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गुरु नानक जयंती पर सूर्यास्‍त के बाद किया यह काम तो खुल जाएगा नसीब, जानिए गुरुपर्व के तीन मुख्‍य काम

Rizwan Noor Khan

12 Nov, 2019

सिख धर्म के संस्‍थापक और सिखों के पहले गुरु नानक देव का आज यानी 12 नवंबर को पूरी दुनिया में हर्षोल्‍लास के साथ जन्‍मदिन मनाया जा रहा है। गुरुनानक देव हिंदू कैलेंडर के सबसे महत्‍वपूर्ण माह कार्तिक की पूर्णिमा को पाकिस्‍तान के तलवंडी गांव में जन्‍मे थे। गुरु नानक को दुनिया भर में अपने उपदेशों के चलते ख्‍याति हासिल हुई। गुरु नानक जयंती पर सूर्योदय और सूर्यास्‍त का खास महत्‍व बताया गया है। इस दौरान तीन मुख्‍य काम बताए गए हैं जिनको करने से दुखों का नाश होता है और भाग्‍य खुल जाता है।

 

 

 

 

 

कुरीतियों पर प्रहार
सिख धर्म की मान्‍यताओं के अनसार गुरु नानक देव के पास बचपन से ही विशेष तरह की शक्तियां थीं। वह लोगों के जीवन को सार्थक बनाने के लिए पूरे जीवन भर जुटे रहे है। 1469 में जन्‍में गुरु नानक देव ने 1521 तक लगातार कई देशों की यात्राएं कर जीवन के सार को समझा और लोगों को सही दिशा दिखाई। इस दौरान उन्‍होंने सामाजिक कुरीतियों को भी दूर करने का काम किया और लोगों को अपने उपदेशों के जरिए मोक्ष हासिल करने का रास्‍ता दिखाया। गुरु नानक के 10 उपदेश आज भी पूरी दुनिया में चर्चित हैं।

 

 

 

 

ब्रह्म मुहूर्त और सूर्योदय
मान्‍यता है कि गुरु नानक देव की जयंती मनाने के लिए ब्रह्म मुहूर्त और सूर्योदय का बेहद महत्‍व माना गया है। गुरु पर्व के रूप में नानक देव का जन्‍मदिन मनाए जाने के लिए कार्तिक पूर्णिमा की तड़के सुबह से अरदास शुरू हो जाती है। इस दौरान गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ होता है और भजन कीर्तन के साथ नगर भ्रमण के लिए पालकी निकाली जाती है। ऐसी मान्‍यता है कि ब्रह्म मुहूर्त और सूर्योदय के समय गुरुद्वारा में अरदास करने से दुखों का नाश होता है और चिंताओं से मुक्ति मिल जाती है।

 

 

 

 

लंगर में प्रसाद ग्रहण
गुरु नानक देव ने आडंबर पर कभी भी विश्‍वास नहीं किया और उसके खिलाफ लोगों को जागरुक करते रहे। नानक देव ने दुनिया के कई देशों में यात्राएं कीं और वहां व्‍याप्‍त कुरीतियों को दूर किया। वह जाति प्रथा के हमेशा से खिलाफ रहे। इसे दूर करने के लिए उन्‍होंने लंगर व्‍यवस्‍था की शुरूआत की। ऐसी मान्‍यता है कि लंगर के जरिए एक ही पंगत में अमीर और गरीब जमीन पर बैठकर भोजन ग्रहण करे। इसी उद्देश्‍य से आज भी गुरुद्वारों में लंगर छकने की परंपरा जारी है। कहा जाता है कि लंगर का प्रसाद ग्रहण करने बीमारियों से मुक्ति हासिल होती है।

 

 

 

 

सूर्यास्‍त के बाद सबद-कीर्तन
गुरु नानक देव की जयंती के मौके पर सिख धर्म के अनुयायी घरों और गुरुद्वारों को सजाते हैं और रोशनी से जगमग करते हैं। गुरु नानक की अरदास ब्रह्म मुहूर्त और सूर्योदय के साथ शुरू होती है। यह अरदास दिन में कुछ देर के लिए विश्राम के पश्‍चात दोबारा सूर्यास्‍त के बाद शुरू हो जाती है। इस दौरान गुरुद्वारा में गुरुवाणी और सबद कीर्तन में हिस्‍सा लेना जरूरी माना जाता है। यह अरदास रात्रि 02 बजे तक चलती है। माना जाता है कि देर रात ही गुरुनानक देव का जन्‍म हुआ था। मान्‍यता के तहत सूर्यास्‍त के बाद सबद कीर्तन में हिस्‍सा लेने से रुके काम बन जाते हैं और भाग्‍य बदल जाता है।…Next

 

 

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