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ओ ‘ईर्ष्या’

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ईर्ष्या हर इंसान के जीवन में
एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
हमें यह गुण विरासत में मिलता है,
कभी कम कभी बहुत ज्यादा रूप में
एक प्राकृतिक वृत्ति के रूप में।

 

 

ओ ‘ईर्ष्या’
तुम कितनी अद्भुत हो,
तुम कैसे बो और रोप देती हो
मनुष्यों में अक्सर,
घृणा और नफरत के बीज,
कितनी गहराई से,
कि मासूम सा ह्रदय
खोने लग जाता है,
मित्रता, प्रेम और
सहानुभूति, बस देखते-देखते
तुम्हारे आकर्षण
की लुभावनी कला के
सम्मोहन में.

 

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं।

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