में लगा एक माह
ब्रह्मचारी होने के कारण शंकराचार्य को कामशास्त्र का अनुभव और ज्ञान नहीं था। उन्होंने उभयभारती से एक माह का समय मांगा और दूसरे शरीर में प्रवेश कर शंकराचार्य ने कामशास्त्र का ज्ञान हासिल कर लिया। दोबारा शास्त्रार्थ शुरू हुआ तो उभयभारती शंकराचार्य के जवाबों से चकित रह गईं। उभयभारती ने शास्त्रार्थ में अपनी हार स्वीकार कर ली। इसके बाद शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए दिग्विजय यात्रा की शुरुआत की। शंकराचार्य ने केदारनाथ के पास 32 वर्ष की उम्र में अपना शरीर त्याग दिया।…Next

 

 

 

 

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