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बच्चों के पेट पर डाका!

जरा हट के

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कहते हैं बच्चों में भगवान का वास होता है, उसकी गलतियां भी क्षम्य होती हैं। परंतु, यदि बिहार में मिड डे मील की पड़ताल करें तो चौंक जाना स्वाभाविक होगा कि यहां बच्चों के पेट पर भी डाका डालने से लोग बाज नहीं आते। घोटालेबाजी करनेवालों की नजरें छोटे-छोटे बच्चों के पेट पर हर वक्त जमी रहती हैं। जैसे ही मौका मिला, ये घोटाले को अंजाम दे डालते हैं। मिड डे मील में भी घोटाले का मामला परत-दर-परत सामने आ रहा है। यह अलग बात है कि इसमें एक साथ करोड़ों के घोटाले का मामला सामने नहीं आया है। इसकी राशि टुकड़े-टुकड़े में स्कूलों तक पहुंचती है। ऐसे में घोटाले का स्वरूप छोटा-छोटा परंतु आंकड़े बड़े हैं। यदि सीबीआई मिड डे मील की इमानदारी से जांच करे तो अबतक हुए घोटाले का भेद खुलना तय है। प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में पढऩे वाले गरीब बच्चों को पढ़ाई के प्रति रुचि बनी रहे और वे प्रतिदिन पढऩे आएं, इसी खातिर इस योजना की शुरुआत की गई थी। इससे पहले लाखों गरीब अभिभावक इसलिए अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते थे कि वे खेतों में काम करते थे। देश में सबसे पहले इस योजना की शुरुआत मद्रास सिटी में की गई थी। उद्देश्य था कि समाज से वंचित गरीब बच्चों को भी भरपेट भोजन मिले। इससे स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी थी। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में 28 नवंबर 2001 को इसे पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया। इस योजना के लागू होते ही हजारों लोगों को जैसे रोजगार मिल गया। इस योजना में अधिक से अधिक कमाई कैसे हो, इसपर शिक्षक से लेकर स्कूल के प्रधानाध्यापक फिर जिला शिक्षा अधिकारी तक विचार-विमर्श करते हैं। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सिवान, शिवहर सहित कई जिले में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं, जहां छात्र तो सौ हैं परंतु पच्चीस-तीस ही नियमित आते हैं। ऐसे में हजारों रुपए प्रतिमाह एक स्कूल से सीधे आमदनी हो जाती है। इसके पश्चात चावल की निम्न क्वालिटी का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार द्वारा जारी मेन्यू में खिचड़ी भी बच्चों को दी जाती है। इसमें आए दिन कीड़े मिलने की शिकायतें बिहार में आम बात है। कई बार कीड़ों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि बच्चे भोजन करते ही गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं। इनके अभिभावकों के हो-हल्ला के बाद प्रशासन की नींद खुलती है। जांच में घोटाले का मामला सामने आता है। इस योजना में गड़बड़ी के लिए अबतक सैकड़ों कर्मचारी को दोषी पाया जा चुका है। कार्रवाई के नाम पर अधिकतर मामलों में पैसे लेकर ‘फूल’ के ‘चाबुक’ चलाए गए, परंतु कोई कार्रवाई नहीं की गई। सरकारी मेन्यू के अनुसार, बच्चों को सोमवार को चावल व कढ़ी, मंगलवार को चावल-दाल व सब्जी, बुधवार को खिचड़ी, गुरुवार को सब्जी पोलाव, शुक्रवार को चावल व छोला, शनिवार को खिचड़ी व चोखा देना है। परंतु बिहार के दर्जनभर स्कूलों में ही इसका पालन हो पाता है। वह भी चालीस फीसदी ही। अधिकतर स्कूलों में गुरुजी के लिए भी इसी योजना से भोजन बनता है। उनका भोजन उनके घर की तरह ही स्वादिष्ट होता है। पहली जुलाई को बिहार के विधानसभा में भाकपा विधायक ने गड़बड़ी मामले को मजबूती से उठाया था। मानव संसाधन मंत्री इसका कोई जवाब नहीं दे सके थे। नतीजतन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था। उन्होंने इस मामले की जांच सदन की कमिटी से कराने की बात कही। बावजूद बच्चों के भोजन में घपला करने से शिक्षक से लेकर अधिकारी तक बाज नहीं आ रहे हैं। सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए। परंतु बड़े होने पर जिसके कंधे पर देश की बागडोर आने वाली है। उसकी चिंता किसी को नहीं है। कई स्कूलों में तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूल में खाने से मना कर दिया तो कई ने अपने बच्चों को विद्यालय भेजना ही बंद कर दिया। यही है बिहार के मिड डे मील का सच।

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